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दूसरों की खुशी से उपजा अवसाद यह ईर्ष्या मात्र नहीं, बल्कि तुलना से जन्मा वह सूक्ष्म अवसाद है जो आत्मा को भीतर ही भीतर खोखला कर देता है।

आज का मनुष्य जितना अपने दुःखों से नहीं टूटता, उससे कहीं अधिक वह दूसरों की खुशियों को देखकर भीतर ही भीतर बिखरने लगता है। यह केवल ईर्ष्या नहीं है, यह एक ऐसा अवसाद है जो तुलना की आग में जन्म लेता है और धीरे-धीरे आत्मा को खोखला कर देता है। पहले मनुष्य अपने जीवन को […]

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Gauravshali Bharat
inkhbar News
  • April 19, 2026 1:02 pm IST, Updated 5 hours ago

आज का मनुष्य जितना अपने दुःखों से नहीं टूटता, उससे कहीं अधिक वह दूसरों की खुशियों को देखकर भीतर ही भीतर बिखरने लगता है। यह केवल ईर्ष्या नहीं है, यह एक ऐसा अवसाद है जो तुलना की आग में जन्म लेता है और धीरे-धीरे आत्मा को खोखला कर देता है।
पहले मनुष्य अपने जीवन को अपने श्रम, अपने संस्कार और अपनी परिस्थितियों के आधार पर देखता था। उसे पता था कि हर घर की कहानी अलग होती है, हर चेहरे के पीछे अलग संघर्ष छिपा होता है। पर आज का समय ऐसा है जहाँ हर ओर मुस्कुराते चेहरे, सफलताओं की चमक, यात्राओं की तस्वीरें, उपलब्धियों की घोषणाएँ और सुख के सजाए हुए दृश्य दिखाई देते हैं। देखने वाले को लगता है कि संसार में सब प्रसन्न हैं, केवल वही अभावग्रस्त, असफल या उपेक्षित है। यहीं से एक मौन पीड़ा जन्म लेती है।
दूसरों की खुशी से त्रस्त होना केवल किसी के सुख से जलना नहीं है; यह अपने जीवन के प्रति असंतोष का चरम रूप है। जब मनुष्य अपने भीतर के रिक्त स्थान को भर नहीं पाता, तब वह दूसरों के भरे हुए पात्रों को देखकर और अधिक टूट जाता है। उसे लगता है कि जैसे जीवन ने उसके साथ न्याय नहीं किया। किसी की सफलता उसे प्रेरित नहीं करती, बल्कि उसके घावों को कुरेदती है। किसी की हँसी उसे संगीत नहीं लगती, बल्कि अपने भीतर के सन्नाटे की याद दिलाती है।

यह अवसाद बहुत सूक्ष्म होता है। बाहर से व्यक्ति सामान्य दिखाई देता है, मुस्कुरा भी लेता है, बधाई भी दे देता है, पर भीतर कहीं एक टीस उठती रहती है “मेरे हिस्से में यह क्यों नहीं आया?” यही प्रश्न धीरे-धीरे मन को कड़वाहट, आत्महीनता और निराशा से भर देता है। फिर वह न केवल दूसरों की प्रसन्नता से दुखी होता है, बल्कि अपनी छोटी-छोटी खुशियों को भी महसूस करने की क्षमता खो देता है।
वास्तव में समस्या दूसरों की खुशी नहीं होती, समस्या यह होती है कि हमने अपने सुख का मापदंड दूसरों के जीवन से जोड़ दिया है। जब तक मनुष्य अपनी यात्रा को अपनी दृष्टि से नहीं देखेगा, तब तक वह हर सफल व्यक्ति को अपने विरुद्ध खड़ा पाएगा। तुलना का मार्ग कभी शांति नहीं देता, क्योंकि इस मार्ग पर हमेशा कोई न कोई हमसे आगे दिखाई देगा।

समाधान बाहर नहीं, भीतर है। मनुष्य को यह स्वीकार करना होगा कि हर चमक के पीछे संघर्ष है, हर उपलब्धि के पीछे कोई अनकहा परिश्रम है, और हर मुस्कान पूर्ण सत्य नहीं होती। जीवन प्रतियोगिता नहीं, अनुभव है। जिसने अपने छोटे सुखों को पहचान लिया, जिसने अपने श्रम का सम्मान करना सीख लिया, जिसने अपनी गति को स्वीकार कर लिया, वही इस अदृश्य अवसाद से मुक्त हो सकता है। दूसरों की खुशी से त्रस्त होना अंततः अपने ही मन की पराजय है। जो व्यक्ति दूसरों के सुख में भी सौंदर्य देख सके, वही सच में भीतर से स्वस्थ है। क्योंकि आनंद बाँटने से घटता नहीं, और तुलना करने से बढ़ता नहीं। जीवन का सच्चा संतुलन तब आता है जब हम यह समझ लेते हैं कि किसी और की धूप हमारे हिस्से की छाया नहीं छीनती। अतः आवश्यक है कि हम अपने भीतर झाँकें, अपने अवसाद का नाम लें, उसे पहचानें, और धीरे-धीरे अपने जीवन की उस मिट्टी को फिर से सींचें जहाँ संतोष, कृतज्ञता और आत्मस्वीकृति के फूल खिल सकें। क्योंकि दूसरों की खुशी से जो मन व्यथित है, उसे किसी और की हार नहीं, अपने भीतर की शांति चाहिए।

 

डाॅ कीर्ति शर्मा
(जीवन पर्यन्त आर्य समाजी )

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