नागपुरः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के विजयादशमी समारोह को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने देश की एकता, सांस्कृतिक परंपराओं, स्वदेशी, सामाजिक समरसता और नागरिक अनुशासन के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विविधताओं से भरे देश को एकजुट रखने के लिए ऐसे आधार की आवश्यकता है, जो समाज के सभी वर्गों की पहचान, सम्मान, प्रतिष्ठा और सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। उनके संबोधन में राष्ट्र निर्माण के लिए सामाजिक सहभागिता और व्यक्तिगत जिम्मेदारी की भूमिका भी प्रमुखता से सामने आई।
डॉ. भागवत ने स्वतंत्रता आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि देश को आजाद कराने के लिए महापुरुषों और उस समय के समाज ने त्याग, तपस्या तथा समर्पण का परिचय दिया था। मौजूदा परिस्थितियों में भी राष्ट्र के विकास और मजबूती के लिए उससे कहीं अधिक प्रयास करने की जरूरत है। उनके अनुसार, स्वतंत्रता प्राप्त करना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, लेकिन देश को सशक्त, संगठित और आत्मनिर्भर बनाने के लिए निरंतर काम करना आवश्यक है।
संघ प्रमुख ने भारत की विविधता को देश की विशेष पहचान बताते हुए कहा कि यहां प्राकृतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर अनेक भिन्नताएं देखने को मिलती हैं। इन विविधताओं के बीच एकता बनाए रखने के लिए ऐसा विचार जरूरी है, जो सभी को स्वीकार करने के साथ उनके प्रति सम्मान का भाव भी रखे। उन्होंने भारतीय परंपरा में मौजूद उस जीवन दृष्टि का उल्लेख किया, जो मनुष्य के सुख, कल्याण और जीवन के उद्देश्य को व्यापक रूप में देखती है। उनके विचार में भारत की पारंपरिक चिंतन धारा समाज को जोड़ने का आधार प्रदान कर सकती है।
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने स्वदेश और स्वदेशी की पहचान को भी जरूरी बताया। उन्होंने देश के प्रति आत्मीयता और समाज के साथ व्यक्ति के संबंध को केवल औपचारिक दायित्व तक सीमित नहीं माना। उनके अनुसार, भारत के साथ नागरिकों का रिश्ता हृदय से जुड़ा हुआ है। यह अपनापन बिना किसी शर्त के होता है और इसी भावना से समाज तथा राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी मजबूत होती है। उन्होंने देश के गौरव और उसकी उन्नति के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर भी बल दिया।
डिजिटल माध्यमों और मनोरंजन सामग्री के प्रभाव पर चर्चा करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि नई पीढ़ी विभिन्न माध्यमों से मिलने वाली जानकारियों और सामग्री को कई बार उचित-अनुचित का विवेक किए बिना स्वीकार कर लेती है। इसके परिणाम समाज और परिवार पर पड़ सकते हैं। उन्होंने विशेष रूप से ओटीटी प्लेटफॉर्म का जिक्र करते हुए कहा कि इस क्षेत्र में उचित अनुशासन और आवश्यक नियमों पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने शासन और प्रशासन से इस विषय पर ध्यान देने की जरूरत बताई।
मोहन भागवत ने नेपाल में आई भीषण त्रासदी का उल्लेख करते हुए हिमालयी क्षेत्र में विकास के तरीके पर भी सवाल उठाया। उन्होंने भारत, तिब्बत, भूटान और चीन तक फैले हिमालयी क्षेत्र का संदर्भ देते हुए कहा कि विकास को केवल एक पक्ष से देखने के बजाय व्यापक और संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। उनके अनुसार, पर्यावरण और प्राकृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विकास की योजना बनाना समय की जरूरत है।
संघ प्रमुख ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि संगठन समाज में एकता और सामर्थ्य बढ़ाने के उद्देश्य से काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति से लेकर विश्व स्तर तक जीवन, प्रतिष्ठा और सुरक्षा बनाए रखने के लिए सामर्थ्य आवश्यक है।
उन्होंने संघ की ओर से बताए गए ‘पंच परिवर्तन’ के पांच प्रमुख विषयों का भी उल्लेख किया। इनमें सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्व-बोध एवं स्वदेशी और नागरिक अनुशासन शामिल हैं। उनके अनुसार, इन विषयों को केवल किसी अभियान या एक वर्ष के कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इन्हें दैनिक जीवन और व्यवहार का हिस्सा बनाना चाहिए।
भागवत के संबोधन का व्यापक संदेश राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी, सामाजिक सद्भाव, सांस्कृतिक चेतना और संतुलित विकास को बढ़ावा देना रहा। उन्होंने इन मूल्यों को मजबूत करने के लिए समाज के सभी वर्गों की भागीदारी को महत्वपूर्ण बताया।