नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज होती दिखाई दे रही है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के रामपुर पहुंचने के बाद एआईएमआईएम ने उन पर निशाना साधा है। पार्टी के प्रवक्ता शादाब चौहान ने सवाल उठाया कि अखिलेश यादव को आजम खान की याद चुनाव नजदीक आने पर ही क्यों आई। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा प्रमुख की यह सक्रियता राजनीतिक जरूरतों से प्रेरित है।
शादाब चौहान ने दावा किया कि असदुद्दीन ओवैसी के लगातार सवाल उठाने के बाद अखिलेश यादव रामपुर पहुंचे हैं। उन्होंने सवाल किया कि आजम खान के जेल में रहने के दौरान अखिलेश यादव उनसे मिलने कितनी बार गए थे। एआईएमआईएम प्रवक्ता ने यह भी कहा कि यदि सैफई परिवार का कोई सदस्य जेल में होता, तो अखिलेश यादव उसके समर्थन में आंदोलन करने से पीछे नहीं हटते। हालांकि, ये आरोप एआईएमआईएम की ओर से लगाए गए हैं और इनके संबंध में संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया अलग हो सकती है।
एआईएमआईएम ने अपने बयान में उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाताओं को लेकर भी टिप्पणी की। शादाब चौहान ने कहा कि राज्य का मुस्लिम समाज अब राजनीतिक दलों की रणनीतियों को समझने लगा है और आगामी चुनाव में किसी भी पार्टी को केवल भावनात्मक मुद्दों के आधार पर समर्थन नहीं मिलेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन हासिल करने के लिए आजम खान के मुद्दे को उठा रही है। साथ ही दावा किया कि उनकी पार्टी चुनाव के दौरान सपा की राजनीति पर सवाल उठाती रहेगी। आजम खान लंबे समय से उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुस्लिम चेहरों में गिने जाते रहे हैं।
रामपुर और आसपास के क्षेत्रों में उनका राजनीतिक प्रभाव रहा है। उनके साथ जुड़े मुद्दे सपा की राजनीति और मुस्लिम मतदाताओं के बीच पार्टी की पकड़ के संदर्भ में महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ऐसे में अखिलेश यादव के रामपुर दौरे को लेकर एआईएमआईएम की प्रतिक्रिया को आगामी विधानसभा चुनाव की राजनीतिक तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है। असदुद्दीन ओवैसी भी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की रणनीति और मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर कई बार सवाल उठा चुके हैं। उनका तर्क रहा है कि यदि मुस्लिम आबादी राज्य में लगभग 20 प्रतिशत है, तो राजनीति और सत्ता में उनकी भागीदारी भी उसी अनुपात में बढ़नी चाहिए। ओवैसी ने यादव समुदाय की आबादी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का हवाला देते हुए यह सवाल उठाया है कि मुख्यमंत्री पद पर किसी मुस्लिम नेता को अवसर क्यों नहीं मिलना चाहिए। यह उनका राजनीतिक तर्क है, जिस पर विभिन्न दलों के नेताओं के अलग-अलग विचार हो सकते हैं।
एआईएमआईएम की रणनीति उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक जगह मजबूत करने की दिखाई देती है। पार्टी सपा पर आरोप लगाती रही है कि वह मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन तो चाहती है, लेकिन नेतृत्व और सत्ता में उनकी भागीदारी के सवाल पर पर्याप्त कदम नहीं उठाती। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी प्रदेश में भाजपा के खिलाफ प्रमुख विपक्षी ताकत के रूप में अपनी भूमिका पर जोर देती रही है। ऐसे में मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन आगामी चुनाव में दोनों दलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का अहम मुद्दा बन सकता है। रामपुर के अलावा मुरादाबाद, संभल, आजमगढ़ और मऊ जैसे जिलों में भी मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। इन क्षेत्रों में सपा का पहले से राजनीतिक आधार रहा है, जबकि एआईएमआईएम अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
यदि ओवैसी की पार्टी इन इलाकों में प्रभाव बढ़ाती है, तो विपक्षी दलों के बीच मतों के बंटवारे की संभावना पर चर्चा तेज हो सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक असर उम्मीदवारों, स्थानीय मुद्दों और चुनावी गठबंधनों पर निर्भर करेगा। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले आजम खान, मुस्लिम प्रतिनिधित्व और विपक्षी राजनीति से जुड़े मुद्दे आने वाले महीनों में और प्रमुख हो सकते हैं। अखिलेश यादव के रामपुर दौरे पर एआईएमआईएम की टिप्पणी ने दोनों दलों के बीच जारी राजनीतिक खींचतान को फिर चर्चा में ला दिया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सपा इन आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया देती है और एआईएमआईएम आगामी चुनाव में अपने समर्थन को कितना बढ़ा पाती है। फिलहाल, दोनों दलों के बीच बयानबाजी उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा का संकेत दे रही है।