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DMRC के खिलाफ अवमानना याचिका दायर

मेट्रो राजधानी की परिवहन व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। ऐसे में स्टेशनों के गेट बंद करने या सेवाओं को सीमित करने जैसे फैसलों का असर केवल प्रदर्शन में शामिल लोगों पर ही नहीं, बल्कि रोजमर्रा के काम से यात्रा करने वाले आम नागरिकों पर भी पड़ता है।

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Gauravshali Bharat News
  • October 10, 2026 1:15 pm IST, Published 1 hour ago
दिल्ली में मेट्रो स्टेशनों के गेट बंद रखने को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद कई मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश द्वार बंद रखे जाने का आरोप लगाते हुए वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने अवमानना याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता का कहना है कि दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) ने शीर्ष अदालत के आदेश का पालन नहीं किया। याचिका में इस कथित लापरवाही को अदालत के निर्देशों की जानबूझकर अनदेखी करार दिया गया है।

यह पूरा मामला 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन से जुड़ा है। कॉकरोच जनता पार्टी की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन का ऐलान किया गया था। प्रदर्शन को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई और मेट्रो सेवाओं को लेकर भी एहतियाती कदम उठाए गए। इसी दौरान कुछ मेट्रो स्टेशनों के गेट बंद रखने और यात्रियों की आवाजाही प्रभावित होने को लेकर विवाद सामने आया।

इस मामले में 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई थी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया था कि मेट्रो सेवाओं को पूरी तरह बंद नहीं किया जाना चाहिए। अदालत का जोर इस बात पर था कि सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ सार्वजनिक परिवहन की सुविधा भी जारी रहनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने मेट्रो सेवाओं को नियंत्रित तरीके से संचालित करने का निर्देश दिया था, ताकि सुरक्षा संबंधी जरूरतों को पूरा किया जा सके और आम यात्रियों को अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े। राजधानी दिल्ली में मेट्रो रोजाना बड़ी संख्या में लोगों के लिए आवागमन का प्रमुख साधन है। ऐसे में सेवाओं को पूरी तरह रोकने या स्टेशनों तक पहुंच सीमित करने से नौकरीपेशा लोगों, छात्रों और अन्य यात्रियों को दिक्कत हो सकती है।

याचिकाकर्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी का आरोप है कि अदालत के निर्देश के बावजूद DMRC ने कई स्टेशनों के गेट बंद रखे। उनका कहना है कि यदि न्यायालय ने सेवाएं जारी रखने और उन्हें नियंत्रित ढंग से चलाने का निर्देश दिया था, तो उसका पालन किया जाना चाहिए था। इसी आधार पर उन्होंने अवमानना याचिका दाखिल कर अदालत का ध्यान कथित उल्लंघन की ओर खींचा है।

अवमानना याचिका दायर होने के बाद अब इस मामले में DMRC की भूमिका और अदालत के आदेश के अनुपालन से जुड़े सवाल महत्वपूर्ण हो गए हैं। हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से लगाए गए आरोपों और अदालत में साबित हुए तथ्यों के बीच अंतर करना जरूरी है। केवल याचिका दाखिल होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संबंधित संस्था ने जानबूझकर न्यायालय के आदेश की अवहेलना की है। इस संबंध में अंतिम स्थिति अदालत की सुनवाई और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ही स्पष्ट होगी।

इस विवाद ने एक बार फिर सुरक्षा व्यवस्था और आम लोगों की सुविधाओं के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती को सामने ला दिया है। किसी बड़े प्रदर्शन या संभावित कानून-व्यवस्था की स्थिति में प्रशासन के लिए सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी होता है। वहीं, सार्वजनिक परिवहन को लेकर लिए गए फैसलों में यात्रियों की जरूरतों और न्यायालय के निर्देशों का ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है।

दिल्ली मेट्रो राजधानी की परिवहन व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। ऐसे में स्टेशनों के गेट बंद करने या सेवाओं को सीमित करने जैसे फैसलों का असर केवल प्रदर्शन में शामिल लोगों पर ही नहीं, बल्कि रोजमर्रा के काम से यात्रा करने वाले आम नागरिकों पर भी पड़ता है। अब इस मामले में सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि अवमानना याचिका पर अदालत क्या रुख अपनाती है और मेट्रो सेवाओं से जुड़े निर्देशों के पालन को लेकर आगे क्या स्थिति बनती है।

 

 

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