नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जमानत याचिकाओं और आपराधिक मामलों में फैसला सुनाते समय अदालतों को अपनी निजी नैतिक मान्यताओं या मूल्य-आधारित निष्कर्षों को थोपने से बचना चाहिए। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी यौन उत्पीड़न से जुड़े एक मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए की।
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और एएस चंदुरकर की पीठ ने कहा कि जमानत पर विचार करते समय मामले के कानूनी पहलुओं और आरोपी के लंबे समय से हिरासत में रहने जैसे तथ्यों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने आरोपी को जमानत देने से इनकार करते हुए कहा था कि उसकी रिहाई से सामाजिक व्यवस्था और पीड़िता के परिवार के मनोबल पर असर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया और आदेश को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि आरोपी एक साल से अधिक समय से जेल में है, जबकि मुकदमे की सुनवाई पूरी होने में अभी और समय लग सकता है। ऐसी परिस्थितियों में पीठ ने माना कि आरोपी की जमानत याचिका पर राहत देने का आधार बनता है।
सुप्रीम कोर्ट के 23 सितंबर के आदेश के मुताबिक, आरोपी के खिलाफ मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में भारतीय न्याय संहिता, यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम यानी POCSO Act और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज है।
पुलिस के अनुसार, आरोपी पीड़िता के पड़ोस में किराये के मकान में रहता था। उस पर आरोप है कि शादीशुदा होने के बावजूद उसने पीड़िता की बड़ी बहन के अपहरण की कोशिश की थी।
मामले के अनुसार, पीड़िता ने बाद में अपनी मां को बताया कि आरोपी ने करीब एक महीने तक उसका कथित तौर पर यौन शोषण किया। इसके बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई और संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में जमानत पर विचार करते हुए आरोपी की हिरासत की अवधि और मुकदमे की संभावित अवधि को भी ध्यान में रखा। शीर्ष अदालत की टिप्पणी का प्रमुख आधार यह रहा कि जमानत के फैसले में व्यक्तिगत नैतिक धारणाओं के बजाय कानूनी और प्रासंगिक तथ्यों पर ध्यान दिया जाना चाहिए।