नयी दिल्ली: दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के विरोध प्रदर्शनों को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। पुलिस का दावा है कि 20 जुलाई 2026 को हुए प्रदर्शन के दौरान आयोजकों ने अनुमति की शर्तों का उल्लंघन किया और संसद की ओर मार्च करने के लिए बड़ी संख्या में लोगों को जुटाया। पुलिस के अनुसार, इस दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ गई थी, जिसके चलते हालात नियंत्रित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने पड़े। दिल्ली पुलिस ने अदालत से अपने खिलाफ जारी अवमानना नोटिस को खारिज करने का अनुरोध भी किया है।
यह मामला शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की याचिका और सुप्रीम कोर्ट में लंबित अवमानना कार्यवाही से जुड़ा है। याचिका में 9 अक्टूबर 2026 को दिए गए शीर्ष अदालत के आदेश के कथित उल्लंघन का मुद्दा उठाया गया है। दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार की ओर से सत्यापित जवाबी हलफनामा 15 अक्टूबर 2026 को दाखिल किया गया। इसमें पुलिस ने अपनी कार्रवाई को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी बताया है। हलफनामे के मुताबिक, सीजेपी ने जंतर-मंतर पर एक दिन के धरने के आयोजन के लिए आवेदन किया था। पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन की अनुमति सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक के लिए दी गई थी। इसके साथ आयोजकों ने लिखित आश्वासन दिया था कि प्रदर्शनकारियों की संख्या एक हजार से अधिक नहीं होगी, निर्धारित स्थान और समय का पालन किया जाएगा, यातायात बाधित नहीं किया जाएगा और संसद की ओर मार्च नहीं निकाला जाएगा।
पुलिस ने आरोप लगाया कि अभिजीत दीपके समेत पार्टी के अन्य नेताओं ने इन शर्तों का पालन नहीं किया। हलफनामे में दावा किया गया है कि संसद के सत्र के पहले दिन बिना अनुमति ‘चलो संसद’ मार्च का आह्वान किया गया और इलाके में 30 हजार से अधिक लोग एकत्र हो गए। पुलिस के अनुसार, प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने बैरिकेड तोड़कर संसद भवन की ओर बढ़ने की कोशिश की, जिससे स्थिति तनावपूर्ण हो गई। हालांकि, ये आरोप पुलिस के हलफनामे में दर्ज दावे हैं।
दिल्ली पुलिस ने यह भी आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने पुलिसकर्मियों पर पत्थरों और डंडों से हमला किया। पुलिस का दावा है कि कई कर्मियों के सुरक्षा उपकरण हटाए गए और उन्हें धक्का देकर जमीन पर गिराया गया। हलफनामे में 240 से अधिक पुलिसकर्मियों और अन्य सुरक्षाकर्मियों के घायल होने की बात कही गई है। पुलिस के मुताबिक, स्थिति पर नियंत्रण पाने के लिए लगभग 15 हजार पुलिसकर्मियों को तैनात करना पड़ा, जिनमें 3,750 महिला पुलिसकर्मी शामिल थीं। पुलिस ने अपने दावों के समर्थन में तस्वीरें और वीडियो भी अदालत में पेश किए हैं।
हलफनामे में 6, 7 और 8 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों का भी उल्लेख किया गया है। पुलिस का कहना है कि इन प्रदर्शनों के दौरान भी यातायात और कानून-व्यवस्था से संबंधित चुनौतियां सामने आईं। प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए इस्तेमाल की गई कुछ बसों में तोड़फोड़ और टायरों को नुकसान पहुंचाने का आरोप भी लगाया गया है। पुलिस के अनुसार, 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के संबंध में सीजेपी की ओर से सूचना दी गई थी, लेकिन औपचारिक अनुमति के लिए आवेदन नहीं किया गया था। इसके बाद सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं का हवाला देते हुए पुलिस ने उस सूचना को स्वीकार नहीं किया।
मेट्रो स्टेशनों पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर भी दिल्ली पुलिस ने अपना पक्ष रखा है। हलफनामे में कहा गया है कि संभावित कानून-व्यवस्था संबंधी स्थिति से निपटने के लिए शुरुआत में 57 मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास पर पाबंदियां लगाई गई थीं। बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इनकी संख्या घटाकर 45 कर दी गई। पुलिस के मुताबिक, दिल्ली के कुल 303 मेट्रो स्टेशनों में से सीमित हिस्से पर ही प्रतिबंध लगाए गए और 10 अक्टूबर को रात 10 बजे तक मेट्रो सेवाएं पूरी तरह बहाल कर दी गई थीं।
दिल्ली पुलिस आयुक्त ने अदालत में दलील दी कि संसद मार्च की अनुमति नहीं देना और प्रदर्शनकारियों को एहतियातन हिरासत में लेना सार्वजनिक शांति बनाए रखने के उद्देश्य से किया गया था। पुलिस ने जानबूझकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करने के आरोप से इनकार किया है। अब इस मामले में अदालत का रुख महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि पुलिस की दलीलों और याचिका में लगाए गए आरोपों पर आगे की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के विचार और आदेश पर निर्भर करेगी।