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समुद्र में भारत की शक्ति बढ़ाने की तैयारी, स्वदेशी डिजाइन से बनेंगे आठ कॉर्वेट

परियोजना में स्वदेशी उपकरणों, भारतीय तकनीक और देश में उपलब्ध कुशल मानव संसाधन के इस्तेमाल पर विशेष जोर दिया जाएगा। इससे रक्षा उपकरणों के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता घटाने और घरेलू विनिर्माण क्षमता को बढ़ाने में मदद मिलेगी।

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  • November 2, 2026 6:30 pm IST, Published 40 minutes ago

नई दिल्ली: भारतीय नौसेना की समुद्री ताकत को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। देश में आठ अत्याधुनिक अगली पीढ़ी के कॉर्वेट युद्धपोतों का निर्माण किया जाएगा। रक्षा मंत्रालय ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (GRSE) और गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) के साथ कुल 53,866.50 करोड़ रुपये के समझौते किए हैं। इन युद्धपोतों के निर्माण से भारतीय नौसेना की समुद्री निगरानी, सुरक्षा और युद्धक क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होने की उम्मीद है।

सोमवार, 2 नवंबर को नई दिल्ली स्थित कर्तव्य भवन-2 में इन समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। इस अवसर पर रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह मौजूद रहे। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस परियोजना पर प्रसन्नता जाहिर करते हुए इसे भारतीय नौसेना के आधुनिकीकरण और स्वदेशी रक्षा उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि इन युद्धपोतों के निर्माण से देश के जहाज निर्माण उद्योग को मजबूती मिलेगी और बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इस परियोजना के तहत आठ युद्धपोतों में अत्याधुनिक मिसाइल सिस्टम, आधुनिक हथियार और उन्नत सेंसर तकनीक लगाई जाएगी। इनकी मदद से भारतीय नौसेना समुद्र में हवा से होने वाले हमलों, सतह पर मौजूद दुश्मन के जहाजों और पानी के भीतर सक्रिय पनडुब्बियों से निपटने में अधिक सक्षम होगी। इन युद्धपोतों को समुद्री सुरक्षा की विभिन्न आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया जाएगा।

परियोजना के तहत कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड पांच युद्धपोतों का निर्माण करेगा, जबकि गोवा शिपयार्ड लिमिटेड तीन युद्धपोत तैयार करेगा। इस परियोजना की सबसे खास बात यह है कि सभी आठ युद्धपोतों का डिजाइन भारतीय नौसेना स्वयं तैयार करेगी। इसके बाद देश के सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा शिपयार्ड में इनका निर्माण किया जाएगा। यह भारतीय नौसेना के स्वदेशी डिजाइन पर आधारित युद्धपोतों के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। इन युद्धपोतों के नौसेना में शामिल होने के बाद समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और तटीय क्षेत्रों की निगरानी को और मजबूती मिलेगी। इसके अलावा दुश्मन के युद्धपोतों को निशाना बनाने, पनडुब्बियों का पता लगाने और समुद्र के भीतर उनके खिलाफ कार्रवाई करने की क्षमता भी बढ़ेगी। उथले समुद्री क्षेत्रों में अभियान चलाने और रणनीतिक समुद्री इलाकों में लंबे समय तक निगरानी रखने में भी ये युद्धपोत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

इस परियोजना का लाभ केवल भारतीय नौसेना तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को भी इसका बड़ा फायदा मिलने की संभावना है। युद्धपोतों के निर्माण में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के साथ निजी शिपयार्ड, औद्योगिक साझेदारों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों यानी MSME क्षेत्र की भागीदारी भी होगी। इससे घरेलू कंपनियों को नए व्यावसायिक अवसर मिलेंगे और जहाज निर्माण से जुड़ी तकनीकी विशेषज्ञता विकसित होगी। रोजगार के लिहाज से भी यह परियोजना काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के अनुसार, अगले दस वर्षों में युद्धपोतों के निर्माण से शिपयार्डों में लगभग 72 लाख पर्सन-डे रोजगार सृजित होने का अनुमान है। वहीं सहायक उद्योगों और MSME क्षेत्र में करीब 460 लाख पर्सन-डे रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। इससे इंजीनियरों, तकनीकी विशेषज्ञों, कुशल श्रमिकों और विभिन्न औद्योगिक इकाइयों को लाभ मिलने की उम्मीद है।

परियोजना में स्वदेशी उपकरणों, भारतीय तकनीक और देश में उपलब्ध कुशल मानव संसाधन के इस्तेमाल पर विशेष जोर दिया जाएगा। इससे रक्षा उपकरणों के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता घटाने और घरेलू विनिर्माण क्षमता को बढ़ाने में मदद मिलेगी। आठ नए कॉर्वेट युद्धपोतों का निर्माण भारत की समुद्री सुरक्षा रणनीति को नई मजबूती देने के साथ रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। यह पहल मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान को आगे बढ़ाने के साथ वैश्विक स्तर पर भारतीय जहाज निर्माण उद्योग की पहचान मजबूत करने की क्षमता रखती है।


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