नई दिल्ली: अरावली पर्वतमाला की पहचान, सीमांकन और संरक्षण से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हाई-पावर्ड कमेटी की समयसीमा बढ़ाने की मांग को खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अब रिपोर्ट तय समय में ही दाखिल करनी होगी। अदालत ने समिति को 30 नवंबर 2026 तक अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधियों पर लागू अंतरिम रोक को भी फिलहाल जारी रखने का फैसला किया गया है।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष हाई-पावर्ड कमेटी की ओर से अतिरिक्त समय की मांग रखी गई थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए फरवरी 2027 तक का समय मांगा था। अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। सुनवाई के दौरान पीठ ने समिति की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताते हुए संकेत दिया कि काम शुरू होने के तुरंत बाद समय बढ़ाने का अनुरोध उचित नहीं माना जा सकता। अदालत ने साफ किया कि समिति को अब निर्धारित समयसीमा के भीतर ही अपना काम पूरा करना होगा और इसके बाद समय विस्तार की गुंजाइश नहीं होगी।
पीठ ने समिति से कहा कि रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया में तेजी लाई जाए और उपलब्ध समय का प्रभावी इस्तेमाल किया जाए। कोर्ट का जोर इस बात पर रहा कि अरावली जैसे पर्यावरणीय रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र से जुड़े मामले में रिपोर्ट समयबद्ध तरीके से सामने आनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि रिपोर्ट तैयार करते समय मामले से जुड़े सभी पक्षों की राय को उचित महत्व दिया जाए। राजस्थान और गुजरात में रहने वाले आदिवासी समुदायों को भी अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर देने को कहा गया है। अदालत ने समिति को यह सुविधा भी दी कि यदि किसी विषय पर अंतिम रिपोर्ट से पहले तत्काल निर्णय आवश्यक हो, तो वह उस मुद्दे पर अंतरिम रिपोर्ट दाखिल कर सकती है।
अरावली क्षेत्र में खनन को लेकर अदालत ने मौजूदा स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया है। खनन गतिविधियों पर लगी अंतरिम रोक फिलहाल प्रभावी रहेगी। अदालत ने संकेत दिया कि अंतिम रिपोर्ट आने और आगे के आदेश जारी होने तक वर्तमान व्यवस्था कायम रहेगी। इस मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर 2026 को निर्धारित की गई है। इस बीच, पर्यावरण कार्यकर्ताओं के एक वर्ग ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर चिंता जताई है। अरावली विरासत जन अभियान के सह-संस्थापक दीवान सिंह ने समिति को अतिरिक्त समय नहीं दिए जाने पर सवाल उठाया। उनका तर्क है कि अरावली पर्वतमाला का व्यापक और वैज्ञानिक आकलन एक जटिल प्रक्रिया है, इसलिए रिपोर्ट तैयार करने में जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए।
समिति की मूल समयसीमा 31 अगस्त 2026 तक थी। इस अवधि के पूरा होने पर हाई-पावर्ड कमेटी ने अदालत में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल की थी और अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए 28 फरवरी 2027 तक समय मांगा था। समिति ने कहा था कि अतिरिक्त अवधि मिलने से अरावली पर्वतमाला का अधिक व्यापक और ठोस मूल्यांकन किया जा सकेगा। हालांकि, अदालत ने इस मांग को मंजूर नहीं किया और नई समयसीमा 30 नवंबर तय कर दी। दीवान सिंह ने वैज्ञानिक समीक्षा की प्रक्रिया को पर्याप्त समय देने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने पश्चिमी घाट से संबंधित विशेषज्ञ समिति का उदाहरण देते हुए कहा कि पर्यावरणीय और पारिस्थितिकी संबंधी आकलन जल्दबाजी में पूरा करने से रिपोर्ट की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के रुख को लेकर भी अपनी असहमति जताई और सवाल किया कि वैज्ञानिक आधार वाली रिपोर्ट तैयार करने के लिए समिति पर इतने कम समय में काम पूरा करने का दबाव क्यों डाला जा रहा है। अरावली पर्वतमाला पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र मानी जाती है और इसके संरक्षण से जुड़े मुद्दे लंबे समय से न्यायिक और प्रशासनिक स्तर पर चर्चा में रहे हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई नई समयसीमा को इस मामले में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब समिति को विभिन्न पक्षों की राय और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अपनी रिपोर्ट 30 नवंबर तक अदालत के समक्ष रखनी होगी। इसके बाद 2 दिसंबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट रिपोर्ट और मामले से जुड़े आगे के पहलुओं पर विचार करेगा।