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सुप्रीम कोर्ट की अपील, बिना पटाखों के मनाएं दिवाली

विराट कोहली जैसी हस्तियों से जागरूकता फैलाने का सुझाव नई दिल्ली। दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली पर पटाखों के इस्तेमाल को कम करने और लोगों को जागरूक करने के लिए अहम सुझाव दिए हैं। गुरुवार को मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि विराट कोहली जैसे लोकप्रिय […]

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  • October 30, 2026 8:21 am IST, Published 52 minutes ago

विराट कोहली जैसी हस्तियों से जागरूकता फैलाने का सुझाव

नई दिल्ली। दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली पर पटाखों के इस्तेमाल को कम करने और लोगों को जागरूक करने के लिए अहम सुझाव दिए हैं। गुरुवार को मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि विराट कोहली जैसे लोकप्रिय खिलाड़ियों और अन्य मशहूर हस्तियों की मदद से लोगों को बिना पटाखों के दिवाली मनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। कोर्ट ने अधिकारियों को पटाखों पर लागू पाबंदियों का प्रचार टेलीविजन, समाचार पत्रों और दूसरे माध्यमों से करने का निर्देश भी दिया।

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति पीबी वराले की पीठ कर रही थी। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति वराले ने सवाल उठाया कि जनता को जागरूक करने के लिए अच्छे खिलाड़ियों और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सम्मानित लोगों की सेवाएं क्यों नहीं ली जा सकतीं। उन्होंने सुझाव दिया कि मशहूर हस्तियों के वीडियो और संदेश जारी किए जा सकते हैं, जिनमें वे लोगों से प्रदूषण बढ़ाए बिना त्योहार मनाने की अपील करें।

दिवाली रोशनी का त्योहार, पटाखे जलाना जरूरी नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिवाली मूल रूप से रोशनी का त्योहार है। समय के साथ इसमें पटाखे जलाने की परंपरा जुड़ गई, लेकिन इसके कारण होने वाले प्रदूषण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। त्योहार मनाने के लिए ऐसी गतिविधियां जरूरी नहीं होनी चाहिए, जिनसे दूसरे लोगों के स्वास्थ्य और जीवन पर बुरा असर पड़े।

अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि बच्चों को पटाखों से होने वाले नुकसान के बारे में समझाना जरूरी है। यदि बच्चों को सही जानकारी दी जाए तो वे अपने माता-पिता को भी पटाखे नहीं जलाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। नई पीढ़ी को पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाना प्रदूषण कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

धार्मिक भावनाओं के साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य भी जरूरी

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि दिवाली से करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाएं जुड़ी हुई हैं। इन भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य और संविधान से मिले अधिकारों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

कोर्ट ने फिलहाल पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं होने की बात कही। अदालत के अनुसार, पूर्ण प्रतिबंध से कई अन्य तरह की समस्याएं पैदा हो सकती हैं। हालांकि, अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि पटाखों के संबंध में जारी निर्देशों और पाबंदियों का प्रभावी तरीके से पालन हो।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि अधिकारी निर्देशों को लागू करने में लापरवाही बरतते हैं तो उसे सख्त रुख अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

वायु प्रदूषण से देश में लाखों मौतों का हवाला

सुनवाई के दौरान अदालत की सहायता कर रहीं एमिकस क्यूरी और वरिष्ठ अधिवक्ता उत्तरा बब्बर ने वायु प्रदूषण से होने वाले स्वास्थ्य संबंधी नुकसान का मुद्दा उठाया। उन्होंने दिल्ली-एनसीआर में पटाखों के इस्तेमाल से पैदा होने वाले खतरों पर भी ध्यान दिलाया।

उन्होंने स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2025 रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि भारत में वायु प्रदूषण मौतों के प्रमुख कारणों में शामिल है। प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, देश में वायु प्रदूषण से संबंधित कारणों के चलते 20.1 लाख से अधिक मौतें हुईं। इनमें पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की हिस्सेदारी लगभग 21 प्रतिशत बताई गई।

वायु प्रदूषण का असर केवल सांस संबंधी बीमारियों तक सीमित नहीं है। इससे हृदय रोग, फेफड़ों की समस्याओं और अन्य गंभीर स्वास्थ्य परेशानियों का खतरा भी बढ़ सकता है। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों पर इसका प्रभाव अधिक गंभीर हो सकता है।

जागरूकता और नियमों का पालन जरूरी

सुप्रीम कोर्ट के सुझावों से स्पष्ट है कि वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए केवल प्रतिबंध लगाना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए जनभागीदारी, जागरूकता अभियान और नियमों का प्रभावी पालन भी जरूरी है।

लोकप्रिय खिलाड़ियों, फिल्मी हस्तियों और अन्य सार्वजनिक व्यक्तियों के संदेश लोगों तक तेजी से पहुंच सकते हैं। यदि ऐसे अभियान के माध्यम से बच्चों और परिवारों को प्रदूषण के नुकसान समझाए जाएं तो त्योहार मनाने के तरीकों में सकारात्मक बदलाव संभव है।

दिवाली खुशियों और रोशनी का पर्व है। ऐसे में पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए त्योहार मनाना समाज के लिए एक जिम्मेदार विकल्प बन सकता है।

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