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कमजोर मानसून से खेती पर संकट

कर्नाटक में 33% फसलें बर्बाद, महाराष्ट्र में सात दिन में चार किसानों ने की आत्महत्या; तमिलनाडु में चावल के दाम 50% तक बढ़े नई दिल्ली। कमजोर मानसून और अल नीनो के संभावित प्रभाव से भारत के कई राज्यों में सूखे के हालात गंभीर होते जा रहे हैं। दक्षिण और पश्चिम भारत में जलाशयों का जलस्तर […]

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  • October 21, 2026 8:52 am IST, Published 1 hour ago

कर्नाटक में 33% फसलें बर्बाद, महाराष्ट्र में सात दिन में चार किसानों ने की आत्महत्या; तमिलनाडु में चावल के दाम 50% तक बढ़े

नई दिल्ली। कमजोर मानसून और अल नीनो के संभावित प्रभाव से भारत के कई राज्यों में सूखे के हालात गंभीर होते जा रहे हैं। दक्षिण और पश्चिम भारत में जलाशयों का जलस्तर गिरने से कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य आपूर्ति पर दबाव बढ़ गया है। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना और तमिलनाडु में पानी की कमी का असर फसलों की पैदावार पर दिखाई दे रहा है। वहीं, तमिलनाडु में धान की खेती का रकबा घटने से चावल की कुछ किस्मों की कीमतों में 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज किए जाने की बात सामने आई है।

कृषि संकट का सबसे गंभीर असर किसानों पर पड़ रहा है। महाराष्ट्र में फसलें सूखने और कर्ज के दबाव के बीच सात दिनों के भीतर चार किसानों की आत्महत्या के मामले सामने आने की जानकारी दी गई है। लगातार कमजोर होती कृषि परिस्थितियों ने किसानों की आय, ग्रामीण रोजगार और खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।

कर्नाटक में 226 तालुके सूखाग्रस्त, एक-तिहाई फसल प्रभावित

कर्नाटक में सूखे की स्थिति बेहद चिंताजनक बताई जा रही है। राज्य के 240 तालुकों में से 226 तालुकों को सूखाग्रस्त बताया गया है। अनुमान के मुताबिक, राज्य में लगभग 33 प्रतिशत फसल बर्बाद हो चुकी है। बारिश की कमी और सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिलने से किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

सूखे का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं है। कृषि पर निर्भर परिवारों की आमदनी घटने से ग्रामीण बाजारों में मांग प्रभावित होने और कर्ज चुकाने में कठिनाई बढ़ने की आशंका है।

कावेरी डेल्टा में धान की खेती प्रभावित, चावल महंगा

तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र में पानी की कमी ने धान की खेती को प्रभावित किया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, धान की खेती का क्षेत्रफल एक लाख एकड़ से अधिक घट गया है। सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिलने से उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका है।

पैदावार में कमी और आपूर्ति संबंधी दबाव के कारण चावल की कुछ किस्मों की कीमतों में 50 प्रतिशत तक वृद्धि बताई गई है। इसका असर आम उपभोक्ताओं के घरेलू बजट पर पड़ सकता है। यदि जल संकट लंबे समय तक बना रहता है, तो किसानों की अगली फसल की तैयारी और खाद्यान्न आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है।

महाराष्ट्र और तेलंगाना में भी सूखे के हालात

महाराष्ट्र में कमजोर बारिश के साथ फसलों के नुकसान और कर्ज का दबाव किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। सात दिनों में चार किसानों की आत्महत्या के मामले कृषि संकट की गंभीरता को सामने लाते हैं। ऐसे हालात में प्रभावित किसानों को समय पर आर्थिक सहायता, फसल नुकसान का आकलन और राहत उपाय उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है।

तेलंगाना में भी लगभग 45.6 प्रतिशत मंडलों को सूखाग्रस्त घोषित किए जाने की जानकारी दी गई है। वहीं, आंध्र प्रदेश के 56.4 प्रतिशत और महाराष्ट्र के 86.4 प्रतिशत तालुकों में सूखे की स्थिति बताई गई है। पानी की कमी से खरीफ फसलों के साथ पशुपालन और ग्रामीण आजीविका पर भी दबाव बढ़ सकता है।

देश के 178 प्रमुख जलाशयों में क्षमता से 31 प्रतिशत कम पानी

जल संकट का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश के 178 प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर उनकी कुल क्षमता के मुकाबले 31 प्रतिशत कम बताया गया है। पेन्नार बेसिन में पानी की कमी 72.3 प्रतिशत और कावेरी बेसिन में 60.5 प्रतिशत दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है।

तमिलनाडु का अलियार जलाशय लगभग खाली होने की स्थिति में पहुंच गया है। वहीं, तेलंगाना से जुड़े प्रमुख बांधों में भी जलस्तर सामान्य क्षमता से काफी नीचे बताया गया है। जलाशयों में पानी कम होने से पेयजल आपूर्ति, सिंचाई और बिजली उत्पादन जैसी व्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ सकता है।

भारत में मानसूनी बारिश 13 प्रतिशत कम

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत में मानसूनी बारिश औसत से लगभग 13 प्रतिशत कम रही। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में बारिश की कमी करीब 26 प्रतिशत, जबकि दक्षिण भारत में लगभग 24 प्रतिशत बताई गई है। वर्षा में इस अंतर ने कई क्षेत्रों में खेती की परिस्थितियों को कठिन बना दिया है।

हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक मौसम में आए इन बदलावों के लिए केवल अल नीनो को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। समुद्र की सतह के तापमान, वायुमंडलीय परिस्थितियों और क्षेत्रीय मौसम प्रणालियों सहित कई कारक वर्षा के वितरण को प्रभावित करते हैं।

दुनिया के कई हिस्सों में मौसम का असामान्य असर

अल नीनो और व्यापक जलवायु परिस्थितियों के बीच दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भी गंभीर मौसमी घटनाओं की जानकारी सामने आई है।

इंडोनेशिया में जंगलों की आग: जनवरी से अब तक लगभग 8.95 लाख हेक्टेयर जमीन जलने की जानकारी दी गई है। सुमात्रा और कालीमंतन में धुएं से लाखों लोगों के प्रभावित होने तथा करीब 1.75 लाख लोगों को सांस संबंधी समस्याएं होने की बात कही गई है।

प्रशांत महासागर में तूफानी गतिविधियां: पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में 22 तूफानों और 12 चक्रवातों की जानकारी दी गई है। इनमें 10 को बेहद शक्तिशाली बताया गया है। तूफान पोलो के दौरान हवा की रफ्तार करीब 285 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंचने का दावा किया गया है।

अटलांटिक महासागर में अपेक्षाकृत कम गतिविधि: उपलब्ध विवरण के मुताबिक, अटलांटिक क्षेत्र में अब तक आठ उष्णकटिबंधीय तूफान बने और उनमें से एक ने अमेरिका में दस्तक दी।

चीन और जापान में बाढ़ तथा भूस्खलन: दोनों देशों में तूफानों के कारण बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं सामने आई हैं। गर्म समुद्री पानी तूफानों को अतिरिक्त ऊर्जा दे सकता है, हालांकि किसी विशेष तूफान की तीव्रता कई अन्य मौसमी परिस्थितियों पर भी निर्भर करती है।

किसानों को राहत और जल प्रबंधन की जरूरत

कमजोर मानसून से पैदा हुआ संकट स्पष्ट करता है कि कृषि क्षेत्र को बदलती मौसमी परिस्थितियों के अनुरूप तैयार करना जरूरी है। जलाशयों के पानी का बेहतर प्रबंधन, सूखा सहन करने वाली फसलों को बढ़ावा, वर्षा जल संचयन और सिंचाई के आधुनिक तरीकों को अपनाना महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।

इसके साथ ही, फसल नुकसान झेल रहे किसानों को समय पर मुआवजा, फसल बीमा का लाभ और कर्ज संबंधी राहत उपलब्ध कराने की जरूरत है। प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल की व्यवस्था तथा ग्रामीण परिवारों की आजीविका की सुरक्षा भी प्राथमिकता होनी चाहिए।

यदि बारिश की कमी और जलाशयों में घटता जलस्तर लंबे समय तक बना रहता है, तो इसका असर केवल कृषि उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद्य पदार्थों की कीमतों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों के लिए तत्काल राहत के साथ दीर्घकालीन जल प्रबंधन की रणनीति तैयार करना आवश्यक होगा।

 

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