रूस से कच्चा तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत और अमेरिका के बीच तनाव की आशंकाओं के बावजूद वॉशिंगटन ने अपने रणनीतिक रिश्तों को प्राथमिकता दी है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के मुताबिक, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस बात को समझते हैं कि भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने से दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण संबंधों को नुकसान पहुंच सकता है। रुबियो के बयान से संकेत मिलता है कि अमेरिकी प्रशासन रूस पर दबाव बनाने की नीति के साथ भारत के साथ अपने आर्थिक और कूटनीतिक हितों का संतुलन भी बनाए रखना चाहता है।
मार्को रुबियो के मुताबिक, रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत के खिलाफ अतिरिक्त शुल्क लगाने से वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच व्यापारिक एवं रणनीतिक संबंध प्रभावित हो सकते थे। अमेरिकी प्रशासन रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त कराने के लिए मॉस्को पर आर्थिक दबाव बनाने की नीति अपना रहा है, जिसमें टैरिफ भी शामिल हैं। हालांकि, रुबियो ने कहा कि इन प्रयासों का मकसद भारत को आर्थिक नुकसान पहुंचाना नहीं है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि रूसी तेल की खरीद को लेकर भारत पर कानून के तहत संभावित अतिरिक्त टैरिफ नहीं लगाए गए। इस फैसले को लेकर ट्रंप को अमेरिका के भीतर आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा था।
रुबियो के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस पर दबाव बनाने और भारत के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने, दोनों प्राथमिकताओं पर ध्यान देना था। भारत अमेरिका के लिए व्यापार, सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग के लिहाज से अहम है। ऐसे में भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी और कूटनीतिक तालमेल पर असर पड़ने की आशंका थी। रुबियो ने माना कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में अलग-अलग हितों को साथ लेकर चलना चुनौतीपूर्ण होता है।
अमेरिका और पाकिस्तान के बीच बढ़ते संपर्कों को लेकर भारत में जताई जा रही आशंकाओं पर भी रुबियो ने अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि वॉशिंगटन के लिए पाकिस्तान के साथ संवाद बनाए रखना जरूरी है, क्योंकि इसके जरिए क्षेत्रीय तनाव को कम करने और संभावित टकराव को रोकने के प्रयास किए जा सकते हैं। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान सहित किसी भी अन्य देश के साथ अमेरिकी साझेदारी भारत के साथ रिश्तों को कमजोर करने की कीमत पर नहीं होगी।
रुबियो ने वर्तमान अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों को 1970 के दशक की स्थिति से जोड़कर देखने को भी उचित नहीं माना। उन्होंने संकेत दिया कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात, राजनीतिक समीकरण और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां उस समय से अलग हैं। उनके बयान का आशय यह था कि अमेरिका विभिन्न देशों के साथ अपने हितों के अनुसार संबंध रख सकता है, लेकिन भारत के साथ साझेदारी उसके लिए अलग महत्व रखती है।
अमेरिका में H-1B वीजा और अन्य आव्रजन नियमों को लेकर सख्ती के सवाल पर रुबियो ने कहा कि इन नीतिगत बदलावों का लक्ष्य भारत को अलग से प्रभावित करना नहीं है। अमेरिकी सरकार अपनी आव्रजन प्रणाली को निर्धारित नियमों के मुताबिक संचालित करना चाहती है। वहां विदेशी छात्रों, पेशेवरों और निवेशकों के लिए अवसर बने रह सकते हैं, लेकिन उन्हें कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना होगा। चूंकि भारतीय नागरिक कई वीजा श्रेणियों में बड़ी संख्या में आवेदन करते हैं, इसलिए नए नियमों का प्रभाव भारतीय आवेदकों के बीच अधिक चर्चा में आ सकता है।
चीन के मामले में रुबियो ने अमेरिकी प्रशासन की नीति को समझाते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत जारी रखना आवश्यक है। चीन की आर्थिक ताकत और वैश्विक प्रभाव को देखते हुए उसके साथ संबंध बनाए रखना अमेरिका के हित में है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका विवादित मुद्दों पर अपने हितों से समझौता करेगा। वॉशिंगटन की कोशिश मतभेदों का सामना करते हुए ऐसे हालात से बचने की है, जो गंभीर अंतरराष्ट्रीय संकट में बदल सकते हैं। रुबियो ने आगाह किया कि अमेरिका और चीन के बीच व्यापक व्यापारिक टकराव का असर केवल इन दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत सहित दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।
रूस-यूक्रेन संघर्ष के समाधान में भारत की कोशिशों का जिक्र करते हुए रुबियो ने नई दिल्ली की कूटनीतिक पहल का स्वागत किया। उन्होंने भारत की ओर से तैयार किए गए प्रस्ताव को देखने की बात कही और संघर्षरत पक्षों के बीच बातचीत को बढ़ावा देने में भारतीय प्रयासों को महत्वपूर्ण बताया। उनके मुताबिक, इतने जटिल अंतरराष्ट्रीय विवाद का समाधान तलाशने के लिए संवाद और कूटनीतिक पहल की भूमिका अहम है।
कुल मिलाकर, रुबियो की टिप्पणियों से पता चलता है कि अमेरिका रूस से तेल खरीदने, व्यापार शुल्क, आव्रजन नियमों और पाकिस्तान व चीन के साथ संबंधों जैसे मुद्दों पर अपनी नीतियां आगे बढ़ाते हुए भारत के साथ सहयोग बनाए रखना चाहता है। वॉशिंगटन के सामने रूस पर दबाव डालने और भारत के साथ आर्थिक तथा रणनीतिक साझेदारी को प्रभावित होने से बचाने के बीच संतुलन कायम रखने की चुनौती बनी हुई है।