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शरद पवार के अगले कदम पर नजरें, NCP का विलय या NDA में एंट्री से बदलेगी राजनीति?

शरद पवार पहले भी संकेत दे चुके हैं कि दोनों गुटों के एक होने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। हालांकि उन्होंने इस तरह के किसी फैसले में नई पीढ़ी के नेताओं, खासकर सुप्रिया सुले की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया था।

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Gauravshali Bharat News
  • November 6, 2026 8:00 pm IST, Published 5 minutes ago

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के दोनों गुटों के एक होने की चर्चाएं तेज हो गई हैं। इसकी वजह है मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के प्रमुख शरद पवार और अजित पवार गुट के वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल पटेल के बीच हुई मुलाकात। शरद पवार फिलहाल छाती में संक्रमण का इलाज करा रहे हैं, लेकिन अस्पताल में उनकी राजनीतिक गतिविधियों ने महाराष्ट्र के सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। इस मुलाकात से ठीक एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी फोन करके उनका हालचाल जाना था। बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने उन्हें आराम करने और बाकी जिम्मेदारियां सुप्रिया सुले तथा अपने करीबियों पर छोड़ने की सलाह दी। इन घटनाओं के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा बदलाव होने वाला है? क्या शरद पवार और अजित पवार के समर्थक एक मंच पर आ सकते हैं? और क्या इस संभावित घटनाक्रम के बाद शरद पवार का गुट एनडीए के साथ जाने का फैसला कर सकता है?

शरद पवार की राजनीति को समझने के लिए उनके छह दशक लंबे राजनीतिक सफर पर नजर डालना जरूरी है। महाराष्ट्र की राजनीति में उन्हें ऐसा नेता माना जाता है, जिनके अगले कदम का अंदाजा लगाना आसान नहीं होता। उन्होंने अलग-अलग समय पर ऐसे राजनीतिक फैसले लिए हैं, जिन्होंने विरोधियों और सहयोगियों दोनों को हैरान किया है। उनकी राजनीति में वैचारिक मतभेदों के बावजूद राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार गठबंधन बनाने की क्षमता हमेशा दिखाई दी है। यही कारण है कि उनके आलोचक उन्हें सत्ता की राजनीति का माहिर खिलाड़ी बताते हैं, जबकि समर्थक उन्हें परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने वाला रणनीतिकार मानते हैं।

साल 1999 में शरद पवार ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की स्थापना की थी। उस समय ऐसा माना जा रहा था कि महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी के बीच लंबे समय तक राजनीतिक टकराव रहेगा। लेकिन विधानसभा चुनाव के बाद दोनों दलों ने मिलकर सरकार बनाई। इस फैसले ने दिखा दिया कि शरद पवार राजनीतिक मतभेदों को सत्ता की संभावनाओं के आड़े नहीं आने देते। बाद में उन्होंने शिवसेना और कांग्रेस के साथ मिलकर महाविकास अघाड़ी सरकार बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह गठबंधन महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़े बदलाव के रूप में सामने आया था।

साल 2014 में भी शरद पवार ने अपने फैसले से राजनीतिक हलकों को चौंकाया था। विधानसभा चुनाव के बाद भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन उसके पास पूर्ण बहुमत नहीं था। उस समय भाजपा और शिवसेना के बीच भी तनाव बना हुआ था। ऐसे राजनीतिक माहौल में शरद पवार ने भाजपा को बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा कर दी। उनका तर्क था कि महाराष्ट्र को दोबारा चुनाव की स्थिति में नहीं धकेलना चाहिए। विश्वास मत के दौरान एनसीपी विधायकों की अनुपस्थिति ने भी भाजपा सरकार को राहत पहुंचाई। इस घटनाक्रम को आज भी शरद पवार की व्यावहारिक राजनीति के उदाहरण के तौर पर देखा जाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शरद पवार के संबंध भी लंबे समय से चर्चा का विषय रहे हैं। वर्ष 2015 में बारामती के दौरे पर मोदी ने सार्वजनिक मंच से शरद पवार को अपना राजनीतिक मार्गदर्शक बताया था। इसके बाद 2017 में शरद पवार को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक मतभेदों के बावजूद व्यक्तिगत संवाद की खबरें समय-समय पर सामने आती रही हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री का अस्पताल में भर्ती पवार को फोन करना केवल शिष्टाचार का मामला है या इसके पीछे कोई राजनीतिक संदेश भी है, इस पर चर्चाएं होना स्वाभाविक है।

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एनसीपी में टूट की कहानी भी शरद पवार की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। नवंबर 2019 में अजित पवार ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने की कोशिश की थी। उस समय राजनीतिक घटनाक्रम इतनी तेजी से बदला कि महाराष्ट्र में कुछ ही दिनों के भीतर सत्ता का समीकरण बदल गया। हालांकि शरद पवार ने अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए अधिकांश विधायकों को वापस अपने साथ जोड़ लिया था। बाद में अजित पवार की दूसरी बगावत ने पार्टी को दो हिस्सों में बांट दिया। इस बार हालात शरद पवार के लिए पहले जैसे नहीं रहे। पार्टी का संगठन कमजोर हुआ और दोनों गुटों के बीच चुनाव चिह्न तथा राजनीतिक पहचान को लेकर संघर्ष भी तेज हुआ।

अब अजित पवार के निधन के बाद उनके गुट की कमान सुनेत्रा पवार के हाथों में है। पार्टी के भीतर नेतृत्व और भविष्य की रणनीति को लेकर अलग-अलग विचार सामने आ रहे हैं। पार्थ पवार की राजनीतिक भूमिका को लेकर भी चर्चाएं होती रही हैं। ऐसे में एनसीपी के दोनों धड़ों के पुनर्मिलन की संभावना को कुछ नेता पार्टी के भविष्य के लिए जरूरी मान सकते हैं। उनका तर्क है कि अलग-अलग रहने से संगठन की ताकत बंटती है और दोनों गुटों को चुनावी नुकसान उठाना पड़ सकता है। दूसरी तरफ, दोनों पक्षों के बीच नेतृत्व, पार्टी की पहचान और राजनीतिक दिशा को लेकर सहमति बनाना आसान नहीं होगा।

शरद पवार पहले भी संकेत दे चुके हैं कि दोनों गुटों के एक होने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। हालांकि उन्होंने इस तरह के किसी फैसले में नई पीढ़ी के नेताओं, खासकर सुप्रिया सुले की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया था। इसका मतलब है कि पुनर्मिलन की चर्चा केवल दो राजनीतिक परिवारों के बीच समझौते तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पार्टी के भविष्य का नेतृत्व कौन करेगा, यह भी बड़ा सवाल होगा।

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अगर दोनों गुट एक हो जाते हैं और इसके बाद एनडीए के साथ जाने का फैसला करते हैं, तो महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। इसका सीधा असर महाविकास अघाड़ी पर पड़ेगा। कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की शिवसेना के लिए यह एक बड़ा राजनीतिक झटका हो सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर भी INDIA गठबंधन की रणनीति प्रभावित हो सकती है, क्योंकि विपक्षी एकता को मजबूत करने में शरद पवार की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। हालांकि अस्पताल में हुई एक मुलाकात या प्रधानमंत्री के फोन को किसी अंतिम राजनीतिक फैसले का संकेत मानना जल्दबाजी होगी।

फिलहाल महाराष्ट्र की राजनीति में सभी की नजर शरद पवार के अगले कदम पर टिकी है। उनकी राजनीतिक शैली का इतिहास बताता है कि वह बदलते हालात में नए समीकरण बनाने से पीछे नहीं हटते। लेकिन इस बार उनके सामने चुनौती केवल सत्ता तक पहुंचने की नहीं, बल्कि अपनी पार्टी की राजनीतिक विरासत और संगठन को बचाए रखने की भी है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि ब्रीच कैंडी अस्पताल में हुई मुलाकात महज राजनीतिक शिष्टाचार थी या महाराष्ट्र में किसी नए सियासी गठबंधन की शुरुआत।

 

 

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