रंग-रूप से जाति तय नहीं! मद्रास HC ने सुनाया बड़ा फैसला

अदालत ने तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई जिला स्तरीय विजिलेंस कमेटी के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सीमा शुल्क विभाग के अधिकारी एम. रविकुमार के हिंदू आदि द्रविड़ समुदाय प्रमाणपत्र को गैर-प्रामाणिक माना गया था।

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  • September 21, 2026 8:00 pm IST, Published 13 minutes ago

चेन्नई: मद्रास हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि किसी व्यक्ति की जाति या धार्मिक पहचान का निर्धारण केवल उसके रंग-रूप, कद-काठी, बालों की बनावट या भाषा बोलने की क्षमता के आधार पर नहीं किया जा सकता। अदालत ने तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई जिला स्तरीय विजिलेंस कमेटी के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सीमा शुल्क विभाग के अधिकारी एम. रविकुमार के हिंदू आदि द्रविड़ समुदाय प्रमाणपत्र को गैर-प्रामाणिक माना गया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने खुद रविकुमार की जाति की अंतिम पुष्टि नहीं की है, बल्कि मामले को नए सिरे से जांच के लिए कमेटी के पास भेजा है।

रंग, कद और अंग्रेजी को बनाया गया था आधार

मामले में अधिकारियों की ओर से रविकुमार और उनके परिवार के शारीरिक स्वरूप तथा भाषा संबंधी विशेषताओं का भी उल्लेख किया गया था। जांच में परिवार के सदस्यों के गोरे रंग, लंबे कद, अच्छे शारीरिक गठन, घुंघराले बाल और तमिल व अंग्रेजी बोलने की क्षमता को उनके धार्मिक दावे पर सवाल उठाने वाले कारणों में शामिल किया गया था।

न्यायमूर्ति डी. भारथा चक्रवर्ती ने इन पहलुओं पर आपत्ति जताते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का रंग, कद, शरीर की बनावट, बालों का प्रकार अथवा तमिल और अंग्रेजी बोलने की क्षमता अपने आप में यह निर्धारित नहीं कर सकती कि वह किस धर्म को मानता है या किसी विशेष समुदाय से संबंधित है। अदालत ने यह भी कहा कि इन टिप्पणियों को किसी मानवशास्त्री के मूल्यांकन के संदर्भ में प्रस्तुत नहीं किया गया था।

1986 में मिला था हिंदू आदि द्रविड़ प्रमाणपत्र

मामले की पृष्ठभूमि कई दशक पुरानी है। रविकुमार के अनुसार, उनके पिता मूल रूप से हिंदू आदि द्रविड़ समुदाय से थे, लेकिन वर्ष 1960 में उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया था। रविकुमार का जन्म वर्ष 1966 में हुआ था। बाद में उन्होंने दावा किया कि वर्ष 1983 में वह और उनके पिता चेन्नई स्थित आर्य समाज केंद्र में आयोजित प्रक्रिया के माध्यम से दोबारा हिंदू धर्म में लौटे थे।

इसके बाद रविकुमार को 10 दिसंबर 1986 को ऐसा सामुदायिक प्रमाणपत्र जारी किया गया, जिसमें उनके हिंदू आदि द्रविड़ समुदाय से संबंधित होने का उल्लेख था। इसी प्रमाणपत्र के आधार पर उन्होंने सीमा शुल्क विभाग में नौकरी हासिल की और आगे चलकर सहायक आयुक्त के पद तक पहुंचे।

रिटायरमेंट से पहले शुरू हुई प्रमाणपत्र की जांच

रविकुमार की सेवानिवृत्ति 30 मई 2026 को निर्धारित थी। इसी अवधि के आसपास उनके सामुदायिक प्रमाणपत्र की प्रामाणिकता को लेकर जांच शुरू हुई। तिरुवन्नामलाई जिला स्तरीय विजिलेंस कमेटी ने 4 मई 2026 को प्रमाणपत्र को गैर-प्रामाणिक मानते हुए प्रतिकूल आदेश पारित किया।

कमेटी की जांच में केवल दस्तावेज ही नहीं, बल्कि परिवार की धार्मिक पृष्ठभूमि और कथित धार्मिक आचरण को भी देखा गया। पिता के ईसाई कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार को भी मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य के रूप में सामने रखा गया। कमेटी की ओर से यह सवाल भी उठाया गया कि पुनः हिंदू धर्म अपनाने के बाद रविकुमार को संबंधित आदि द्रविड़ समुदाय ने स्वीकार किया था या नहीं।

रविकुमार ने धार्मिक आचरण के दस्तावेज दिए

हाईकोर्ट में रविकुमार की ओर से बताया गया कि पुनः हिंदू धर्म अपनाने के बाद वह और उनका परिवार हिंदू धार्मिक परंपराओं का पालन करते रहे। उन्होंने अपने दावे के समर्थन में विवाह और परिवार से जुड़े धार्मिक आयोजनों की तस्वीरों सहित अन्य सामग्री का हवाला दिया।

उनकी ओर से यह भी कहा गया कि उनके विवाह तथा बेटी के विवाह को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न किया गया था। बच्चों से संबंधित कुछ हिंदू धार्मिक संस्कारों का भी उल्लेख किया गया। इन दस्तावेजों और दलीलों के आधार पर उन्होंने कहा कि केवल बाहरी शारीरिक विशेषताओं या भाषा के आधार पर उनके धार्मिक विश्वास पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।

1994 के राशन कार्ड पर भी उठे सवाल

मामले में कमेटी की ओर से एक राशन कार्ड का हवाला देते हुए रविकुमार की बेटी के ईसाई होने का निष्कर्ष निकाले जाने का भी उल्लेख हुआ। रविकुमार ने इस निष्कर्ष पर आपत्ति जताई और संबंधित तारीखों को लेकर तथ्य अदालत के सामने रखे।

हाईकोर्ट ने पाया कि जांच के कुछ निष्कर्ष पर्याप्त ठोस कारणों और प्रमाणों पर आधारित नहीं दिखाई देते। भारतीय न्यायिक रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने यह भी नोट किया कि कमेटी द्वारा बताए गए कुछ तथ्यों में दस्तावेजी आधार और निष्कर्ष के बीच पर्याप्त संबंध स्पष्ट नहीं था।

अदालत ने कहा, पुनः जांच जरूरी

हाईकोर्ट ने कमेटी के आदेश को रद्द करते हुए मामले को दोबारा विचार के लिए संबंधित जिला स्तरीय विजिलेंस कमेटी के पास भेज दिया। अदालत ने संकेत दिया कि पुनः जांच में ऐसे साक्ष्यों और परिस्थितियों पर ध्यान देना होगा जो वास्तव में व्यक्ति के धार्मिक आचरण तथा पुनः समुदाय में स्वीकार किए जाने के प्रश्न से संबंधित हों।

रिपोर्टों के मुताबिक, रविकुमार को अपनी धार्मिक प्रथाओं से जुड़े दस्तावेज, तस्वीरें और अन्य सामग्री प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया है। इसके बाद कमेटी को कानून के अनुसार नया निर्णय लेना होगा।

फैसले का व्यापक कानूनी संदेश

इस मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने किसी व्यक्ति की सामाजिक या धार्मिक पहचान तय करने के लिए सतही शारीरिक विशेषताओं को आधार बनाने पर सवाल उठाया है। रंग, कद, शारीरिक बनावट, बालों की प्रकृति अथवा किसी भाषा में दक्षता किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान का स्वतः प्रमाण नहीं मानी जा सकती।

हालांकि, यह समझना जरूरी है कि अदालत ने रविकुमार के सामुदायिक प्रमाणपत्र को अंतिम रूप से सही घोषित नहीं किया है। हाईकोर्ट ने विजिलेंस कमेटी के पुराने आदेश को इसलिए हटाया क्योंकि उसमें कुछ निष्कर्ष पर्याप्त आधार के बिना और कुछ अप्रासंगिक पहलुओं पर आधारित पाए गए। अब मामले की नए सिरे से जांच होगी और संबंधित प्राधिकारी को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय लेना होगा।

निष्कर्ष

मद्रास हाईकोर्ट के इस आदेश ने साफ किया है कि किसी व्यक्ति के रंग-रूप, कद-काठी या भाषा के आधार पर उसकी जाति अथवा धार्मिक पहचान का निष्कर्ष निकालना कानूनी रूप से पर्याप्त आधार नहीं है। साथ ही, इस मामले में अंतिम निर्णय अभी बाकी है क्योंकि हाईकोर्ट ने प्रमाणपत्र की वैधता पर अंतिम मुहर लगाने के बजाय मामले को पुनः जांच के लिए भेजा है। आगे विजिलेंस कमेटी की नई जांच और उसके बाद आने वाला आदेश इस विवाद की अगली कानूनी दिशा तय करेगा।

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