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धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण नहीं मिलेगा,इस्लाम अपनाने वालों के पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

मद्रास हाईकोर्ट ने अपने फैसले में तमिलनाडु सरकार के आदेश को असंवैधानिक मानते हुए रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट के समक्ष यह मुद्दा भी था कि जाति और समुदाय की पहचान किस आधार पर निर्धारित की जानी चाहिए। अदालत ने कहा था कि संबंधित अधिसूचित समुदायों की सदस्यता निर्धारित नियमों और मानदंडों के अनुसार तय होती है। धर्म बदलने मात्र से किसी व्यक्ति को...

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Supreme Court
Gauravshali Bharat News
  • October 15, 2026 11:55 am IST, Published 1 hour ago

नयी दिल्लीः  धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण का लाभ मिलता रहेगा या नहीं, इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था के तहत पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जाति से संबंधित व्यक्ति के धर्म बदलकर किसी अन्य धर्म को अपनाने के बाद पुराने सामाजिक दर्जे के आधार पर आरक्षण का दावा स्वतः स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट के मुताबिक, हिंदू सामाजिक व्यवस्था में मौजूद सामाजिक पिछड़ेपन को धर्म परिवर्तन के बाद दूसरी धार्मिक व्यवस्था में सीधे स्थानांतरित नहीं माना जा सकता।

यह मामला तमिलनाडु सरकार की ओर से जारी उस सरकारी आदेश से जुड़ा है, जिसके तहत इस्लाम अपनाने वाले कुछ लोगों को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में शामिल कर आरक्षण का लाभ देने की अनुमति दी गई थी। मद्रास हाईकोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया था। इसके बाद राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। अब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा है।

मामले की सुनवाई जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने की। अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या हिंदू सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जाति से जुड़े किसी व्यक्ति को इस्लाम अपनाने के बाद धर्म परिवर्तन के आधार पर पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में शामिल किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में कहा कि आरक्षण का दावा संबंधित समुदाय की कानूनी और सामाजिक स्थिति के आधार पर तय होगा। केवल धर्म परिवर्तन करने से पहले की जातिगत पहचान के आधार पर दूसरे धार्मिक समुदाय में आरक्षण का अधिकार नहीं मिल जाता।

मद्रास हाईकोर्ट ने अपने फैसले में तमिलनाडु सरकार के आदेश को असंवैधानिक मानते हुए रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट के समक्ष यह मुद्दा भी था कि जाति और समुदाय की पहचान किस आधार पर निर्धारित की जानी चाहिए। अदालत ने कहा था कि संबंधित अधिसूचित समुदायों की सदस्यता निर्धारित नियमों और मानदंडों के अनुसार तय होती है। धर्म बदलने मात्र से किसी व्यक्ति को किसी अन्य अधिसूचित समुदाय का सदस्य नहीं माना जा सकता।

इस मामले में लब्बाई, मरक्कायर, राउथर और दक्कानी मुस्लिम जैसे समुदायों का भी उल्लेख हुआ। ये समुदाय तमिलनाडु में पिछड़ा वर्ग की श्रेणियों से जुड़े सरकारी वर्गीकरण के संदर्भ में चर्चा में रहे हैं। अदालत के सामने यह सवाल था कि क्या किसी अन्य पिछड़े वर्ग से आने वाला व्यक्ति इस्लाम अपनाने के बाद इन समुदायों के लिए निर्धारित श्रेणी में शामिल होने का दावा कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने स्पष्ट किया कि इस तरह का दावा केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।

दूसरी ओर, तमिलनाडु सरकार ने अपनी दलील में कहा था कि सरकारी आदेश का उद्देश्य कोई नई पिछड़ा वर्ग श्रेणी बनाना नहीं था। राज्य सरकार के मुताबिक, यह आदेश तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिश के आधार पर जारी किया गया था। सरकार का तर्क था कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत किसी व्यक्ति को धर्म अपनाने की स्वतंत्रता है और केवल धर्म परिवर्तन के कारण सामाजिक तथा शैक्षणिक रूप से पिछड़े व्यक्ति को आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

हालांकि, अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार की चुनौती स्वीकार नहीं की और मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इस निर्णय से धर्म परिवर्तन और आरक्षण के बीच संबंध को लेकर चल रही कानूनी बहस में एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण का दावा संबंधित श्रेणी के लिए लागू संवैधानिक प्रावधानों, कानूनी नियमों और पात्रता की शर्तों के अनुसार ही निर्धारित किया जाएगा।

यह फैसला सामाजिक न्याय, धार्मिक स्वतंत्रता और आरक्षण की पात्रता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा को फिर से केंद्र में लाता है। हालांकि, आरक्षण के नियम अलग-अलग श्रेणियों और लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार भिन्न हो सकते हैं। इसलिए इस फैसले को प्रत्येक धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति पर सभी प्रकार के आरक्षण के संबंध में एक समान नियम मानने के बजाय, मामले के तथ्यों और संबंधित कानूनी श्रेणी के संदर्भ में समझना जरूरी है।

 

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