गुवाहाटी। परिवार से जुड़े विवादों में लगातार बढ़ती कानूनी लड़ाइयों के बीच सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस एन.वी. अंजारिया ने कहा है कि ऐसे मामलों के समाधान में केवल अदालती फैसला ही पर्याप्त नहीं हो सकता। उन्होंने परिवार विवादों में Alternative Dispute Resolution (ADR), खासकर मध्यस्थता, की भूमिका पर जोर दिया। यह टिप्पणी 27 सितंबर 2026 को गुवाहाटी में आयोजित ईस्टर्न जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस के समापन सत्र में उनके मुख्य वक्तव्य के दौरान सामने आई।
दो दिवसीय सम्मेलन का विषय “ADR vs Adjudication in Family Disputes: Challenges and Way Forward” था। इसका आयोजन सुप्रीम कोर्ट की कमेटी फॉर फैमिली कोर्ट मैटर्स ने गौहाटी हाईकोर्ट के सहयोग से किया था। सम्मेलन में न्यायाधीशों, न्यायिक अधिकारियों, वरिष्ठ अधिवक्ताओं, मध्यस्थों और अन्य विशेषज्ञों ने परिवार से जुड़े विवादों के संवेदनशील एवं समयबद्ध समाधान पर विचार-विमर्श किया।
परिवार विवाद सामान्य मुकदमों से अलग
जस्टिस अंजारिया ने परिवार से जुड़े मामलों की प्रकृति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ये केवल कानूनी विवाद नहीं होते, बल्कि इनके पीछे मानवीय भावनाएं और संवेदनशील रिश्ते भी जुड़े होते हैं। ऐसे मामलों में पति-पत्नी, माता-पिता, बच्चे और अन्य पारिवारिक सदस्य लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बन सकते हैं।
उनके अनुसार, अदालत में किसी विवाद का कानूनी समाधान निकलने के बावजूद जरूरी नहीं कि परिवार के बीच मौजूद मूल समस्या समाप्त हो जाए। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि अदालतों या न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से निकाले गए समाधान कुछ परिस्थितियों में पक्षकारों को कृत्रिम महसूस हो सकते हैं और उन्हें ऐसा लग सकता है कि निर्णय उन पर थोप दिया गया है।
मध्यस्थता को बताया महत्वपूर्ण विकल्प
जस्टिस अंजारिया ने परिवार विवादों के लिए मध्यस्थता को महत्वपूर्ण ADR माध्यम बताया। मध्यस्थता में पक्षकार किसी तटस्थ मध्यस्थ की सहायता से बातचीत के जरिए विवाद के समाधान तक पहुंचने का प्रयास करते हैं। इसका उद्देश्य कई मामलों में ऐसा समाधान तलाशना होता है जिसे दोनों पक्ष स्वीकार कर सकें।
परिवार विवादों में इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि कई मामलों में कानूनी रिश्ते के साथ-साथ बच्चों की देखभाल, मुलाकात, भरण-पोषण, संपत्ति और भविष्य की पारिवारिक व्यवस्था जैसे सवाल जुड़े होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की ओर से सम्मेलन को लेकर जारी आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, कार्यक्रम में घरेलू हिंसा और वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण से लेकर विवाह, तलाक, दांपत्य अधिकार, बच्चों की कस्टडी, साझा अभिभावकत्व, मुलाकात के अधिकार, भरण-पोषण, गुजारा भत्ता तथा संपत्ति के बंटवारे जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
परिवारों को साथ रखने पर चिंता
अपने संबोधन में जस्टिस अंजारिया ने भारतीय सामाजिक परंपरा में परिवार और सामूहिकता के महत्व का उल्लेख करते हुए मौजूदा समय में परिवारों के भीतर बढ़ते विवादों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज चुनौती केवल मुकदमे का निपटारा करने की नहीं, बल्कि परिवारों को टूटने से बचाने की भी है। उनके वक्तव्य में “वसुधैव कुटुंबकम” की अवधारणा का भी संदर्भ आया।
उन्होंने परिवार विवादों के समाधान को व्यापक सामाजिक प्रक्रिया से भी जोड़ा। उनके अनुसार, ऐसे मामलों में न्यायिक व्यवस्था की भूमिका केवल कानूनी अधिकार तय करने तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि परिस्थितियों के अनुरूप संवेदनशील समाधान तलाशना भी महत्वपूर्ण है।
सम्मेलन में ADR और न्यायिक प्रक्रिया पर मंथन
गुवाहाटी में आयोजित सम्मेलन का उद्देश्य ADR और पारंपरिक न्यायिक प्रक्रिया के बीच उचित संतुलन पर चर्चा करना था। सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक प्रेस रिलीज के अनुसार, सम्मेलन में परिवार न्यायालयों में बेहतर मानव संसाधन और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के मुद्दे पर भी विचार हुआ। साथ ही, पूर्वी क्षेत्र के सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के परिवार मामलों से जुड़े निर्णयों का एक ई-कम्पेंडियम भी जारी किया गया।
सम्मेलन का उद्घाटन सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने किया था। वह सुप्रीम कोर्ट की कमेटी फॉर फैमिली कोर्ट मैटर्स की अध्यक्ष भी हैं। उद्घाटन सत्र में जस्टिस यूजीडल भुयान और जस्टिस एन.वी. अंजारिया भी प्रमुख अतिथियों में शामिल रहे। गौहाटी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आशुतोष कुमार ने उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता की।
लंबी कानूनी प्रक्रिया पर भी सवाल
सम्मेलन में परिवार न्यायालयों में मामलों के निपटारे की प्रक्रिया को अधिक संवेदनशील और प्रभावी बनाने पर जोर दिया गया। उद्घाटन सत्र में जस्टिस नागरत्ना ने भी परिवार मामलों में मध्यस्थता और अन्य ADR माध्यमों के व्यापक इस्तेमाल की जरूरत पर बात की थी। उन्होंने परिवार विवादों में लंबी कानूनी प्रक्रिया के संभावित प्रभावों को रेखांकित किया।
परिवार विवादों की प्रकृति को देखते हुए यह चर्चा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी मुकदमे का प्रभाव केवल संबंधित पक्षों तक सीमित नहीं रहता। बच्चों की पढ़ाई, अभिभावकों से उनके संबंध, आर्थिक जिम्मेदारियां और भविष्य की पारिवारिक व्यवस्था भी इससे प्रभावित हो सकती है।
आगे की राह में संवेदनशील न्याय पर जोर
गुवाहाटी सम्मेलन से सामने आया संदेश यह है कि परिवार विवादों में न्यायिक फैसला और ADR एक-दूसरे के विकल्प के रूप में ही नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग भूमिकाओं वाले माध्यमों के रूप में देखे जा सकते हैं। जहां किसी मामले में न्यायिक निर्णय आवश्यक हो सकता है, वहीं उपयुक्त मामलों में मध्यस्थता के जरिए पक्षकारों को संवाद और सहमति का अवसर मिल सकता है।
जस्टिस अंजारिया का वक्तव्य इसी व्यापक बहस का हिस्सा है कि परिवार से जुड़े विवादों में कानून के साथ मानवीय संवेदनशीलता को किस तरह जोड़ा जाए। सम्मेलन में हुई चर्चाओं का केंद्रीय उद्देश्य भी ऐसे तंत्र को मजबूत करना था, जिससे परिवार संबंधी मामलों का समाधान प्रभावी, संवेदनशील और समयबद्ध तरीके से किया जा सके।