किशोरावस्था का केस नौकरी में नहीं बनेगा बाधा, HC का फैसला

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किशोरावस्था में दर्ज आपराधिक मामले और सरकारी नौकरी के बीच संबंध को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के किशोरावस्था के दौरान दर्ज आपराधिक मामले को केवल इस आधार पर उसकी सरकारी नौकरी के रास्ते में बाधा नहीं बनाया जा सकता कि वह मामला […]

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  • August 21, 2026 4:00 pm IST, Published 15 minutes ago

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किशोरावस्था में दर्ज आपराधिक मामले और सरकारी नौकरी के बीच संबंध को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के किशोरावस्था के दौरान दर्ज आपराधिक मामले को केवल इस आधार पर उसकी सरकारी नौकरी के रास्ते में बाधा नहीं बनाया जा सकता कि वह मामला बाद में उसके वयस्क जीवन में सामने आया। अदालत ने मामले की परिस्थितियों, याचिकाकर्ता की उम्र और किशोर न्याय कानून की भावना को ध्यान में रखते हुए पूर्व आरक्षी की बर्खास्तगी रद्द करते हुए उसे राहत दी।

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मामला केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) में आरक्षी के पद पर नियुक्त चंद्रेश्वर प्रसाद यादव से जुड़ा था। रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता वर्ष 2003 में सीआरपीएफ में आरक्षी के पद पर भर्ती हुआ था। बाद में प्रशिक्षण के दौरान उसके चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया में एक पुराने आपराधिक मामले का उल्लेख सामने आया। यह मामला वर्ष 2001 में आजमगढ़ में दर्ज किया गया था। इसी आधार पर उसकी सेवाएं वर्ष 2004 में समाप्त कर दी गई थीं।

चरित्र सत्यापन में सामने आया था पुराना मामला

प्राप्त विवरण के मुताबिक, चरित्र सत्यापन के दौरान अधिकारियों को पता चला कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आजमगढ़ में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज था। आरोपों में आईपीसी की धारा 427, 323, 504 और 506 का उल्लेख किया गया था। याचिकाकर्ता ने अपने चरित्र सत्यापन फॉर्म में इस मामले का उल्लेख नहीं किया था। इसी तथ्य को आधार बनाकर विभागीय कार्रवाई की गई और अंततः उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।

याचिकाकर्ता ने विभागीय आदेश के खिलाफ कानूनी रास्ता अपनाया। उसके पक्ष की ओर से अदालत में यह महत्वपूर्ण तर्क रखा गया कि जिस समय उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई थी, उस समय वह नाबालिग था। इसलिए किशोर न्याय कानून के तहत उस अवधि के आपराधिक मामले को उसके भविष्य के रोजगार पर सामान्य आपराधिक रिकॉर्ड की तरह प्रभावी नहीं माना जाना चाहिए।

करीब 20 साल तक नौकरी से बाहर रहा कर्मचारी

इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण परिस्थितियों में से एक यह भी रही कि याचिकाकर्ता लंबे समय तक सरकारी सेवा से बाहर रहा। रिपोर्ट के अनुसार, वह करीब 20 वर्षों से नौकरी से बाहर था और मामला लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया में लंबित रहा। हाईकोर्ट ने इसी पृष्ठभूमि को देखते हुए उसे राहत देने का आदेश दिया।

अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता को 25 प्रतिशत बकाया वेतन देने का भी निर्देश दिया। यानी अदालत ने लंबे समय तक सेवा से बाहर रहने की अवधि के लिए संपूर्ण बकाया वेतन के बजाय 25 प्रतिशत बैक वेज देने का आदेश दिया। यह आदेश मामले की परिस्थितियों और न्याय के संतुलन को ध्यान में रखते हुए दिया गया।

किशोरावस्था में दर्ज केस पर कोर्ट की अहम टिप्पणी

न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। अदालत के समक्ष मुख्य सवाल यह था कि किशोरावस्था में दर्ज आपराधिक मामले को क्या वयस्क होने के बाद सरकारी नौकरी के लिए प्रतिकूल आधार माना जा सकता है।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्याम सरन श्रीवास्तव ने दलील दी कि सितंबर 2001 में जब प्राथमिकी दर्ज हुई थी, तब याचिकाकर्ता नाबालिग था। इसलिए किशोर न्याय (बालकों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2000 के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए उस पुराने मामले का असर उसके वर्तमान रोजगार पर नहीं पड़ना चाहिए।

दलील में किशोर न्याय कानून की धारा 19 और 21 का भी उल्लेख किया गया। पक्ष की ओर से कहा गया कि कानून का उद्देश्य किशोरों को उनके बचपन में हुई गलतियों के कारण जीवनभर कलंकित होने से बचाना है। यदि किशोरावस्था में दर्ज मामला वयस्क होने के बाद भी रोजगार के अवसरों को प्रभावित करता रहे, तो पुनर्वास और सामाजिक पुनर्स्थापन की मूल भावना कमजोर हो सकती है।

केंद्र सरकार ने भी याचिका का विरोध किया

मामले में केंद्र सरकार की ओर से अधिवक्ता रवि प्रकाश सिंह ने याचिका का विरोध किया। रिपोर्ट के अनुसार, सरकार की ओर से यह तर्क रखा गया कि याचिकाकर्ता ने चरित्र सत्यापन के दौरान तथ्य छिपाए थे और इसी आधार पर उसकी नियुक्ति के बाद कार्रवाई की गई थी।

सरकार की ओर से अदालत के समक्ष यह तथ्य भी रखा गया कि याचिकाकर्ता को 28 फरवरी 2005 को संबंधित आपराधिक मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा बरी किया जा चुका था। यह तथ्य पुनरीक्षण प्राधिकारी के सामने भी रखा गया था, लेकिन उस स्तर पर इस पर अपेक्षित विचार नहीं किया गया।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला

हाईकोर्ट ने मामले पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी संदर्भ लिया। रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने अवतार सिंह बनाम भारत संघ (2016) के फैसले में दिए गए सिद्धांतों का उल्लेख किया। इस फैसले में आपराधिक मामलों और सरकारी रोजगार में चरित्र सत्यापन से जुड़े महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए गए थे।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि सरकारी नौकरी के मामलों में उम्मीदवार के चरित्र सत्यापन और आपराधिक इतिहास का मूल्यांकन करते समय परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विशेष रूप से जब मामला उस समय का हो जब संबंधित व्यक्ति किशोर था, तो उसके मामले को वयस्क व्यक्ति के आपराधिक इतिहास के समान नजरिए से देखना उचित नहीं होगा।

किशोर न्याय कानून का उद्देश्य पुनर्वास भी

किशोर न्याय व्यवस्था का मूल उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि बच्चों और किशोरों के सुधार, संरक्षण और पुनर्वास पर भी जोर देना है। इसी कारण किशोरावस्था में किए गए कृत्यों के आधार पर किसी व्यक्ति के पूरे वयस्क जीवन को प्रभावित करने वाले परिणामों से बचाने की कानूनी व्यवस्था विकसित की गई है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस आदेश को इसी व्यापक कानूनी दृष्टिकोण के संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर आपराधिक मामले में सरकारी नौकरी स्वतः सुरक्षित हो जाएगी। प्रत्येक मामले में अपराध की प्रकृति, उम्मीदवार की उम्र, मामले का परिणाम, तथ्य छिपाने या बताने की स्थिति और संबंधित सेवा नियमों को अलग-अलग देखा जा सकता है।

पुराने मामले के बावजूद मिली राहत

इस मामले में हाईकोर्ट ने उपलब्ध परिस्थितियों को समग्र रूप से देखते हुए पूर्व आरक्षी को राहत प्रदान की। बर्खास्तगी का आदेश रद्द किया गया और लंबे समय से लंबित मामले के मद्देनजर 25 प्रतिशत बकाया वेतन देने का निर्देश दिया गया।

यह फैसला उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है जिनके खिलाफ किशोरावस्था के दौरान आपराधिक मामला दर्ज हुआ था और बाद में वही मामला उनके रोजगार या सरकारी सेवा में परेशानी का कारण बना। हालांकि, किसी भी समान मामले में राहत का दावा संबंधित तथ्यों और लागू कानूनों के आधार पर ही तय होगा।

निष्कर्ष: इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी का मुख्य संदेश यही है कि किशोरावस्था में दर्ज आपराधिक मामले को किसी व्यक्ति के पूरे वयस्क जीवन और रोजगार की संभावनाओं पर स्वतः नकारात्मक प्रभाव डालने वाला आधार नहीं माना जाना चाहिए। अदालत ने मामले की परिस्थितियों और किशोर न्याय कानून की भावना को महत्व देते हुए राहत प्रदान की है। यह फैसला किशोर न्याय, पुनर्वास और सरकारी रोजगार में चरित्र सत्यापन से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ के रूप में देखा जा सकता है।

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