लखनऊ। उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर सड़क की गुणवत्ता को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। एक्सप्रेसवे के कुछ हिस्सों में नई बिछाई गई तारकोल की परत उखड़ने लगी है। कई स्थानों पर सड़क की ऊपरी सतह खराब होने के साथ गड्ढेनुमा स्थिति भी दिखाई दे रही है। इससे एक्सप्रेसवे पर सफर करने वाले वाहन चालकों की चिंता बढ़ गई है। खास तौर पर बारिश के बीच सड़क की परत उखड़ने से दुर्घटना का खतरा भी बढ़ सकता है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एक्सप्रेसवे पर सड़क खराब होने की समस्या को दूर करने के लिए अलग-अलग स्थानों पर मरम्मत और दोबारा लेपन का काम कराया जा रहा है। कानपुर से लखनऊ जाने वाली लेन में किलोमीटर 48 से 49 के बीच करीब एक किलोमीटर हिस्से पर दोबारा तारकोल बिछाया गया है। वहीं किलोमीटर 46.9 से 47 के बीच भी सड़क की सतह पर नए सिरे से लेपन का काम किया गया है। इसके बावजूद कुछ स्थानों पर तारकोल की परत हल्की पड़ने और उखड़ने की शिकायत सामने आ रही है।
एक्सप्रेसवे पर फिर क्यों उठ रहे सवाल?
लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे को उत्तर प्रदेश की प्रमुख सड़क परियोजनाओं में शामिल किया गया है। इस मार्ग से राजधानी लखनऊ और औद्योगिक शहर कानपुर के बीच आवागमन को आसान बनाने की उम्मीद की गई थी। एक्सप्रेसवे के निर्माण और संचालन से यात्रियों को कम समय में दोनों शहरों के बीच सफर की सुविधा मिलने की बात कही गई थी।
लेकिन सड़क के कुछ हिस्सों में लगातार सामने आ रही खामियों ने निर्माण गुणवत्ता और रखरखाव को लेकर चर्चा तेज कर दी है। खास बात यह है कि समस्या केवल एक स्थान तक सीमित नहीं बताई जा रही है। अलग-अलग किलोमीटर पर सड़क की ऊपरी परत खराब होने और उसे दोबारा ठीक करने की जरूरत सामने आई है।
बारिश के मौसम में सड़क की सतह पर पानी का प्रभाव भी बढ़ जाता है। यदि सड़क की ऊपरी परत पर्याप्त मजबूत नहीं है या जल निकासी व्यवस्था प्रभावी नहीं है, तो तारकोल के उखड़ने की समस्या और बढ़ सकती है। यही वजह है कि एक्सप्रेसवे की सड़क पर दिखाई दे रही खामियों को लेकर यात्रियों के बीच सवाल उठना स्वाभाविक है।
63 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेसवे पर पहले भी आई शिकायतें
उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 63 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे के लगभग 42 किलोमीटर लंबे ग्रीनफील्ड हिस्से में लोकार्पण के बाद से ही कुछ खामियां सामने आने लगी थीं। 26 जुलाई को किलोमीटर 64 के आसपास सड़क धंसने का पहला मामला सामने आने की जानकारी दी गई थी।
इसके बाद सड़क के अलग-अलग हिस्सों में मरम्मत की जरूरत महसूस हुई। शुरुआती घटनाओं के बाद निर्माण एजेंसी और संबंधित टीमों की ओर से प्रभावित हिस्सों की निगरानी बढ़ाई गई। सड़क की स्थिति खराब होने पर तत्काल मरम्मत के लिए आवश्यक संसाधनों को भी तैयार रखने की बात सामने आई है।
बारिश के कारण कुछ स्थानों पर क्रैश बैरियर के पास धंसी मिट्टी को दोबारा भरने का काम भी किया गया। पानी के कारण मिट्टी के बहने की आशंका को देखते हुए कुछ हिस्सों को सीमेंट से मजबूत किए जाने की जानकारी है। इसके अलावा किलोमीटर 58.5 के आसपास उखड़े तारकोल को भी दुरुस्त किया गया।
तीन लेन वाले हिस्से में भी सामने आई समस्या
रिपोर्ट के अनुसार, एक्सप्रेसवे के तीन लेन वाले हिस्से की तीसरी लेन में भी कई स्थानों पर तारकोल उखड़ने की समस्या सामने आई है। किलोमीटर 46.9 से 47 और किलोमीटर 48 से 49 के बीच सड़क की स्थिति को देखते हुए पेट्रोलिंग टीम को सूचना दी गई और इसके बाद नए सिरे से लेपन का काम कराया गया।
सड़क पर नियमित पेट्रोलिंग के दौरान यदि कहीं तारकोल उखड़ता या सतह खराब होती दिखाई देती है तो संबंधित टीम को इसकी जानकारी दी जाती है। इसके बाद प्रभावित हिस्से में मरम्मत का काम कराया जा रहा है। यह व्यवस्था सड़क पर किसी बड़े नुकसान को समय रहते रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती है।
हालांकि, बार-बार मरम्मत की जरूरत पड़ना अपने आप में चिंता का विषय है। किसी नए या हाल में विकसित किए गए एक्सप्रेसवे पर सड़क की ऊपरी परत का जल्दी खराब होना यात्रियों के साथ-साथ परियोजना की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल खड़े करता है।
टोल प्लाजा के रैंप का हिस्सा भी धंसा
सड़क की मुख्य लेन के अलावा टोल प्लाजा के रैंप के एक हिस्से के धंसने की बात भी रिपोर्ट में सामने आई है। टोल प्लाजा का रैंप यातायात के लिए महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, क्योंकि यहां वाहन गति कम करते हैं और लेन बदलने तथा कतार में आने-जाने की प्रक्रिया होती है।
ऐसे स्थान पर सड़क की सतह या रैंप में धंसाव होने पर वाहन चालकों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है। यदि समस्या को समय रहते ठीक नहीं किया जाए तो लगातार बारिश और भारी वाहनों के दबाव से स्थिति और बिगड़ सकती है।
यही कारण है कि एक्सप्रेसवे के मुख्य मार्ग के साथ-साथ टोल प्लाजा, रैंप, क्रैश बैरियर के आसपास की मिट्टी और जल निकासी व्यवस्था की नियमित जांच बेहद जरूरी हो जाती है।
सड़क खराब होते ही शुरू हो रही मरम्मत
निर्माण एजेंसी की ओर से भविष्य में सड़क खराब होने की स्थिति में तत्काल मरम्मत के लिए मशीनों और सामग्री की व्यवस्था किए जाने की जानकारी है। एक्सप्रेसवे के कई हिस्सों में तारकोल, मिक्स गिट्टी, रोलर और बुलडोजर जैसे संसाधन किनारे तैयार रखे गए हैं।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह बताया जा रहा है कि बारिश के दौरान कहीं सड़क की ऊपरी परत उखड़ती है तो टीम को मौके पर भेजकर तत्काल पेचवर्क किया जा सके। इससे सड़क पर बने छोटे गड्ढों या क्षतिग्रस्त हिस्सों को बड़ा होने से पहले नियंत्रित किया जा सकता है।
हालांकि, विशेषज्ञ दृष्टिकोण से किसी भी एक्सप्रेसवे की दीर्घकालिक गुणवत्ता केवल तत्काल पेचवर्क से तय नहीं होती। सड़क के बेस, ड्रेनेज, बिटुमिनस लेयर, भारी वाहनों के दबाव और निर्माण के दौरान अपनाई गई तकनीकी प्रक्रिया की भी भूमिका होती है। इसलिए बार-बार मरम्मत के साथ मूल कारण की जांच भी जरूरी है।
जल निकासी व्यवस्था पर भी नजर जरूरी
बारिश के मौसम में किसी भी हाईवे या एक्सप्रेसवे की मजबूती का बड़ा परीक्षण होता है। यदि सड़क के किनारे पानी की निकासी सही तरीके से नहीं हो तो पानी सड़क की परत के नीचे पहुंच सकता है। इससे मिट्टी कमजोर होने और सड़क में धंसाव की आशंका बढ़ जाती है।
लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे के प्रभावित हिस्सों में भी जल निकासी व्यवस्था को लेकर निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है। रिपोर्ट के अनुसार, कई स्थानों पर नालियों को चौड़ा करने का काम भी किया गया है। इसका उद्देश्य बारिश के पानी को सड़क से दूर निकालना और सड़क के किनारे जलभराव को रोकना है।
यदि जल निकासी व्यवस्था प्रभावी रहती है तो बारिश के कारण सड़क की संरचना को होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। ऐसे में सड़क की मरम्मत के साथ ड्रेनेज सिस्टम की जांच भी जरूरी मानी जा रही है।
वाहन चालकों के लिए क्या है चिंता की बात?
एक्सप्रेसवे पर सड़क की सतह खराब होने का सबसे बड़ा खतरा तेज गति से चलने वाले वाहनों को होता है। अचानक उखड़ा हुआ तारकोल, गड्ढा या सड़क का असमान हिस्सा वाहन का संतुलन प्रभावित कर सकता है। बारिश के समय सड़क पर पानी जमा होने की स्थिति में खराब हिस्से का सही अनुमान लगाना भी मुश्किल हो जाता है।
ऐसे में वाहन चालकों को विशेष रूप से मरम्मत वाले हिस्सों में गति नियंत्रित रखने, लगाए गए ट्रैफिक कोन और बैरिकेडिंग का पालन करने तथा आगे चल रहे वाहनों से पर्याप्त दूरी बनाए रखने की जरूरत है।
एक्सप्रेसवे पर काम चलने वाले हिस्सों में सड़क किनारे मशीनें और निर्माण सामग्री भी मौजूद हो सकती है। इसलिए वाहन चालकों को संकेतक और चेतावनी बोर्ड देखकर ही आगे बढ़ना चाहिए।
आगे की चुनौती सड़क की गुणवत्ता बनाए रखना
लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे से यात्रियों को बेहतर और तेज कनेक्टिविटी की उम्मीद है। ऐसे में सड़क की गुणवत्ता बनाए रखना परियोजना की सफलता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि किसी स्थान पर शुरुआती स्तर पर ही सड़क की परत खराब होती है तो समय रहते तकनीकी जांच और स्थायी समाधान किया जाना जरूरी है।
बार-बार पेचवर्क करने के बजाय यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तारकोल उखड़ने या सड़क धंसने की मूल वजह क्या है। यदि कहीं जल निकासी, मिट्टी की मजबूती, बेस लेयर या निर्माण सामग्री से संबंधित समस्या है तो उसे स्थायी रूप से दूर करना आवश्यक होगा।
फिलहाल राहत की बात यह है कि प्रभावित हिस्सों में मरम्मत और निगरानी का काम किया जा रहा है। पेट्रोलिंग टीमों की सक्रियता और मौके पर मशीनरी की उपलब्धता से छोटी समस्याओं को बड़ा बनने से पहले नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
लेकिन एक्सप्रेसवे जैसे महत्वपूर्ण मार्ग पर यात्रियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मरम्मत के बाद सड़क की स्थिति कितनी स्थायी रहती है और बारिश के दौरान एक्सप्रेसवे के बाकी हिस्से किस तरह प्रदर्शन करते हैं।
निष्कर्ष: लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर सड़क की परत उखड़ने और कुछ स्थानों पर धंसाव की घटनाओं ने एक बार फिर निर्माण गुणवत्ता, जल निकासी और रखरखाव पर ध्यान केंद्रित किया है। तत्काल मरम्मत से फिलहाल यातायात व्यवस्था को संभालने में मदद मिल रही है, लेकिन लंबे समय के लिए स्थायी समाधान और नियमित तकनीकी निरीक्षण जरूरी होगा। यात्रियों की सुरक्षा और एक्सप्रेसवे की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए सड़क की गुणवत्ता पर लगातार नजर रखना सबसे अहम चुनौती है।