उत्तराखंड में MBBS सीट का खेल: 45 लाख, फर्जी सर्टिफिकेट

उत्तराखंड में मेडिकल कॉलेजों में MBBS दाखिले से जुड़ा कथित फर्जीवाड़ा लगातार बड़ा रूप लेता जा रहा है।

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  • October 4, 2026 9:48 am IST, Published 45 minutes ago

देहरादून। उत्तराखंड में मेडिकल कॉलेजों में MBBS दाखिले से जुड़ा कथित फर्जीवाड़ा लगातार बड़ा रूप लेता जा रहा है। फर्जी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों के जरिए मेडिकल सीट हासिल करने के आरोपों की जांच अब एक व्यापक नेटवर्क तक पहुंच गई है। जांच में कथित तौर पर ऐसे दस्तावेज सामने आए हैं, जिनमें गलत पते, फर्जी रिश्ते और संदिग्ध प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है। मामले ने राज्य की मेडिकल काउंसलिंग और प्रमाणपत्र सत्यापन व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कुछ मामलों में MBBS सीट दिलाने के नाम पर अभ्यर्थियों के परिवारों से लाखों रुपये लिए जाने का आरोप है। एक मामले में करीब 45 लाख रुपये में MBBS सीट दिलाने का सौदा किए जाने की जानकारी जांच एजेंसियों के सामने आई है। पुलिस ने इस प्रकरण में गिरफ्तारियां भी की हैं और पूरे नेटवर्क की भूमिका की पड़ताल जारी है।

फर्जी प्रमाणपत्रों से सीट हासिल करने का आरोप

मामले की शुरुआत उन दस्तावेजों की जांच से हुई, जिन्हें NEET-UG काउंसलिंग के दौरान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे का लाभ लेने के लिए प्रस्तुत किया गया था। अधिकारियों द्वारा सत्यापन के दौरान कुछ प्रमाणपत्र संदिग्ध पाए गए। संबंधित पते और दस्तावेजों की पुष्टि नहीं होने के बाद कई मामलों में दाखिले रद्द किए गए।

सरकारी स्तर पर सामने आई जानकारी के मुताबिक, कई अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों में गंभीर विसंगतियां मिलीं। कुछ मामलों में संबंधित परिवारों और प्रमाणपत्रों में दर्ज रिश्तों की वास्तविकता पर भी सवाल उठे। इसके बाद पुलिस और प्रशासन ने अलग-अलग स्तर पर जांच शुरू की।

45 लाख रुपये में सीट दिलाने का दावा

जांच में सामने आए सबसे चौंकाने वाले पहलुओं में MBBS सीट के बदले बड़ी रकम लिए जाने का आरोप है। रिपोर्टों के मुताबिक एक आरोपी पर अभ्यर्थी के परिवार से सीट दिलाने के नाम पर 45 लाख रुपये का सौदा करने का आरोप लगा है। एक अन्य मामले में तीन दाखिलों से जुड़ी रकम और भुगतान की भी जांच की जा रही है।

हालांकि, इन रकमों और आरोपों को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा। फिलहाल पुलिस और SIT विभिन्न आरोपियों, अभ्यर्थियों तथा दस्तावेज तैयार करने वाले लोगों के बीच कथित संबंधों की जांच कर रही है।

AI से बनाई गई फोटो ने बढ़ाया मामला

इस प्रकरण का एक और बेहद गंभीर पहलू सामने आया है। जांच में कथित तौर पर ऐसे प्रमाणपत्र मिले, जिनमें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की तस्वीर के तौर पर AI से तैयार की गई तस्वीर इस्तेमाल किए जाने का आरोप है। जांच एजेंसी को कुछ अलग-अलग अभ्यर्थियों के दस्तावेजों में एक ही व्यक्ति से संबंधित तस्वीर और समान प्रकार के विवरण मिलने की जानकारी दी गई है।

यदि जांच में यह आरोप प्रमाणित होते हैं तो मामला केवल फर्जी प्रमाणपत्र तैयार करने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि डिजिटल तकनीक के दुरुपयोग और सरकारी दस्तावेजों में हेरफेर का भी गंभीर उदाहरण बन सकता है।

कई दाखिले रद्द, जांच का दायरा बढ़ा

फर्जी या संदिग्ध प्रमाणपत्रों के आधार पर मिले दाखिलों पर कार्रवाई शुरू हो चुकी है। अधिकारियों ने कुछ MBBS प्रवेश निरस्त किए हैं। सितंबर में चार छात्रों के दाखिले रद्द किए जाने की जानकारी सामने आई थी, जबकि बाद की जांच में संदिग्ध प्रमाणपत्रों की संख्या और बढ़ी। हाल में तीन और MBBS सीटों के आवंटन को फर्जी प्रमाणपत्रों से जुड़ी अनियमितताओं के कारण रद्द किए जाने की रिपोर्ट सामने आई।

जांच का दायरा अब केवल स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों तक सीमित नहीं बताया जा रहा है। स्थायी निवास, डोमिसाइल और अन्य आरक्षण संबंधी प्रमाणपत्रों की भी जांच की मांग उठी है। कुछ रिपोर्टों में सैकड़ों अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की दोबारा जांच किए जाने की बात सामने आई है।

350 से ज्यादा अभ्यर्थियों के दस्तावेजों पर नजर

मामला सामने आने के बाद राज्य में MBBS दाखिलों की पारदर्शिता को लेकर चिंता बढ़ गई है। रिपोर्टों के मुताबिक करीब 350 से अधिक वर्तमान और पूर्व MBBS अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की जांच के दायरे में आने की बात सामने आई थी। बाद की रिपोर्टों में संदिग्ध डोमिसाइल और अन्य प्रमाणपत्रों के आधार पर करीब 370 छात्रों से संबंधित दावों की जांच का उल्लेख किया गया है।

हालांकि, किसी भी अभ्यर्थी को केवल जांच के दायरे में आने के आधार पर दोषी मानना उचित नहीं होगा। प्रत्येक मामले में दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही जिम्मेदारी तय की जाएगी।

SIT कर रही पूरे नेटवर्क की जांच

मामले की गंभीरता को देखते हुए देहरादून पुलिस की विशेष जांच टीम यानी SIT को जांच की जिम्मेदारी दी गई है। टीम कथित फर्जी प्रमाणपत्र तैयार कराने, अभ्यर्थियों से संपर्क करने, रकम के लेन-देन और मेडिकल कॉलेजों में दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया से जुड़े पहलुओं की जांच कर रही है।

जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कथित नेटवर्क में कितने लोग शामिल थे और क्या यह गतिविधि केवल कुछ मामलों तक सीमित थी या इसका नेटवर्क दूसरे राज्यों तक फैला हुआ था। रिपोर्टों में मेरठ समेत अन्य स्थानों से जुड़े लोगों की भूमिका की भी जांच का उल्लेख किया गया है।

मेडिकल एडमिशन सिस्टम पर उठे सवाल

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि MBBS में प्रवेश पूरी तरह मेरिट और निर्धारित पात्रता नियमों पर आधारित व्यवस्था से जुड़ा है। यदि कोई व्यक्ति फर्जी प्रमाणपत्र के जरिए आरक्षित सीट हासिल करता है तो इससे न केवल योग्य उम्मीदवार का अवसर प्रभावित होता है, बल्कि पूरी काउंसलिंग प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं।

अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया को और मजबूत किया जाए। डिजिटल रिकॉर्ड का मिलान, पुराने सरकारी अभिलेखों की जांच, प्रमाणपत्र जारी करने वाली संस्थाओं से सीधा सत्यापन और संदिग्ध दस्तावेजों की दोबारा जांच जैसे कदम भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

फिलहाल उत्तराखंड का यह कथित MBBS दाखिला फर्जीवाड़ा जांच के दौर में है। पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि इस नेटवर्क का वास्तविक आकार कितना बड़ा है, कितने दाखिले प्रभावित हुए और कथित रूप से फर्जी दस्तावेज तैयार कराने में कौन-कौन लोग शामिल थे। जब तक जांच पूरी नहीं होती, आरोपों को अंतिम सत्य मानने के बजाय उन्हें जांचाधीन मामला मानना जरूरी है।

स्रोत-आधारित तथ्य: उपलब्ध रिपोर्टों में फर्जी स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र, MBBS दाखिले रद्द होने, SIT जांच, गिरफ्तारियों और 45 लाख रुपये तक के कथित सौदे का उल्लेख है।

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