उत्तराखंड में बिजली संकट गहराया

पीक आवर्स में 350 मेगावाट की कमी; 10 रुपये यूनिट में भी नहीं मिल रही पर्याप्त बिजली देहरादून। बारिश के कारण कोयले की आपूर्ति प्रभावित होने और जलविद्युत उत्पादन में कमी के चलते उत्तराखंड में बिजली संकट गहरा गया है। पीक आवर्स में बिजली की मांग पूरी करने के लिए 10 रुपये प्रति यूनिट तक […]

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  • September 25, 2026 9:02 am IST, Published 54 minutes ago

पीक आवर्स में 350 मेगावाट की कमी; 10 रुपये यूनिट में भी नहीं मिल रही पर्याप्त बिजली

देहरादून। बारिश के कारण कोयले की आपूर्ति प्रभावित होने और जलविद्युत उत्पादन में कमी के चलते उत्तराखंड में बिजली संकट गहरा गया है। पीक आवर्स में बिजली की मांग पूरी करने के लिए 10 रुपये प्रति यूनिट तक कीमत चुकाने के बावजूद पर्याप्त बिजली उपलब्ध नहीं हो पा रही है। स्थिति के कारण उद्योगों, ग्रामीण क्षेत्रों और शहरों में बिजली कटौती और रोस्टरिंग करनी पड़ रही है।

उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीसीएल) के प्रबंध निदेशक पीसी ध्यानी के अनुसार, बिजली संकट की प्रमुख वजह जलविद्युत उत्पादन में गिरावट है। शाम 4 बजे से सुबह 7 बजे तक औसतन करीब 350 मेगावाट बिजली की कमी बनी हुई है।

जलविद्युत उत्पादन में 180 मेगावाट तक की कमी

यूपीसीएल के अनुसार, इस अवधि में उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड (यूजेवीएनएल) का पीक आवर्स उत्पादन वर्ष 2025 के करीब 1094 मेगावाट की तुलना में इस वर्ष घटकर लगभग 912 मेगावाट रह गया है।

इस तरह जलविद्युत उत्पादन में करीब 170 से 180 मेगावाट की कमी आई है। अधिकारियों के मुताबिक, नदियों में जल प्रवाह कम होने का असर बिजली उत्पादन पर पड़ा है।

केंद्रीय स्रोतों से भी कम मिल रही बिजली

केंद्रीय स्रोतों से मिलने वाली बिजली की उपलब्धता भी पिछले वर्ष के करीब 837 मेगावाट से घटकर लगभग 715 मेगावाट रह गई है।

इसके अलावा टिहरी पंप स्टोरेज परियोजना की दो इकाइयां तकनीकी कारणों से बंद हैं। इससे पीक आवर्स में करीब 100 मेगावाट क्षमता प्रभावित हुई है। यूनिट-5 18 जुलाई से और यूनिट-6 15 सितंबर से बंद बताई गई है।

कोयले की आपूर्ति प्रभावित होने से बढ़ा दबाव

बारिश के कारण कोयले की आपूर्ति प्रभावित होने से कोयला आधारित बिजली संयंत्रों पर भी दबाव बढ़ा है। इसका असर बिजली बाजार पर पड़ा है। यूपीसीएल के अनुसार, पीक आवर्स में बिजली बाजार से कुल जरूरत की केवल एक से दो प्रतिशत अतिरिक्त बिजली ही मिल पा रही है।

शाम के समय ग्रिड की आवृत्ति 49.50 हर्ट्ज तक गिरने के कारण उत्तरी क्षेत्रीय विद्युत वितरण केंद्र की ओर से अतिरिक्त बिजली लेने पर भी नियंत्रण लगाया गया है।

उद्योगों में कई घंटे की रोस्टरिंग

बिजली की कमी का सबसे ज्यादा असर औद्योगिक क्षेत्र के भट्ठी आधारित उद्योगों पर पड़ा है। 19-20 सितंबर को कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों में करीब 14 घंटे 15 मिनट की रोस्टरिंग हुई। 20-21 सितंबर को यह अवधि 13 घंटे 45 मिनट, 21-22 सितंबर को 15 घंटे और 22-23 सितंबर को 10 घंटे 40 मिनट रही।

23-24 सितंबर की रात रोस्टरिंग की अवधि घटकर करीब 6 घंटे 5 मिनट रही। ग्रामीण क्षेत्रों में भी 3 से 5 घंटे तक बिजली कटौती हुई। रुड़की, हल्द्वानी, काशीपुर, रुद्रपुर और ज्वालापुर जैसे शहर भी बिजली संकट से प्रभावित रहे।

केंद्र से 100 से 400 मेगावाट अतिरिक्त बिजली की मांग

यूपीसीएल बिजली बाजार से लगातार बिजली खरीद रहा है। इसके अलावा केंद्र से अलग-अलग महीनों के लिए 100 से 400 मेगावाट अतिरिक्त बिजली की मांग की गई है।

23 सितंबर की शाम से एक गैस आधारित मशीन को निर्धारित किया गया है। इससे करीब 90 मेगावाट अतिरिक्त बिजली उत्पादन होने की उम्मीद है।

पीक आवर्स के लिए पानी बचाने की कोशिश

बिजली संकट से निपटने के लिए जलविद्युत संयंत्रों को पीक आवर्स के दौरान अधिकतम क्षमता पर चलाने के निर्देश दिए गए हैं। वहीं, सौर ऊर्जा उपलब्ध रहने के दौरान तकनीकी रूप से संभव सीमा तक जलविद्युत उत्पादन कम करने को कहा गया है, ताकि पानी को बिजली की अधिक मांग वाले समय के लिए सुरक्षित रखा जा सके।

इसके अलावा अनुरक्षण से जुड़े काम रोस्टरिंग की अवधि में करने या उन्हें कुछ समय के लिए स्थगित करने के निर्देश भी दिए गए हैं। बिजली विभाग का प्रयास है कि उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग कर बिजली की कमी और कटौती को नियंत्रित किया जा सके।

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