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DU में 30 साल से नहीं खुला नया कॉलेज, RTI खुलासे ने चौंकाया

नई दिल्ली। देश के सबसे प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शामिल दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) को लेकर एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त जानकारी में खुलासा हुआ है कि वर्ष 1995 के बाद से दिल्ली विश्वविद्यालय में आर्ट्स, साइंस और कॉमर्स का कोई नया पारंपरिक कॉलेज स्थापित नहीं किया […]

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  • July 17, 2026 8:30 pm IST, Published 2 hours ago

नई दिल्ली। देश के सबसे प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शामिल दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) को लेकर एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त जानकारी में खुलासा हुआ है कि वर्ष 1995 के बाद से दिल्ली विश्वविद्यालय में आर्ट्स, साइंस और कॉमर्स का कोई नया पारंपरिक कॉलेज स्थापित नहीं किया गया है। वहीं दूसरी ओर विश्वविद्यालय में दाखिले के लिए आवेदन करने वाले छात्रों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। सीमित सीटों और बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने उच्च शिक्षा की उपलब्धता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार शैक्षणिक सत्र 2026-27 में दिल्ली विश्वविद्यालय में 2.73 लाख से अधिक छात्रों ने पंजीकरण कराया, जबकि विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर पर उपलब्ध सीटों की संख्या मात्र 71,624 है। इसका अर्थ है कि प्रत्येक सीट के लिए कई छात्र प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं और बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को मनचाहे कॉलेज या पाठ्यक्रम में प्रवेश नहीं मिल पाता।

RTI से सामने आया बड़ा खुलासा

आरटीआई के माध्यम से प्राप्त दस्तावेजों में बताया गया है कि पिछले लगभग 30 वर्षों में दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत आर्ट्स, साइंस और कॉमर्स के किसी भी नए पारंपरिक कॉलेज की स्थापना नहीं हुई। हालांकि इस दौरान कुछ विशेष संस्थान, प्रोफेशनल कॉलेज और नए शैक्षणिक केंद्र विकसित किए गए, लेकिन सामान्य स्नातक शिक्षा के लिए नया पारंपरिक कॉलेज नहीं खोला गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली की आबादी, स्कूलों से निकलने वाले विद्यार्थियों की संख्या और उच्च शिक्षा की मांग में लगातार वृद्धि हुई है। इसके बावजूद कॉलेजों की संख्या लगभग स्थिर बनी हुई है, जिससे प्रवेश प्रक्रिया पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रतिस्पर्धी हो गई है।

हर साल बढ़ रही छात्रों की संख्या

दिल्ली विश्वविद्यालय देशभर के लाखों छात्रों की पहली पसंद माना जाता है। यहां की शैक्षणिक गुणवत्ता, अनुभवी शिक्षक, कम फीस, बेहतर प्लेसमेंट और राष्ट्रीय स्तर की पहचान के कारण हर वर्ष लाखों छात्र आवेदन करते हैं।

कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET) लागू होने के बाद देश के विभिन्न राज्यों से भी बड़ी संख्या में छात्र DU में प्रवेश के लिए आवेदन कर रहे हैं। इससे प्रतिस्पर्धा और अधिक बढ़ गई है। सीमित सीटों के कारण कई योग्य छात्र भी प्रवेश से वंचित रह जाते हैं।

सीटों और मांग के बीच बढ़ता अंतर

उच्च शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है तो उसी अनुपात में कॉलेजों और सीटों का विस्तार भी होना चाहिए। वर्तमान स्थिति में मांग और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।

विशेषज्ञों के अनुसार केवल मौजूदा कॉलेजों में सीटें बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। नई शैक्षणिक इमारतें, आधुनिक प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, खेल सुविधाएं और शिक्षकों की नियुक्ति के साथ नए कॉलेज स्थापित करना समय की आवश्यकता बन चुका है।

छात्रों को हो रही कठिनाई

दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं मिलने पर हजारों छात्रों को निजी विश्वविद्यालयों या अन्य राज्यों के संस्थानों का रुख करना पड़ता है। निजी संस्थानों की फीस अधिक होने के कारण आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विद्यार्थियों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

कई छात्र ऐसे भी होते हैं जिन्हें अपनी पसंद का विषय नहीं मिल पाता और उन्हें मजबूरी में अन्य पाठ्यक्रम चुनना पड़ता है। इसका असर उनके भविष्य और करियर की दिशा पर भी पड़ सकता है।

शिक्षा विशेषज्ञों ने जताई चिंता

शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली विश्वविद्यालय जैसी प्रतिष्ठित संस्था में पिछले तीन दशकों से नया पारंपरिक कॉलेज नहीं खुलना चिंताजनक है। उनका मानना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के उद्देश्यों को सफल बनाने के लिए उच्च शिक्षा संस्थानों का विस्तार जरूरी है।

विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में नए कॉलेज स्थापित किए जाएं ताकि छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिक अवसर मिल सकें। इससे विश्वविद्यालय पर बढ़ते दबाव को भी कम किया जा सकेगा।

डिजिटल और प्रोफेशनल शिक्षा पर बढ़ा फोकस

पिछले कुछ वर्षों में विश्वविद्यालय ने ऑनलाइन शिक्षा, स्किल आधारित पाठ्यक्रम, प्रोफेशनल प्रोग्राम और नई तकनीकों को बढ़ावा दिया है। इसके बावजूद पारंपरिक स्नातक शिक्षा की मांग अभी भी सबसे अधिक बनी हुई है। यही कारण है कि आर्ट्स, साइंस और कॉमर्स के कॉलेजों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।

भविष्य की चुनौती

आने वाले वर्षों में देश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों की संख्या और बढ़ने की संभावना है। ऐसे में यदि नए कॉलेजों और सीटों का विस्तार नहीं किया गया तो प्रवेश प्रक्रिया और अधिक कठिन हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा तक समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन को दीर्घकालिक योजना बनानी होगी।

आरटीआई से सामने आया यह खुलासा केवल दिल्ली विश्वविद्यालय तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि देश में बढ़ती उच्च शिक्षा की मांग और सीमित संसाधनों की ओर भी संकेत करता है। लाखों छात्रों के सपनों से जुड़े इस विषय पर अब सरकार, विश्वविद्यालय प्रशासन और नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अवसरों का विस्तार करना है। यदि समय रहते नए कॉलेजों की स्थापना और सीटों में बढ़ोतरी नहीं की गई तो आने वाले वर्षों में प्रतिस्पर्धा और अधिक तीव्र हो सकती है तथा बड़ी संख्या में योग्य छात्र उच्च शिक्षा से वंचित रह सकते हैं।

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