कोलकाता: बांग्लादेश से निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन ने एक बार फिर समान नागरिक संहिता (UCC) का खुलकर समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि भारत के साथ-साथ बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों में भी सभी नागरिकों के लिए समान कानून लागू होने चाहिए। उनके अनुसार, महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और भेदभाव को समाप्त करने के लिए समान नागरिक संहिता एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है।
कोलकाता में आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान तसलीमा नसरीन ने कहा कि किसी भी आधुनिक और लोकतांत्रिक समाज में कानून सभी नागरिकों के लिए समान होना चाहिए। उनका कहना था कि महिलाओं को आज भी कई प्रकार के कानूनी और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जिसे दूर करने के लिए व्यापक सुधारों की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि पिछले चार दशकों से वह समान नागरिक संहिता की समर्थक रही हैं और इसे लैंगिक समानता की दिशा में अहम कदम मानती हैं।
तसलीमा ने कहा कि दुनिया के अनेक विकसित देशों में नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था लागू है। उनका मानना है कि भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे दक्षिण एशियाई देशों में भी समान नागरिक संहिता पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए, ताकि धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण उत्पन्न असमानताओं को कम किया जा सके।
उन्होंने बांग्लादेश में महिलाओं की स्थिति पर भी चिंता जताई। तसलीमा का कहना था कि वहां कई महिलाओं को आज भी समान अधिकार प्राप्त नहीं हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि संपत्ति के अधिकार जैसे मामलों में महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं मिल पाता, जिससे सामाजिक और आर्थिक असमानता बनी रहती है।
तसलीमा नसरीन की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य में समान नागरिक संहिता से जुड़े प्रस्तावित मसौदे की समीक्षा के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का निर्णय लिया है। सरकार का कहना है कि किसी भी संभावित कानून के सामाजिक और कानूनी प्रभावों का व्यापक अध्ययन करने के बाद ही आगे की प्रक्रिया तय की जाएगी। तसलीमा ने बांग्लादेश की वर्तमान परिस्थितियों पर भी अपनी चिंता व्यक्त की। उन्होंने दावा किया कि वहां अल्पसंख्यक समुदायों, विशेष रूप से हिंदुओं, को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ स्थानों पर कट्टरपंथी विचारधाराओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। हालांकि, इन दावों पर संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया इस रिपोर्ट में उपलब्ध नहीं है।
उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी समाज में धार्मिक या सामाजिक आधार पर नफरत फैलाने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए नुकसानदायक है। उनके अनुसार, शिक्षा और संवैधानिक मूल्यों के माध्यम से समाज में समानता और सहिष्णुता को मजबूत किया जाना चाहिए।
तसलीमा नसरीन ने दिल्ली में हुए एक विरोध प्रदर्शन का भी उल्लेख किया और उसकी तुलना बांग्लादेश के छात्र आंदोलन से की। उन्होंने दावा किया कि कुछ आंदोलनों के पीछे कट्टरपंथी ताकतें सक्रिय हो सकती हैं। हालांकि, इस संबंध में उन्होंने जो बातें कहीं, वे उनके व्यक्तिगत विचार हैं और इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
लेखिका ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में असहमति और विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन यदि किसी आंदोलन का उद्देश्य सामाजिक विभाजन या हिंसा को बढ़ावा देना हो, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन्होंने नागरिक समाज से भी अपील की कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने की दिशा में कार्य करे।
समान नागरिक संहिता को लेकर देश में लंबे समय से बहस जारी है। समर्थकों का मानना है कि इससे सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी अधिकार सुनिश्चित होंगे और लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा। वहीं, कुछ सामाजिक और धार्मिक संगठन इसे विभिन्न समुदायों की व्यक्तिगत परंपराओं और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा विषय मानते हुए विस्तृत संवाद की आवश्यकता पर जोर देते हैं। तसलीमा नसरीन का ताजा बयान एक बार फिर यूसीसी, महिलाओं के अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक समानता जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ले आया है।