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बड़ी कंपनियों में घटेंगी नौकरियां, छोटे उद्यम बढ़ाएंगे रोजगार: नंदन नीलेकणी

नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के तेजी से बढ़ते प्रभाव के बीच इन्फोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणी ने रोजगार, शिक्षा और अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में एआई के कारण बड़े संगठनों में पारंपरिक नौकरियों की संख्या कम हो सकती है, जबकि छोटे और मध्यम […]

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  • August 7, 2026 2:10 pm IST, Published 2 hours ago

नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के तेजी से बढ़ते प्रभाव के बीच इन्फोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणी ने रोजगार, शिक्षा और अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में एआई के कारण बड़े संगठनों में पारंपरिक नौकरियों की संख्या कम हो सकती है, जबकि छोटे और मध्यम उद्यम रोजगार सृजन के सबसे बड़े केंद्र बनकर उभरेंगे। उनके अनुसार, भारत को एआई के बुनियादी ढांचे के बजाय उसके व्यावहारिक उपयोग पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान नंदन नीलेकणी ने कहा कि बड़ी कंपनियों में अधिकांश कार्य पहले से ही व्यवस्थित और निश्चित प्रक्रियाओं के अनुसार संचालित होते हैं। ऐसे वातावरण में ऑटोमेशन लागू करना अपेक्षाकृत आसान होता है, जिससे कई दोहराव वाले कार्य मशीनों और AI के जरिए किए जा सकते हैं। इसका असर पारंपरिक नौकरियों पर पड़ सकता है।

इसके विपरीत, उन्होंने कहा कि छोटे और मध्यम उद्यमों में कर्मचारी अक्सर एक साथ कई जिम्मेदारियां निभाते हैं। ऐसे कार्य पूरी तरह ऑटोमेट करना कठिन होता है। यही वजह है कि भविष्य में रोजगार सृजन का सबसे बड़ा अवसर इन्हीं छोटे कारोबारों में दिखाई देता है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि ऐसे उद्यमों के लिए नियमों को सरल बनाया जाए, उन्हें आसान ऋण उपलब्ध कराया जाए और बाजार तक पहुंच बढ़ाने के लिए बेहतर नीतियां तैयार की जाएं।

नीलेकणी ने कहा कि भारत को AI के क्षेत्र में वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए केवल चिप्स, डेटा सेंटर और बड़े लैंग्वेज मॉडल विकसित करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसके बजाय देश को शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य और सार्वजनिक सेवाओं जैसे क्षेत्रों में एआई आधारित व्यावहारिक समाधान विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए। उनका मानना है कि यदि AI का उपयोग लोगों की वास्तविक समस्याओं के समाधान में किया जाए, तो भारत इस क्षेत्र में वैश्विक पहचान बना सकता है।

उन्होंने भारतीय भाषाओं और संवाद शैली पर भी विशेष जोर दिया। उनके अनुसार, भारत में लोग बातचीत के दौरान अक्सर एक से अधिक भाषाओं का मिश्रण करते हैं। इसलिए AI प्रणालियों को भी इस बहुभाषी और मिश्रित संवाद शैली को समझने के लिए प्रशिक्षित करना आवश्यक होगा। इससे तकनीक का उपयोग अधिक सहज होगा और आम लोगों तक इसकी पहुंच बढ़ेगी।

नंदन नीलेकणी ने कहा कि AI का उद्देश्य केवल काम को स्वचालित करना नहीं होना चाहिए, बल्कि लोगों की उत्पादकता बढ़ाना भी होना चाहिए। यदि तकनीक को सही तरीके से अपनाया जाए तो कर्मचारी कम समय में अधिक प्रभावी ढंग से कार्य कर सकेंगे और नई तरह की नौकरियों के अवसर भी पैदा होंगे।

उन्होंने बदलते रोजगार बाजार को देखते हुए कर्मचारियों के लिए पोर्टेबल सोशल सिक्योरिटी सिस्टम की आवश्यकता पर भी बल दिया। उनके अनुसार, आज बड़ी संख्या में लोग नौकरी बदलते हैं या गिग इकोनॉमी का हिस्सा बन रहे हैं। ऐसे में पेंशन, बीमा, स्वास्थ्य लाभ और अन्य सामाजिक सुरक्षा सुविधाएं किसी एक कंपनी से जुड़ी नहीं होनी चाहिए, बल्कि कर्मचारी जहां भी जाए, उसके साथ स्थानांतरित हो सकें।

नीलेकणी ने डिजिटल क्रेडेंशियल्स की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनका कहना था कि कर्मचारियों की योग्यता, अनुभव और कौशल से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित और पोर्टेबल होने चाहिए, ताकि नौकरी बदलने की स्थिति में उन्हें बार-बार दस्तावेजी प्रक्रिया से न गुजरना पड़े। इससे भर्ती प्रक्रिया भी अधिक पारदर्शी और तेज होगी।

AI और डिजिटल तकनीकों का उपयोग युवाओं को नए अवसरों से जोड़ने और उनकी क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, वही जानकारों का मानना है कि नंदन नीलेकणी के सुझाव केवल तकनीकी विकास तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे रोजगार, उद्यमिता और सामाजिक सुरक्षा जैसे व्यापक मुद्दों को भी संबोधित करते हैं। यदि इन सुझावों पर प्रभावी ढंग से अमल किया जाता है, तो भारत AI के दौर में नवाचार और रोजगार दोनों क्षेत्रों में मजबूत स्थिति हासिल कर सकता है।

 

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