नई दिल्ली: निजी क्षेत्र में काम करने वाले लाखों कर्मचारियों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। लंबे समय से नौकरी और परिवार के बीच संतुलन बनाने की चुनौती झेल रहे कामकाजी माता-पिता को अब नए लेबर कोड के तहत बड़ी सुविधा मिलने जा रही है। केंद्र सरकार के नए श्रम कानूनों के प्रावधानों के अनुसार, निर्धारित मानकों को पूरा करने वाली कंपनियों को कर्मचारियों के छोटे बच्चों के लिए क्रेच (डे-केयर) की व्यवस्था करनी होगी। इससे कामकाजी माता-पिता अपने बच्चों की देखभाल को लेकर पहले की तुलना में अधिक निश्चिंत होकर काम कर सकेंगे।
यह व्यवस्था विशेष रूप से उन परिवारों के लिए राहत लेकर आएगी, जहां पति-पत्नी दोनों नौकरी करते हैं और छोटे बच्चों की देखभाल एक बड़ी चिंता बनी रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम महिलाओं की कार्यस्थल पर भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ कर्मचारियों की उत्पादकता और कार्य संतुष्टि में भी सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
क्या कहता है नया लेबर कोड?
सरकार द्वारा लागू किए जा रहे नए श्रम कानूनों में सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020 और ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस (OSHWC) कोड, 2020 के तहत क्रेच सुविधा को लेकर स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं। श्रम मंत्रालय की ओर से जारी स्पष्टीकरण के अनुसार, जिन संस्थानों में 50 या उससे अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं, वहां छह वर्ष तक की आयु वाले बच्चों के लिए क्रेच की व्यवस्था करना अनिवार्य होगा।
इसका उद्देश्य कर्मचारियों, विशेषकर महिला कर्मचारियों को बेहतर कार्य वातावरण उपलब्ध कराना है ताकि वे अपने करियर और परिवार दोनों की जिम्मेदारियों को संतुलित तरीके से निभा सकें।
कंपनी कैसे दे सकती है यह सुविधा?
नियमों के अनुसार कंपनियां अपने परिसर के भीतर या कार्यालय से निर्धारित दूरी के भीतर क्रेच स्थापित कर सकती हैं। यदि किसी संस्था के लिए अलग से क्रेच बनाना संभव नहीं है, तो वह आसपास की अन्य कंपनियों के साथ मिलकर साझा (Shared) क्रेच सुविधा भी संचालित कर सकती है।
यह व्यवस्था कंपनियों को लचीलापन देती है और कर्मचारियों को गुणवत्तापूर्ण बाल देखभाल सेवाएं उपलब्ध कराने का विकल्प भी प्रदान करती है।
महिलाओं को मिलेगा सबसे अधिक लाभ
देश में बड़ी संख्या में महिलाएं मातृत्व के बाद नौकरी छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं। इसका प्रमुख कारण बच्चों की देखभाल के लिए उचित व्यवस्था का अभाव होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि क्रेच सुविधा उपलब्ध होने से महिलाओं की नौकरी छोड़ने की दर में कमी आएगी और वे लंबे समय तक कार्यबल का हिस्सा बनी रह सकेंगी।
इसके अलावा, इससे लैंगिक समानता को भी बढ़ावा मिलेगा और निजी कंपनियों में महिलाओं की भागीदारी मजबूत होगी।
कर्मचारियों पर आर्थिक बोझ होगा कम
बड़े शहरों में निजी डे-केयर सेंटर की फीस कई हजार रुपये प्रतिमाह तक पहुंच जाती है। ऐसे में यदि कंपनी स्वयं यह सुविधा उपलब्ध कराती है या उसका खर्च वहन करती है, तो कर्मचारियों का आर्थिक बोझ काफी हद तक कम हो सकता है।
हालांकि, नियमों में सीधे नकद भुगतान का प्रावधान नहीं है, बल्कि कंपनियों को क्रेच सुविधा उपलब्ध करानी होगी। कई संस्थान कर्मचारियों के लिए अनुबंधित डे-केयर सेंटर की सुविधा भी उपलब्ध करा सकते हैं।
बच्चों की सुरक्षा और बेहतर देखभाल
क्रेच सुविधा का सबसे बड़ा लाभ बच्चों को मिलेगा। प्रशिक्षित स्टाफ की निगरानी में बच्चों की देखभाल, पोषण और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी। इससे माता-पिता भी काम के दौरान मानसिक तनाव से मुक्त रहेंगे और अपने कार्य पर बेहतर ध्यान दे पाएंगे।
उद्योग जगत की क्या राय?
कॉर्पोरेट क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक कार्य संस्कृति में कर्मचारी कल्याण बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। बेहतर सुविधाएं देने वाली कंपनियां प्रतिभाशाली कर्मचारियों को आकर्षित करने और लंबे समय तक बनाए रखने में सफल रहती हैं।
हालांकि कुछ उद्योग संगठनों का मानना है कि छोटे और मध्यम स्तर की कंपनियों के लिए यह व्यवस्था आर्थिक चुनौती बन सकती है। ऐसे में साझा क्रेच मॉडल एक व्यावहारिक समाधान साबित हो सकता है।
सरकार का उद्देश्य
सरकार का लक्ष्य कार्यस्थलों को अधिक सुरक्षित, समावेशी और परिवार के अनुकूल बनाना है। नए श्रम कानूनों के जरिए कर्मचारियों को बेहतर सामाजिक सुरक्षा और सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन प्रावधानों को प्रभावी तरीके से लागू किया गया, तो इसका लाभ लाखों निजी कर्मचारियों और उनके परिवारों को मिलेगा। इससे महिलाओं की रोजगार में भागीदारी बढ़ेगी, बच्चों की देखभाल बेहतर होगी और कंपनियों में सकारात्मक कार्य संस्कृति विकसित होगी।
नए लेबर कोड के तहत क्रेच सुविधा से जुड़े प्रावधान निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए राहत भरी पहल माने जा रहे हैं। हालांकि इसका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब कंपनियां नियमों का प्रभावी ढंग से पालन करें और कर्मचारियों को गुणवत्तापूर्ण बाल देखभाल सेवाएं उपलब्ध कराएं। आने वाले समय में यह व्यवस्था भारतीय कार्यस्थलों की संस्कृति में बड़ा बदलाव ला सकती है।