नई दिल्ली: मणिपुर हिंसा से जुड़े मामलों की सुनवाई में तेजी लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अदालतों के गठन का सुझाव दिया है। अदालत ने संकेत दिया कि गंभीर मामलों की सुनवाई के लिए अलग विशेष अदालतें बनाई जा सकती हैं, ताकि मुकदमों का निपटारा निर्धारित समय में किया जा सके और पीड़ितों को न्याय के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े।
सुनवाई के दौरान केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) से जुड़े मामलों की स्थिति पर भी चर्चा हुई। सुप्रीम कोर्ट ने जांच पूरी होने के बाद दाखिल की गई चार्जशीट और उसके बाद की न्यायिक प्रक्रिया की प्रगति की समीक्षा की।
अदालत के सामने रखी गई जानकारी के मुताबिक, CBI ने उसे सौंपे गए 31 मामलों में से 22 मामलों में चार्जशीट दाखिल की है। वहीं NIA की ओर से 30 मामलों में से 15 मामलों में आरोपपत्र दाखिल किए जाने की जानकारी सामने आई। इन मामलों में आगे की सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया को तेज करने पर जोर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि जिन मामलों में जांच पूरी हो चुकी है, उनमें मुकदमे की कार्यवाही अनावश्यक रूप से लंबित नहीं रहनी चाहिए। विशेष अदालतों के गठन से ऐसे मामलों की सुनवाई को प्राथमिकता देने और उन्हें तेजी से आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
मणिपुर में हिंसा के बाद कई गंभीर आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे। इनमें हिंसा, हत्या, आगजनी और अन्य अपराधों से जुड़े मामले शामिल हैं। विभिन्न मामलों की जांच केंद्रीय एजेंसियों को सौंपी गई है। ऐसे में जांच पूरी होने के बाद मुकदमे की प्रक्रिया समय पर शुरू होना अहम माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद मामलों की वास्तविक प्रगति पर नजर रखी जाए। जांच पूरी होने के बावजूद यदि अदालत में सुनवाई शुरू होने में लंबा समय लगता है, तो न्याय की प्रक्रिया प्रभावित होती है। विशेष अदालतों के जरिए इस अंतर को कम करने की कोशिश की जा सकती है।
अदालत के सुझाव के बाद अब यह महत्वपूर्ण होगा कि विशेष अदालतों के गठन और मामलों के आवंटन को लेकर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं। साथ ही CBI और NIA द्वारा दाखिल किए गए आरोपपत्र वाले मामलों में ट्रायल किस गति से आगे बढ़ता है, इस पर भी निगाह रहेगी।
मणिपुर हिंसा से जुड़े मामलों में निष्पक्ष जांच के साथ-साथ समयबद्ध सुनवाई भी बेहद महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में मामलों की प्रगति की समीक्षा से न्यायिक प्रक्रिया को गति मिलने की उम्मीद है। विशेष अदालतों का प्रस्ताव इसी दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है, जिसका अंतिम उद्देश्य लंबित मामलों का जल्द निपटारा और पीड़ित पक्षों को समय पर न्याय उपलब्ध कराना है।