नई दिल्ली: देश में जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन, सूखा प्रभावित क्षेत्रों तक पानी पहुंचाने और सिंचाई क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रस्तावित राष्ट्रीय नदी जोड़ो कार्यक्रम की मौजूदा स्थिति सामने आई है। सरकार ने अंतर-बेसिन जल अंतरण के लिए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना तैयार की है, जिसके तहत देशभर में नदियों को आपस में जोड़ने वाली 30 परियोजनाओं की पहचान की गई है। इनमें 16 परियोजनाएं प्रायद्वीपीय क्षेत्र और 14 परियोजनाएं हिमालयी क्षेत्र से संबंधित हैं।
इन परियोजनाओं के अध्ययन और विकास की जिम्मेदारी राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण यानी एनडब्ल्यूडीए को दी गई है। हालांकि सभी प्रस्तावित लिंक परियोजनाएं एक समान चरण में नहीं हैं। कई के लिए व्यवहार्यता रिपोर्ट पूरी हो चुकी है, कुछ की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी डीपीआर तैयार है, जबकि कुछ योजनाएं अभी प्रारंभिक अध्ययन के स्तर पर हैं।
राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना के तहत केन-बेतवा लिंक परियोजना फिलहाल कार्यान्वयन के चरण में पहुंचने वाली प्रमुख परियोजना है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से जुड़ी इस योजना की अनुमानित लागत करीब 44,605 करोड़ रुपये है।
परियोजना के माध्यम से लगभग 11.88 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा विकसित करने का लक्ष्य है। इसके अलावा करीब 62 लाख लोगों को पेयजल उपलब्ध कराने, 103 मेगावाट जल विद्युत तथा 27 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन की भी योजना है।
सरकार के अनुसार परियोजना की डीपीआर तैयार हो चुकी है और निर्माण कार्य शुरू किया जा चुका है। इस परियोजना को आगे बढ़ाते समय पर्यावरणीय प्रभाव, वन क्षेत्र, पुनर्वास और स्थानीय सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को भी योजना का हिस्सा बनाया गया है।
आंध्र प्रदेश की पोलावरम सिंचाई परियोजना में गोदावरी से कृष्णा बेसिन की ओर पानी के अंतरण का प्रावधान है। इसे राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दिया गया है और इसका क्रियान्वयन आंध्र प्रदेश सरकार तथा पोलावरम परियोजना प्राधिकरण द्वारा किया जा रहा है।
इस परियोजना से करीब 7.2 लाख एकड़ क्षेत्र में सिंचाई सुविधा विकसित करने और गोदावरी-कृष्णा डेल्टा क्षेत्र में लगभग 23.5 लाख एकड़ की सिंचाई व्यवस्था को स्थिर करने की परिकल्पना है। इसके अलावा कृष्णा बेसिन में 80 टीएमसी गोदावरी जल के अंतरण, विशाखापत्तनम सहित विभिन्न क्षेत्रों में पेयजल एवं औद्योगिक जल आपूर्ति और करीब 28.5 लाख लोगों को घरेलू जल उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। परियोजना में 960 मेगावाट जल विद्युत उत्पादन की भी योजना है। पोलावरम परियोजना को अब तक करीब 20,658 करोड़ रुपये की संचयी केंद्रीय सहायता मिलने की जानकारी सरकार ने दी है।
प्रायद्वीपीय घटक में महानदी-गोदावरी, गोदावरी-कृष्णा, कृष्णा-पेन्नार, पेन्नार-कावेरी और कावेरी-वागई-गुंडर जैसी कई लिंक परियोजनाओं की व्यवहार्यता रिपोर्ट या डीपीआर तैयार हो चुकी है। पार्बती-कालीसिंध-चंबल लिंक को संशोधित रूप में पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना से जोड़ा गया है और मध्य प्रदेश तथा राजस्थान के बीच इस संबंध में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हो चुके हैं।
दमनगंगा-पिंजल और पार-तापी-नर्मदा लिंक की डीपीआर भी पूरी हो चुकी है, हालांकि दोनों को प्राथमिकता लिंक की श्रेणी से हटा दिया गया है। कर्नाटक की बेदती-वरदा परियोजना की डीपीआर तैयार है। वहीं नेत्रावती-हेमवती लिंक पर आगे अध्ययन नहीं किया गया, क्योंकि येट्टीनाहोल परियोजना के बाद नेत्रावती बेसिन में इस लिंक के लिए पर्याप्त अतिरिक्त जल उपलब्ध नहीं माना गया।
हिमालयी घटक में कोसी-घाघरा, गंडक-गंगा, घाघरा-यमुना, यमुना-राजस्थान और राजस्थान-साबरमती जैसी परियोजनाओं की व्यवहार्यता रिपोर्ट पूरी हो चुकी है। सारदा-यमुना लिंक की डीपीआर तैयार है। मानस-संकोश-तीस्ता-गंगा लिंक की व्यवहार्यता रिपोर्ट पूरी हो चुकी है। इसके वैकल्पिक जोगीघोपा-तीस्ता-फरक्का लिंक का प्रस्ताव वापस लिया जा चुका है। इसी तरह कोसी-मेची लिंक का प्रस्ताव भी वापस लिया गया है। सरकार के अनुसार इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय आयाम और बिहार सरकार का अनुरोध प्रमुख कारण रहे। फरक्का-सुंदरबन, गंगा-फरक्का-दामोदर-सुवर्णरेखा और सुवर्णरेखा-महानदी लिंक जैसी योजनाएं भी अध्ययन के विभिन्न चरणों में हैं।
नदी जोड़ो परियोजनाओं को लेकर केवल पानी के अंतरण और सिंचाई क्षमता बढ़ाने पर ही ध्यान नहीं दिया जा रहा है। सरकार के अनुसार प्रत्येक परियोजना की व्यवहार्यता रिपोर्ट और डीपीआर तैयार करते समय पर्यावरणीय तथा सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का अध्ययन किया जाता है।
केन-बेतवा परियोजना के लिए व्यापक पर्यावरण प्रभाव आकलन के साथ इंटीग्रेटेड लैंडस्केप मैनेजमेंट प्लान तैयार किया गया है। इसमें जलग्रहण क्षेत्र के संरक्षण, जैव विविधता, पारिस्थितिक प्रबंधन, कमान क्षेत्र विकास और लंबे समय तक पर्यावरणीय निगरानी जैसे उपाय शामिल हैं।
भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन की व्यवस्था भी स्वीकृत परियोजना ढांचे का हिस्सा है। संबंधित परियोजनाओं को पर्यावरण और वन मंजूरी तथा पुनर्वास से जुड़े निर्धारित प्रावधानों के अनुसार आगे बढ़ाने की बात कही गई है।
राष्ट्रीय नदी जोड़ो कार्यक्रम का मूल उद्देश्य विभिन्न नदी घाटियों में उपलब्ध जल संसाधनों का बेहतर उपयोग करना और पानी की उपलब्धता में क्षेत्रीय असमानताओं को कम करना है। हालांकि ऐसी बड़ी परियोजनाओं में राज्यों के बीच सहमति, पर्यावरणीय प्रभाव, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और जल उपलब्धता जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण होते हैं।
सरकार द्वारा राज्यसभा में दी गई जानकारी से स्पष्ट है कि 30 प्रस्तावित लिंक परियोजनाओं में से केवल कुछ ही क्रियान्वयन के करीब पहुंची हैं, जबकि अधिकांश योजनाएं अध्ययन, व्यवहार्यता रिपोर्ट या डीपीआर के स्तर पर हैं। ऐसे में राष्ट्रीय नदी जोड़ो कार्यक्रम को जमीन पर पूरी तरह लागू करने में अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
फिलहाल केन-बेतवा लिंक परियोजना को इस महत्वाकांक्षी योजना की सबसे प्रमुख प्रगति के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले वर्षों में राज्यों की सहमति, पर्यावरणीय संतुलन और वित्तीय संसाधनों के आधार पर अन्य परियोजनाओं की दिशा तय होगी।