नई दिल्ली। इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर कथित तौर पर नकदी मिलने के मामले में अब उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज किए जाने की संभावना को लेकर कानूनी बहस तेज हो गई है। लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने उन्हें मामले में दोषी ठहराया है। हालांकि, जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के बाद उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया जारी रह सकती है या नहीं, इस मुद्दे पर वरिष्ठ कानून विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है।
वरिष्ठ अधिवक्ता और संवैधानिक कानून विशेषज्ञ राकेश द्विवेदी का कहना है कि जांच समिति की रिपोर्ट संसद में पेश होने के बाद अब मामले में एफआईआर दर्ज की जा सकती है। उनका मानना है कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ एफआईआर की पहले की याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किया जाना किसी नए आपराधिक मामले में बाधा नहीं बनेगा।
द्विवेदी के मुताबिक, जस्टिस वर्मा इस्तीफा दे चुके हैं और उन्हें अब पद से हटाया नहीं जा सकता। ऐसे में उनकी राय में महाभियोग की प्रक्रिया प्रभावहीन हो गई है, लेकिन जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है।
वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह की राय इससे अलग है। उनका कहना है कि चूंकि अभी जस्टिस वर्मा का इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ है, इसलिए उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि इस्तीफे की स्थिति में उन्हें पेंशन का अधिकार मिल सकता है, जबकि महाभियोग के जरिए हटाए जाने पर यह लाभ नहीं मिलेगा। साथ ही, यदि जांच समिति ने एफआईआर की जरूरत बताई है तो आपराधिक मामला दर्ज किया जाना चाहिए।
संवैधानिक विशेषज्ञ और वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा कि जस्टिस वर्मा के इस्तीफा देने के बाद संसद का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो गया है और अब महाभियोग का सवाल नहीं उठता। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि संसदीय कार्यवाही आपराधिक जांच में बाधा नहीं बन सकती।
धवन के अनुसार, जब जस्टिस वर्मा पद पर थे, तब न्यायिक पद से जुड़ी सुरक्षा के कारण कुछ मामलों में प्रधान न्यायाधीश की अनुमति आवश्यक थी। लेकिन अब उनके जज पद से इस्तीफा देने के बाद वह स्थिति बदल गई है। उन्होंने मामले की उचित आपराधिक जांच की जरूरत पर जोर दिया।
हालांकि, वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर सीधे एफआईआर दर्ज किए जाने की संभावना पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि समिति की रिपोर्ट में कथित तौर पर यह जिम्मेदारी जस्टिस वर्मा पर डाली गई है कि सरकारी आवास में मिली नकदी का स्रोत क्या था। उन्होंने मामले में जांच की प्रक्रिया और उसके आधार पर आपराधिक कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए।
इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल तिवारी ने कहा कि अब जस्टिस वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा सकती है। उनका कहना है कि जजों को मिलने वाली न्यायिक सुरक्षा का मतलब यह नहीं है कि वे अपने निजी आवास में बड़ी मात्रा में नकदी रख सकते हैं। उन्होंने सरकार और कानून मंत्रालय से मामले में आगे की कार्रवाई करने की मांग की।
एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल सोनी ने भी कहा कि जस्टिस वर्मा अब जज नहीं हैं, इसलिए उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर मामले की गहन जांच होनी चाहिए।
इस पूरे मामले में फिलहाल मुख्य सवाल यही है कि जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के बाद महाभियोग की प्रक्रिया का क्या कानूनी प्रभाव रह जाता है और जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर आपराधिक कार्रवाई किस तरह आगे बढ़ सकती है। वरिष्ठ कानून विशेषज्ञों की अलग-अलग राय के चलते इस मामले में आगे की कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।