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UGC नियमों पर पुनर्विचार करेगा, सुप्रीम कोर्ट ने मांगा विस्तृत हलफनामा

नयी दिल्ली:  उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए UGC के नए नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। गुरुवार को सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने अदालत को बताया कि वह जनवरी 2026 में अधिसूचित नियमों पर दोबारा विचार कर रहा है। आयोग ने इस प्रक्रिया […]

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Supreme Court
Gauravshali Bharat News
  • August 20, 2026 5:23 pm IST, Published 5 minutes ago

नयी दिल्ली:  उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए UGC के नए नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। गुरुवार को सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने अदालत को बताया कि वह जनवरी 2026 में अधिसूचित नियमों पर दोबारा विचार कर रहा है। आयोग ने इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए अदालत से अतिरिक्त समय मांगा।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ के समक्ष UGC की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि आयोग नए नियमों की समीक्षा कर रहा है और इस संबंध में विस्तृत हलफनामा दाखिल करने के लिए कुछ और समय की आवश्यकता है। अदालत ने UGC  को चार सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यूजीसी के हलफनामे की प्रति मामले में शामिल अन्य पक्षों को उपलब्ध कराई जाए, ताकि वे आयोग के रुख पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकें। अब मामले की अगली सुनवाई यूजीसी की ओर से दाखिल किए जाने वाले जवाब के आधार पर आगे बढ़ेगी।

यह विवाद UGC द्वारा 13 जनवरी 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और सामाजिक भेदभाव रोकने के उद्देश्य से जारी किए गए नए नियमों से जुड़ा है। इन नियमों का मकसद विश्वविद्यालयों और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों से निपटने के लिए एक स्पष्ट व्यवस्था तैयार करना बताया गया था।

हालांकि, नियमों के एक प्रावधान को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं ने विशेष रूप से नियम 3(C) पर सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि इस प्रावधान की भाषा और दायरा ऐसा है, जिससे कुछ वर्गों के छात्रों के साथ अनुचित व्यवहार की आशंका पैदा हो सकती है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि संबंधित प्रावधान मनमाना है और इसका इस्तेमाल छात्रों के अधिकारों को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है। याचिकाकर्ताओं ने संविधान में मिले समानता के अधिकार सहित मौलिक अधिकारों के संदर्भ में भी इस प्रावधान की वैधता पर सवाल उठाया है।

मामले की पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नियमों पर अंतरिम रोक लगाते हुए केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी किया था। अदालत ने उस समय मामले से जुड़े संवैधानिक और कानूनी पहलुओं पर संबंधित पक्षों से जवाब मांगा था। जातिगत भेदभाव का मुद्दा देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में लंबे समय से संवेदनशील विषय रहा है। विश्वविद्यालयों में दाखिले, पढ़ाई, हॉस्टल और कैंपस जीवन से जुड़े मामलों में सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर भेदभाव के आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं।

ऐसे में UGC द्वारा बनाए गए नियमों को छात्रों के लिए समान और सुरक्षित शैक्षणिक वातावरण सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना गया। दूसरी ओर, नियमों की भाषा और उनके संभावित प्रभाव को लेकर उठाए गए कानूनी सवाल भी महत्वपूर्ण हैं। अदालत को यह तय करना होगा कि नियम संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों और उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता के सिद्धांतों के अनुरूप हैं या नहीं।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने UGC को नियमों पर पुनर्विचार करने का अवसर दिया है। चार सप्ताह में दाखिल होने वाला हलफनामा इस मामले में महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि इससे पता चलेगा कि आयोग मौजूदा नियमों में किसी तरह का बदलाव करने जा रहा है या उन्हें वर्तमान स्वरूप में ही बनाए रखने का पक्ष लेगा। इस मामले की सुनवाई का असर देशभर के विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू होने वाली भेदभाव विरोधी व्यवस्था पर पड़ सकता है। छात्रों के अधिकारों, संस्थानों की जिम्मेदारी और नियामक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने के लिहाज से सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

 

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