दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में लंबी अवधि की ब्याज दरों में तेजी ने आर्थिक दबाव की नई तस्वीर सामने रखी है। महंगाई की चिंता, सरकारों पर बढ़ता कर्ज और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तथा डेटा सेंटर में हो रहे भारी निवेश को इसके प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, फ्रांस और इटली समेत कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सरकारी बॉन्ड की लंबी अवधि वाली यील्ड ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है।
अमेरिका में 30 साल के सरकारी बॉन्ड पर ब्याज दर 5.33% तक पहुंचने का उल्लेख किया गया है। यह जून 2007 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर बताया जा रहा है। ब्रिटेन में इसी अवधि की सरकारी उधारी पर दर करीब 5.85% है। भारत में 30 साल के सरकारी कर्ज की यील्ड लगभग 7.05% बताई गई है। इन आंकड़ों से पता चलता है कि लंबी अवधि के लिए पैसा जुटाना कई सरकारों के लिए पहले की तुलना में महंगा हो गया है।
पिछले एक दशक के औसत से तुलना करें तो तस्वीर और स्पष्ट होती है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका में 30 साल की सरकारी उधारी की औसत दर करीब 2.95% और ब्रिटेन में लगभग 2.40% रही है। मौजूदा स्तर इन औसत आंकड़ों से काफी ऊपर हैं। भारत में हालांकि लंबी अवधि की ब्याज दरें ऐतिहासिक रूप से विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में ज्यादा रही हैं। यहां 10 साल की औसत दर लगभग 7.20% बताई गई है।
ब्याज दरों में तेजी के पीछे सिर्फ महंगाई और सरकारी खर्च को जिम्मेदार नहीं माना जा रहा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के तेजी से विस्तार ने भी कंपनियों की पूंजी जरूरत बढ़ा दी है। AI मॉडल, चिप्स, क्लाउड कंप्यूटिंग और डेटा सेंटर तैयार करने के लिए कंपनियां बड़े पैमाने पर निवेश कर रही हैं।
ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स के अनुसार, AI और डेटा सेंटर से जुड़े विस्तार के लिए कंपनियों ने बड़ी मात्रा में कर्ज जुटाया है। निवेशकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस भारी पूंजीगत खर्च से वास्तविक रिटर्न कितनी तेजी से आएगा। यदि AI से होने वाली कमाई उम्मीद के अनुरूप नहीं बढ़ती है तो कंपनियों की कर्ज चुकाने की क्षमता पर दबाव बढ़ सकता है।
इसी जोखिम को देखते हुए निवेशक लंबी अवधि के बॉन्ड पर ज्यादा रिटर्न की मांग कर सकते हैं। इसका सीधा असर सरकारों और कंपनियों की उधारी लागत पर पड़ता है। जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है तो नई उधारी महंगी होती है और पुराने कर्ज को रीफाइनेंस करने का खर्च भी बढ़ सकता है।
दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सरकारी कर्ज लगातार बढ़ा है। महामारी के बाद राहत पैकेज, रक्षा खर्च, बुनियादी ढांचे में निवेश और सामाजिक योजनाओं के कारण कई देशों को लगातार बड़ी मात्रा में पैसा उधार लेना पड़ा। अब ऊंची ब्याज दरों के दौर में इस कर्ज की लागत सरकारों के बजट पर अतिरिक्त दबाव डाल रही है।
ब्रिटेन में राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने के आश्वासन के बावजूद लंबी अवधि की उधारी महंगी हुई है। बाजार का ध्यान इस बात पर है कि सरकारें बढ़ते कर्ज को किस तरह नियंत्रित करती हैं और भविष्य में उनके राजस्व तथा खर्च का संतुलन कैसा रहता है।
लंबी अवधि की सरकारी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी का प्रभाव सिर्फ सरकारों और बड़े निवेशकों तक सीमित नहीं रहता। इसका असर बैंकिंग और वित्तीय बाजार के जरिए आम लोगों तक भी पहुंच सकता है।
कैपिटल इकोनॉमिक्स के मुताबिक, ऊंची बाजार दरों के कारण होम लोन, कार लोन और क्रेडिट कार्ड जैसे कर्ज महंगे हो सकते हैं। खासकर ऐसे समय में जब बैंक और वित्तीय संस्थान खुद महंगी दर पर पैसा जुटाते हैं, ग्राहकों के लिए ब्याज लागत बढ़ने की संभावना रहती है। हालांकि ब्याज दरों में बदलाव का वास्तविक असर प्रत्येक देश की मौद्रिक नीति, बैंकिंग व्यवस्था और स्थानीय आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। केंद्रीय बैंक महंगाई और आर्थिक विकास को देखते हुए अपनी नीतिगत दरों में बदलाव कर सकते हैं।
कुल मिलाकर, दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में लंबी अवधि की ब्याज दरों का ऊंचा होना वैश्विक वित्तीय बाजार के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। महंगाई, सरकारी कर्ज और AI निवेश—तीनों मिलकर पूंजी की लागत पर दबाव बना रहे हैं। आने वाले समय में निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि AI से मिलने वाला आर्थिक लाभ बढ़ती उधारी लागत की भरपाई कर पाता है या नहीं।