आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई अब केवल तकनीकी प्रयोग तक सीमित नहीं रह गया है। कंपनियां अपने रोजमर्रा के काम में एआई टूल्स का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा रही हैं और इसके साथ खर्च भी लगातार बढ़ रहा है। रैम्प के एआई इंडेक्स के मुताबिक अमेरिका की शीर्ष एक प्रतिशत कंपनियां अब एआई पर प्रति कर्मचारी औसतन करीब सात लाख रुपये खर्च कर रही हैं। जनवरी में यह खर्च लगभग 2.47 लाख रुपये प्रति कर्मचारी था। यानी महज सात महीनों में एआई पर होने वाला खर्च करीब तीन गुना बढ़ गया।
रिपोर्ट के अनुसार शीर्ष 10 प्रतिशत कंपनियां भी एआई टूल्स पर प्रति कर्मचारी करीब 62 हजार रुपये खर्च कर रही हैं। वहीं, सभी कंपनियों को मिलाकर औसत खर्च करीब 1,140 रुपये प्रति कर्मचारी बताया गया है। आंकड़े संकेत देते हैं कि बड़ी कंपनियां एआई को अपने कारोबार की रणनीति में तेजी से शामिल कर रही हैं और इसके लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक बजट आवंटित किया जा रहा है।
एआई सेवाओं की लागत बढ़ने के पीछे इस्तेमाल का तरीका भी एक बड़ा कारण है। एंथ्रोपिक और ओपनएआई जैसी कंपनियों के मॉडल में टोकन आधारित भुगतान व्यवस्था लोकप्रिय हो रही है। इसमें ग्राहक एआई का जितना अधिक इस्तेमाल करता है, उतने ही अधिक टोकन की खपत होती है और बिल भी उसी अनुपात में बढ़ता है। इससे कंपनियों को एआई इस्तेमाल की निगरानी और खर्च को नियंत्रित करने की जरूरत महसूस हो रही है।
इसी वजह से कुछ बड़ी कंपनियों ने एआई के उपयोग पर सीमाएं लगानी शुरू कर दी हैं। रिपोर्ट में उबर, अमेजन और वॉलमार्ट जैसी कंपनियों का उल्लेख है, जिन्होंने जरूरत से अधिक एआई इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए सीमाएं तय की हैं। इससे संकेत मिलता है कि एआई के बढ़ते उपयोग के साथ कंपनियां लागत और उत्पादकता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं।
इसी बीच सैन फ्रांसिस्को से एआई के कार्यस्थल पर इस्तेमाल का एक अलग मामला सामने आया है। एंडोन लैब्स से जुड़े एक रिटेल स्टोर में लूना नाम के एआई सिस्टम को स्टोर के संचालन की जिम्मेदारी दी गई। कंपनी के अनुसार, लूना ने एक कर्मचारी के प्रदर्शन और समय पर काम पर पहुंचने से जुड़े रिकॉर्ड का आकलन करने के बाद उसकी बर्खास्तगी की सिफारिश की।
बताया गया कि संबंधित कर्मचारी 23 में से 17 शिफ्टों में देर से पहुंचा था। एआई सिस्टम ने कंपनी की पहले से तय उपस्थिति नीति और कर्मचारी के रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए मामले का आकलन किया। इसके बाद इंसानी कर्मचारियों ने एआई की सिफारिश की समीक्षा की और अंततः कर्मचारी को नौकरी से हटाने का निर्णय लिया।
इस घटना की एक दिलचस्प बात यह भी बताई गई कि एआई सिस्टम ने पहले तैयार की गई अपनी उपस्थिति नीति को कुछ समय के लिए याद नहीं रखा था। कंपनी के अनुसार, लूना ने महीनों पहले उपस्थिति से जुड़ी नीति तैयार की थी, लेकिन बाद में उस जानकारी को प्रभावी ढंग से इस्तेमाल नहीं किया। परिणामस्वरूप कर्मचारी की देरी का सिलसिला जारी रहा।
बाद में कंपनी ने एआई सिस्टम को अपनी मेमोरी में मौजूद नीतियों को दोबारा खोजने के लिए कहा। इसके बाद लूना से यह आकलन कराया गया कि संबंधित कर्मचारी कंपनी के लिए उपयुक्त है या नहीं। एआई ने रिकॉर्ड के आधार पर बर्खास्तगी की सिफारिश की, लेकिन अंतिम फैसला इंसानी कर्मचारियों की समीक्षा के बाद लिया गया।
यह मामला बताता है कि एआई धीरे-धीरे कंपनियों के प्रशासनिक और प्रबंधन संबंधी कामों में भी प्रवेश कर रहा है। हालांकि, इससे यह सवाल भी उठता है कि कर्मचारियों से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों में एआई की भूमिका कितनी होनी चाहिए। विशेषज्ञों के लिए एआई की क्षमता के साथ उसकी सीमाओं, मेमोरी और निर्णय प्रक्रिया पर निगरानी भी महत्वपूर्ण विषय बनते जा रहे हैं।