नई दिल्ली : विश्व आयुर्वेद परिषद, दिल्ली इकाई एवं प्रेमाधार रिसर्च इंस्टीट्यूट एंड हॉस्पिटल, दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में महर्षि चरक जयंती का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम प्रेमाधार रिसर्च इंस्टीट्यूट एंड हॉस्पिटल, दीप विहार, रोहिणी सेक्टर-24, दिल्ली में बुधवार शाम 6:30 बजे संपन्न हुआ। कार्यक्रम में देश-विदेश से जुड़े आयुर्वेद विशेषज्ञों, चिकित्सकों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों ने सहभागिता की। वक्ताओं ने महर्षि चरक के चिकित्सा क्षेत्र में योगदान को स्मरण करते हुए आयुर्वेद के ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण, शोध, नैतिक चिकित्सा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से जोड़ने पर जोर दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. महेश व्यास, डीन, PGAI&IA, ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद, नई दिल्ली ने की। मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. अल्लम प्रभु, अध्यक्ष, बोर्ड ऑफ आयुर्वेद, NCISM उपस्थित रहे, जबकि वैद्य योगेश पांडे, प्रोफेसर, CBPACS ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार रखे। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हुआ। मंच संचालन सुप्रसिद्ध वैद्य स्वामी नाथ मिश्र ने किया, जो आयुरपुरा आयुर्वेद अस्पताल, बोल्जानो, इटली के आचार्य एवं संस्थापक तथा स्वामी वैद्यशाला, द्वारका, दिल्ली से जुड़े हैं।
आयुर्वेद शिक्षा में गुणवत्ता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर जोर
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि प्रो. अल्लम प्रभु ने आयुर्वेद शिक्षा की गुणवत्ता और राष्ट्रीय आयुर्वेद शिक्षा मानकों के महत्व पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद की समृद्ध पारंपरिक ज्ञान परंपरा को वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ जोड़ना समय की आवश्यकता है। उनके अनुसार, आयुर्वेद की मूल अवधारणाओं को संरक्षित रखते हुए आधुनिक शोध पद्धतियों और प्रमाण आधारित दृष्टिकोण को अपनाने से इसकी स्वीकार्यता और प्रभावशीलता को और मजबूत किया जा सकता है।
उन्होंने आयुर्वेद शिक्षण संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर शोध वातावरण और विद्यार्थियों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद केवल एक चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन की व्यापक अवधारणा प्रस्तुत करने वाली ज्ञान परंपरा है। इसलिए इसके अध्ययन और अनुसंधान में गंभीरता तथा निरंतरता आवश्यक है।
चरक जयंती का संदेश घर-घर तक पहुंचाने का आह्वान
मुख्य वक्ता वैद्य योगेश पांडे ने महर्षि चरक के जीवन और उनके चिकित्सा दर्शन की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि महर्षि चरक ने चिकित्सा को केवल रोग उपचार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि चिकित्सक के आचरण, रोगी के प्रति संवेदनशीलता और स्वस्थ जीवन के महत्व को भी प्रमुखता दी। आज के समय में चरक संहिता में निहित सिद्धांत चिकित्सा जगत के लिए प्रेरणा का महत्वपूर्ण स्रोत हो सकते हैं।
वैद्य योगेश पांडे ने इस अवसर पर घोषणा की कि विश्व आयुर्वेद परिषद का वार्षिक सम्मेलन इस वर्ष अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, ओखला में आयोजित किया जाएगा। उन्होंने देशभर के आयुर्वेद चिकित्सकों, विद्यार्थियों और इससे जुड़े लोगों से सम्मेलन के लिए शीघ्र पंजीकरण कराने की अपील की। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन आयुर्वेद के क्षेत्र में कार्य कर रहे लोगों को एक साझा मंच प्रदान करते हैं और ज्ञान, शोध तथा अनुभवों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देते हैं।
नैतिक चिकित्सा और रोगी कल्याण सर्वोपरि
डॉ. सुश्रुत कनौजिया, अध्यक्ष, बोर्ड ऑफ एथिक्स एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ मेडिकल प्रैक्टिशनर्स, NCISM ने आयुर्वेद चिकित्सा में नैतिक आचरण की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद चिकित्सकों के लिए नैतिक आचरण और रोगी कल्याण सर्वोपरि होना चाहिए। चिकित्सक और रोगी के बीच विश्वास चिकित्सा व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है और इसे बनाए रखना प्रत्येक चिकित्सक की जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि चिकित्सा क्षेत्र में ज्ञान और कौशल के साथ संवेदनशीलता, ईमानदारी तथा मानवीय दृष्टिकोण भी आवश्यक है। महर्षि चरक की शिक्षाएं चिकित्सकों को इसी व्यापक दृष्टिकोण की प्रेरणा देती हैं।
महर्षि चरक के योगदान को वर्तमान चिकित्सा से जोड़ने पर बल
श्री मन्नू भाई गौर, निदेशक, CBPACS, नई दिल्ली ने वैद्यों को संबोधित करते हुए महर्षि चरक के योगदान को चिकित्सा जगत के लिए विशेष रूप से उपयोगी बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि चरक की चिकित्सा दृष्टि और उनके द्वारा प्रस्तुत सिद्धांतों का अध्ययन आज भी महत्वपूर्ण है। आवश्यकता इस बात की है कि इन सिद्धांतों को आधुनिक संदर्भ में समझते हुए अनुसंधान और चिकित्सकीय व्यवहार से जोड़ा जाए।
डॉ. के.के. द्विवेदी, सदस्य, बोर्ड ऑफ आयुर्वेद, NCISM ने आयुर्वेद विद्यार्थियों को प्रारंभिक स्तर से ही आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों को अपनाने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों के लिए केवल पाठ्यक्रम तक सीमित ज्ञान पर्याप्त नहीं है। उन्हें आयुर्वेद की मूल संहिताओं, सिद्धांतों और परंपरागत ज्ञान को गहराई से समझने का प्रयास करना चाहिए।
आयुर्वेद चिकित्सा के महत्व पर विशेषज्ञों ने रखे विचार
डॉ. राजेश कोहली, मेडिकल सुपरिटेंडेंट, DDU अस्पताल ने आयुर्वेद चिकित्सा के महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि बदलती स्वास्थ्य आवश्यकताओं के दौर में विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों के ज्ञान और उनकी उपयोगिता को समझना महत्वपूर्ण है। आयुर्वेद में स्वास्थ्य संरक्षण, जीवनशैली और रोग निवारण से संबंधित व्यापक दृष्टिकोण मौजूद है।
डॉ. संगीता मिश्र, तिब्बिया कॉलेज में मौलिक सिद्धांत की आचार्या ने आयुर्वेद की संहिताओं पर शोध को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि प्राचीन ग्रंथों में उपलब्ध ज्ञान का व्यवस्थित अध्ययन और शोध आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण योगदान साबित हो सकता है।
डॉ. मीना देवगड़े, प्रोफेसर एवं हेड, द्रव्यगुण, ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद ने आयुर्वेद के आधार में वनस्पतियों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद में औषधीय वनस्पतियों का ज्ञान अत्यंत महत्वपूर्ण है और इस क्षेत्र में परंपरागत ज्ञान को संरक्षित करने की आवश्यकता है।
उन्होंने परिषद द्वारा आयोजित वनांचल यात्राओं को केवल औपचारिक गतिविधि तक सीमित न रखने का सुझाव दिया। उनके अनुसार, वन क्षेत्रों में बार-बार जाकर वनवासियों से संवाद करना चाहिए और पीढ़ियों से चली आ रही औषधीय वनस्पतियों तथा उनके उपयोग से संबंधित परंपरागत जानकारी को समझने का प्रयास करना चाहिए। इससे स्थानीय ज्ञान को वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया जा सकता है।
देश-विदेश से जुटे आयुर्वेद से जुड़े विशेषज्ञ
महर्षि चरक जयंती के इस आयोजन में राष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञों के साथ अंतरराष्ट्रीय सहभागिता भी देखने को मिली। जापान से श्रीमती मिहो अरोआका ने कार्यक्रम में सहभागिता की। इटली से श्री शुभ जी, अध्यक्ष, स्कूल ऑफ आयुर्वेदा, मिलानो के साथ फ्रेंचेस्का एवं गाया भी उपस्थित रहीं।
विदेश से आए अतिथियों की मौजूदगी ने कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय आयाम प्रदान किया। इससे यह संदेश भी सामने आया कि आयुर्वेद के प्रति भारत के साथ-साथ दुनिया के विभिन्न देशों में भी रुचि बढ़ रही है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयुर्वेद के ज्ञान, शिक्षा और शोध से जुड़े संवाद को आगे बढ़ाने की संभावनाएं मजबूत होती हैं।
चिकित्सकों और शोधकर्ताओं की रही उल्लेखनीय उपस्थिति
कार्यक्रम में डॉ. महेश कुमार, एसोसिएट प्रोफेसर, डॉ. विजय कौशिक, डॉ. हिमांशु शेखर तिवारी, कर्मा आयुर्वेद, डॉ. शुभम रोहिल्ला, डॉ. अवधेश पांडेय, निदेशक, स्वामी वैद्यशाला तथा डॉ. शिवानी मिश्रा पांडेय, संचालिका सहित अनेक गणमान्य लोग विशेष रूप से उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में मौजूद चिकित्सकों और आयुर्वेद विशेषज्ञों ने महर्षि चरक की शिक्षाओं को वर्तमान समय में प्रासंगिक बनाने, आयुर्वेद शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाने और शोध को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर विचार साझा किए। वक्ताओं ने यह भी माना कि आयुर्वेद की प्राचीन ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए शिक्षण, अनुसंधान और जनजागरूकता तीनों स्तरों पर निरंतर प्रयास किए जाने चाहिए।
‘एकम स्वस्थं भारतम्’ के संकल्प के साथ कार्यक्रम का समापन
कार्यक्रम के अंत में विश्व आयुर्वेद परिषद, दिल्ली के अध्यक्ष वैद्य डॉ. नामधार शर्मा ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, चिकित्सकों, विद्यार्थियों और उपस्थित लोगों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने कहा कि परिषद आयुर्वेद को समाज के अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने तथा स्वस्थ जीवन के प्रति जनजागरूकता बढ़ाने के लिए निरंतर कार्य करती रहेगी।
विश्व आयुर्वेद परिषद ने इस अवसर पर ‘एकम स्वस्थं भारतम्’ के लक्ष्य की दिशा में लगातार प्रयास करने का संकल्प दोहराया। परिषद का उद्देश्य आयुर्वेद की प्राचीन ज्ञान परंपरा को आधुनिक समय की आवश्यकताओं के अनुरूप जनसामान्य तक पहुंचाना, चिकित्सकों एवं विद्यार्थियों को एक मंच प्रदान करना और शोध एवं शिक्षा के माध्यम से आयुर्वेद को और सशक्त बनाना है।
कार्यक्रम के समापन के बाद सभी अतिथियों और आगंतुकों को सहभोज के लिए आमंत्रित किया गया। महर्षि चरक जयंती का यह आयोजन आयुर्वेद के इतिहास, वर्तमान और भविष्य के बीच संवाद स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण अवसर रहा। कार्यक्रम में दिए गए संदेशों में यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि महर्षि चरक की चिकित्सा दृष्टि आज भी प्रासंगिक है और उनके सिद्धांतों को वैज्ञानिक अनुसंधान, नैतिक चिकित्सा तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के माध्यम से आगे बढ़ाया जा सकता है।