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सुप्रीम कोर्ट के 3500 वकीलों में AOR का रुतबा क्यों खास है?

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले हजारों वकीलों के बीच कुछ नाम और भूमिकाएं ऐसी होती हैं, जिन्हें अलग पहचान और विशेष जिम्मेदारी हासिल होती है। इन्हीं में से एक है Advocate-on-Record (AOR)। हाल ही में अधिवक्ता हर्षिता चौबे के AOR परीक्षा पास करने के बाद सुप्रीम कोर्ट की इस विशेष व्यवस्था को […]

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  • August 23, 2026 12:00 pm IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले हजारों वकीलों के बीच कुछ नाम और भूमिकाएं ऐसी होती हैं, जिन्हें अलग पहचान और विशेष जिम्मेदारी हासिल होती है। इन्हीं में से एक है Advocate-on-Record (AOR)। हाल ही में अधिवक्ता हर्षिता चौबे के AOR परीक्षा पास करने के बाद सुप्रीम कोर्ट की इस विशेष व्यवस्था को लेकर लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है। NDTV इंडिया की रिपोर्ट में हर्षिता चौबे ने AOR बनने और इस परीक्षा की कठिनाई से जुड़े अपने अनुभव साझा किए।

आखिर AOR क्या होता है?

Advocate-on-Record यानी AOR सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक व्यवस्था में एक विशेष दर्जा है। सामान्य तौर पर सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने वाले हर अधिवक्ता को अदालत के समक्ष मामले की प्रक्रिया संबंधी जिम्मेदारियां संभालने का वही अधिकार नहीं होता, जो AOR को प्राप्त होता है।

AOR वह अधिवक्ता होता है जिसे सुप्रीम कोर्ट के नियमों के तहत निर्धारित प्रक्रिया पूरी करने के बाद यह विशेष मान्यता मिलती है। सुप्रीम कोर्ट में किसी मामले की फाइलिंग, दस्तावेजों की जिम्मेदारी और अदालत के रिकॉर्ड से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्य AOR के माध्यम से किए जाते हैं।

यही वजह है कि AOR का दर्जा सिर्फ एक परीक्षा पास करने का प्रमाणपत्र नहीं माना जाता, बल्कि इसे सुप्रीम कोर्ट की प्रैक्टिस में महत्वपूर्ण पेशेवर उपलब्धि के रूप में देखा जाता है।

क्यों खास मानी जाती है AOR परीक्षा?

AOR परीक्षा को देश की कठिन कानूनी परीक्षाओं में गिना जाता है। इसकी खासियत यह है कि इसमें केवल कानून की सामान्य जानकारी पर्याप्त नहीं होती। उम्मीदवार को सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली, नियमों, प्रक्रिया, ड्राफ्टिंग और प्रैक्टिकल कानूनी कामकाज की गहरी समझ होना जरूरी है।

एक वकील के लिए अदालत में बहस करना और किसी मामले को सुप्रीम कोर्ट की पूरी प्रक्रिया के अनुरूप फाइल करवाना अलग-अलग कौशल हैं। AOR व्यवस्था इसी प्रक्रिया संबंधी विशेषज्ञता को महत्व देती है।

यही कारण है कि AOR बनने के लिए तैयारी करने वाले अधिवक्ताओं को कानून के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के नियमों और प्रक्रियाओं पर विशेष पकड़ बनानी पड़ती है।

हर्षिता चौबे की उपलब्धि क्यों चर्चा में है?

अधिवक्ता हर्षिता चौबे ने 2025 में आयोजित सुप्रीम कोर्ट की AOR परीक्षा सफलतापूर्वक पास की। उनके लॉ फर्म की ओर से भी इस उपलब्धि की पुष्टि करते हुए बताया गया कि उन्होंने Advocate-on-Record परीक्षा उत्तीर्ण की है।

इसके बाद NDTV इंडिया ने हर्षिता चौबे से खास बातचीत की, जिसमें उन्होंने AOR बनने के अनुभव और इस परीक्षा की कठिनाई के बारे में जानकारी दी। कार्यक्रम में NDTV के सीनियर एडिटर आशीष कुमार भार्गव के साथ उनकी बातचीत दिखाई गई।

हर्षिता चौबे की उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सुप्रीम कोर्ट में कानूनी पेशेवर के रूप में एक नई जिम्मेदारी और विशेषज्ञता हासिल करने का संकेत है।

क्या हर सुप्रीम कोर्ट वकील AOR होता है?

नहीं। यही इस पूरी व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाला हर अधिवक्ता अपने आप AOR नहीं बन जाता। इसके लिए निर्धारित पात्रता और परीक्षा संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करना पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था में AOR की भूमिका को अलग इसलिए रखा गया है ताकि अदालत में दाखिल होने वाले मामलों की प्रक्रिया, दस्तावेज और रिकॉर्ड व्यवस्थित तरीके से संभाले जा सकें।

इसका अर्थ यह भी है कि कोई अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट में किसी मामले पर बहस करने में सक्षम हो सकता है, लेकिन मामले की आधिकारिक फाइलिंग और उससे जुड़ी निर्धारित प्रक्रियाओं के लिए AOR की भूमिका अलग हो सकती है।

AOR बनने के बाद क्या बदलता है?

AOR बनने के बाद अधिवक्ता को सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रिया में एक विशेष पेशेवर भूमिका मिलती है। वह अदालत में मामलों की फाइलिंग और उससे जुड़ी जिम्मेदारियों को अधिकृत तरीके से संभाल सकता है।

यह जिम्मेदारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में मामलों की संख्या और कानूनी दस्तावेजों की जटिलता काफी अधिक होती है। छोटी-सी प्रक्रियात्मक गलती भी किसी मामले की सुनवाई को प्रभावित कर सकती है।

इसलिए AOR से केवल कानूनी ज्ञान ही नहीं, बल्कि अनुशासन, प्रक्रिया की समझ और दस्तावेजों की सटीकता की भी अपेक्षा की जाती है।

3500 वकीलों वाली चर्चा में कितना तथ्य?

सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट और वीडियो में सुप्रीम कोर्ट से जुड़े करीब 3500 वकीलों का उल्लेख किया गया है। हालांकि, इस संख्या को AOR की आधिकारिक कुल संख्या मान लेना उचित नहीं होगा। अलग-अलग समय पर अधिवक्ताओं और AOR की संख्या बदलती रहती है।

इसलिए वायरल शीर्षक में दिखाई दे रही संख्या को व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए। असली मुद्दा यह है कि सुप्रीम कोर्ट में AOR का दर्जा सामान्य वकालत से अलग एक विशेष प्रक्रिया और जिम्मेदारी से जुड़ा है।

कानून के छात्रों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है AOR?

कानून की पढ़ाई कर रहे छात्रों और युवा अधिवक्ताओं के लिए AOR परीक्षा एक बड़े पेशेवर लक्ष्य के रूप में देखी जाती है। यह उन्हें केवल कोर्ट में बहस करने की क्षमता से आगे बढ़कर न्यायिक प्रक्रिया की बारीकियों को समझने का अवसर देती है।

AOR बनने की यात्रा में अनुभव, तैयारी और नियमों की गहरी समझ की आवश्यकता होती है। यही वजह है कि इस परीक्षा को लेकर कानून के विद्यार्थियों और युवा वकीलों के बीच खास रुचि रहती है।

AOR का बढ़ता आकर्षण

भारत की न्याय व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च न्यायिक संस्था है। यहां किसी मामले की प्रक्रिया को सही तरीके से आगे बढ़ाने में AOR की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसी कारण इस पद की पेशेवर प्रतिष्ठा भी काफी अधिक मानी जाती है।

हर्षिता चौबे की सफलता ने एक बार फिर यह सवाल चर्चा में ला दिया है कि आखिर AOR बनने के लिए इतनी मेहनत क्यों की जाती है। इसका जवाब केवल प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की जटिल न्यायिक प्रक्रिया में सीधे और जिम्मेदार तरीके से काम करने की भूमिका में छिपा है।

निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट में हजारों अधिवक्ताओं के बीच AOR का दर्जा एक अलग पेशेवर पहचान देता है। कठिन परीक्षा, निर्धारित प्रक्रिया और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के कारण AOR बनना किसी भी अधिवक्ता के करियर में बड़ी उपलब्धि माना जाता है। हर्षिता चौबे की सफलता इसी चुनौतीपूर्ण कानूनी सफर का उदाहरण है।

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