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जज बनने का सपना हुआ आसान, सुप्रीम कोर्ट ने बदला बड़ा नियम

नई दिल्ली। देश में न्यायिक सेवा की तैयारी कर रहे कानून स्नातकों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और राहत भरा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने निचली न्यायपालिका में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर सीधी भर्ती के लिए अनिवार्य कानूनी प्रैक्टिस की अवधि को तीन साल से घटाकर एक साल कर दिया […]

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  • August 22, 2026 12:29 pm IST, Published 33 minutes ago

नई दिल्ली। देश में न्यायिक सेवा की तैयारी कर रहे कानून स्नातकों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और राहत भरा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने निचली न्यायपालिका में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर सीधी भर्ती के लिए अनिवार्य कानूनी प्रैक्टिस की अवधि को तीन साल से घटाकर एक साल कर दिया है। हालांकि, अदालत ने न्यायिक सेवा में प्रवेश से पहले व्यावहारिक अनुभव की जरूरत को पूरी तरह खत्म नहीं किया है।

यह फैसला 21 अगस्त 2026 को मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की तीन सदस्यीय पीठ ने 2:1 के बहुमत से सुनाया। पीठ ने समीक्षा याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए मई 2025 के अपने उस निर्णय में संशोधन किया, जिसमें न्यायिक सेवा की प्रवेश परीक्षा में शामिल होने के लिए तीन साल की वकालत को अनिवार्य किया गया था।

तीन साल की जगह अब एक साल की प्रैक्टिस

सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले का सबसे बड़ा असर उन कानून स्नातकों पर पड़ेगा, जो सिविल जज बनने के लिए न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि 1 अप्रैल 2027 या उसके बाद जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं के लिए उम्मीदवार के पास कम से कम एक साल की वास्तविक वकालत का अनुभव होना चाहिए। इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार प्रैक्टिस का प्रमाण भी देना होगा।

इससे पहले मई 2025 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रवेश स्तर की न्यायिक सेवा के लिए तीन साल की प्रैक्टिस अनिवार्य कर दी थी। उस फैसले के बाद नए कानून स्नातकों और न्यायिक सेवा की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के सामने पात्रता को लेकर बड़ी चुनौती खड़ी हो गई थी।

मार्च 2027 तक उम्मीदवारों को विशेष राहत

सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ भविष्य के लिए नियम में बदलाव नहीं किया, बल्कि संक्रमणकालीन अवधि के उम्मीदवारों के लिए भी बड़ी राहत दी है। 20 मई 2025 से 31 मार्च 2027 तक जारी होने वाली सिविल जज (जूनियर डिवीजन) भर्ती अधिसूचनाओं के तहत कानून स्नातक बिना पूर्व वकालत के भी आवेदन कर सकेंगे। अदालत ने इस अवधि में उम्मीदवारों को आवेदन के उद्देश्य से एक साल की सक्रिय प्रैक्टिस पूरी करने के बराबर माना है। ऐसे उम्मीदवारों से इस अवधि के लिए अलग से प्रैक्टिस प्रमाणपत्र मांगने की जरूरत नहीं होगी।

यानी जिन अभ्यर्थियों ने तीन साल की प्रैक्टिस की अनिवार्यता के कारण अपनी तैयारी और करियर योजना को लेकर चिंता जताई थी, उनके लिए यह फैसला काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

चयन के बाद भी सीधे नियमित जज नहीं बनेंगे

सुप्रीम कोर्ट ने प्रैक्टिस की शर्त कम करने के साथ उम्मीदवारों के लिए प्रशिक्षण और क्लर्कशिप का रास्ता भी तय किया है। चयनित उम्मीदवारों को पहले एक साल की गहन ट्रेनिंग राज्य न्यायिक अकादमी में करनी होगी। इसके बाद उन्हें एक साल की संरचित लॉ क्लर्कशिप से गुजरना होगा।

क्लर्कशिप के दौरान उम्मीदवारों को न्यायिक कार्यप्रणाली को नजदीक से समझने का अवसर मिलेगा। व्यवस्था के अनुसार छह महीने जिला न्यायाधीश या उच्च न्यायिक सेवा के किसी सदस्य की निगरानी में और छह महीने संबंधित हाईकोर्ट के किसी कार्यरत न्यायाधीश के अधीन अनुभव प्राप्त करना होगा।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि न्यायिक सेवा में आने वाला उम्मीदवार केवल लिखित परीक्षा पास करने वाला अभ्यर्थी न हो, बल्कि उसे अदालत की वास्तविक कार्यप्रणाली, मामलों की सुनवाई, कानूनी प्रक्रिया और न्यायिक आदेश तैयार करने की व्यावहारिक समझ भी हो।

ट्रेनिंग और क्लर्कशिप के बाद होगा मूल्यांकन

नई व्यवस्था में चयन के बाद प्रशिक्षण को महज औपचारिकता नहीं माना गया है। उम्मीदवार की कार्यक्षमता, कानूनी समझ, विश्लेषण क्षमता, प्रक्रिया संबंधी ज्ञान, आचरण और न्यायिक जिम्मेदारियों के प्रति उपयुक्तता का मूल्यांकन किया जाएगा। संतोषजनक मूल्यांकन के बाद ही उम्मीदवार को नियमित न्यायिक सेवा में नियुक्ति का रास्ता मिलेगा।

सुप्रीम कोर्ट का यह मॉडल इस सोच पर आधारित है कि न्यायिक अधिकारी के लिए कानून की किताबों का ज्ञान पर्याप्त नहीं है। उसे अदालत की वास्तविक परिस्थितियों और न्यायिक जिम्मेदारियों का व्यावहारिक अनुभव भी होना चाहिए।

क्यों आया सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला?

मई 2025 में तीन साल की प्रैक्टिस अनिवार्य किए जाने के बाद बड़ी संख्या में कानून स्नातकों और संभावित उम्मीदवारों के लिए स्थिति बदल गई थी। कई अभ्यर्थी पहले से न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे थे और अचानक पात्रता की शर्त बदलने से उनके सामने करियर को लेकर अनिश्चितता पैदा हुई।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने नए फैसले में माना कि पहले लागू व्यवस्था से लंबे समय तक तैयारी करने वाले युवा कानून स्नातकों के लिए अचानक तीन साल की प्रैक्टिस की शर्त लागू होना कठिनाई पैदा कर सकता है। इसी वजह से संक्रमणकालीन व्यवस्था के तहत उन्हें राहत दी गई है।

युवाओं के लिए क्या बदला?

नए फैसले को सरल भाषा में समझें तो तीन महत्वपूर्ण बदलाव सामने आते हैं। पहला, 1 अप्रैल 2027 के बाद की भर्ती में तीन साल की जगह एक साल की वास्तविक वकालत पर्याप्त होगी। दूसरा, मार्च 2027 तक की संक्रमण अवधि में संबंधित भर्ती के लिए कानून स्नातकों को पूर्व प्रैक्टिस की शर्त से राहत मिलेगी। तीसरा, चयन के बाद उम्मीदवारों को एक साल की न्यायिक ट्रेनिंग और एक साल की संरचित क्लर्कशिप से गुजरना होगा।

इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफ कानून स्नातकों के लिए प्रवेश का रास्ता अपेक्षाकृत आसान किया है, वहीं दूसरी तरफ न्यायिक जिम्मेदारी संभालने से पहले व्यावहारिक प्रशिक्षण को महत्व दिया है।

न्यायिक सेवा की तैयारी करने वालों के लिए संदेश

इस फैसले के बाद न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे कानून स्नातकों के बीच उम्मीद बढ़ी है। हालांकि उम्मीदवारों को यह समझना जरूरी है कि अलग-अलग राज्यों में भर्ती अधिसूचना और नियमों में व्यावहारिक प्रक्रियाएं अलग हो सकती हैं। इसलिए आवेदन करने से पहले संबंधित हाईकोर्ट या भर्ती प्राधिकरण की आधिकारिक अधिसूचना को जरूर देखना चाहिए।

कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला न्यायिक सेवा में प्रवेश के रास्ते को संतुलित करने की कोशिश है। तीन साल की बाध्यता को घटाकर एक साल करना युवा कानून स्नातकों के लिए राहत है, जबकि ट्रेनिंग और क्लर्कशिप की अनिवार्यता यह सुनिश्चित करने का प्रयास है कि न्यायिक पद पर पहुंचने वाले उम्मीदवारों को पर्याप्त व्यावहारिक अनुभव भी मिले।

नोट: यह खबर सुप्रीम कोर्ट के 21 अगस्त 2026 के फैसले और उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्टों के आधार पर तैयार की गई है। उम्मीदवार अपने राज्य की आगामी आधिकारिक भर्ती अधिसूचना को अंतिम मानें।

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