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भ्रूण लिंग जांच मामलों में पुलिस पर सुप्रीम कोर्ट ने तय की सीमाएं

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने प्री-कन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स एक्ट यानी PCPNDT Act से जुड़े मामलों में पुलिस की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस विशेष कानून के तहत भ्रूण का लिंग पता लगाने जैसे अपराधों की सामान्य तौर पर पुलिस सीधे FIR दर्ज कर जांच नहीं […]

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Supreme Court
Gauravshali Bharat News
  • August 20, 2026 6:00 pm IST, Published 22 minutes ago

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने प्री-कन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स एक्ट यानी PCPNDT Act से जुड़े मामलों में पुलिस की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस विशेष कानून के तहत भ्रूण का लिंग पता लगाने जैसे अपराधों की सामान्य तौर पर पुलिस सीधे FIR दर्ज कर जांच नहीं कर सकती। ऐसे मामलों में कानून के तहत नियुक्त ‘उपयुक्त प्राधिकारी’ की प्रमुख भूमिका होगी।

जस्टिस संजय करोल, जस्टिस एन.के. सिंह और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि PCPNDT Act की संरचना में पुलिस को प्राथमिक जांच एजेंसी के रूप में नहीं रखा गया है। हालांकि, आवश्यकता पड़ने पर संबंधित प्राधिकारी पुलिस की सहायता ले सकता है और पुलिस की भूमिका उस सीमा तक सहायक रह सकती है।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि PCPNDT Act सामान्य आपराधिक कानून से अलग एक विशेष कानून है। इसमें अपराधों की शिकायत, जांच, तलाशी, जब्ती और अभियोजन को लेकर विशेष व्यवस्था बनाई गई है। इस व्यवस्था का उद्देश्य भ्रूण के लिंग की जांच और लिंग चयन जैसी गतिविधियों पर प्रभावी तरीके से रोक लगाना है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस कानून के तहत सामने आने वाले मामले तकनीकी और संवेदनशील प्रकृति के होते हैं। इनमें चिकित्सकीय प्रक्रियाओं, दस्तावेजों और विशेषज्ञ जानकारी की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए कानून ने संबंधित अधिकारियों को इस तरह की शिकायतों पर कार्रवाई की प्राथमिक जिम्मेदारी दी है।

पीठ ने PCPNDT Act की धारा 17(4) का उल्लेख करते हुए कहा कि उपयुक्त प्राधिकारी को अधिनियम के तहत अपराधों के संबंध में शिकायत करने और आवश्यक कार्रवाई आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई है। अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि कानून और उससे जुड़े नियमों में पुलिस की भूमिका को सीमित रखने का संकेत मिलता है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पुलिस अपने स्तर पर PCPNDT Act के अपराध को लेकर FIR दर्ज कर लेती है, तो विशेष कानून में निर्धारित प्रक्रिया के कारण उस मामले को उसी तरह आगे बढ़ाना संभव नहीं होगा। इसलिए पुलिस को सीधे जांच शुरू करने के बजाय कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा।

हालांकि, अदालत ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण अंतर भी स्पष्ट किया है। PCPNDT Act के तहत पुलिस की सीमित भूमिका का मतलब यह नहीं है कि पुलिस की आपराधिक मामलों में सभी शक्तियां खत्म हो जाती हैं। यदि किसी घटना में PCPNDT Act के अलावा भारतीय दंड कानून या किसी अन्य सामान्य आपराधिक कानून के तहत स्वतंत्र अपराध बनता है, तो पुलिस उस अलग अपराध की जांच कर सकती है।
मामला उत्तर प्रदेश के एक डॉक्टर से संबंधित था। डॉक्टर पर आरोप था कि वह कथित तौर पर अवैध तरीके से भ्रूण का लिंग पता कराने में मदद करता था और इसके जरिए लिंग आधारित गर्भपात की गतिविधियों में सहयोग कर रहा था। इस मामले में वर्ष 2017 में पुलिस ने PCPNDT Act के तहत FIR दर्ज की थी।

डॉक्टर ने पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देते हुए अदालत का रुख किया। उसकी दलील थी कि PCPNDT Act की धारा 28 में शिकायत दर्ज कराने के लिए विशेष व्यवस्था है और सामान्य पुलिस अधिकारी इस कानून के तहत सीधे शिकायत या FIR शुरू नहीं कर सकता। डॉक्टर की ओर से यह भी कहा गया कि उसके मामले में FIR दर्ज कराने वाला अधिकारी कानून में बताए गए ‘उपयुक्त प्राधिकारी’ की श्रेणी में नहीं आता था।

उत्तर प्रदेश सरकार ने इस दलील का विरोध किया। सरकार की ओर से कहा गया कि PCPNDT Act में पुलिस द्वारा FIR दर्ज करने या जांच करने पर स्पष्ट शब्दों में पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। इसलिए पुलिस की कार्रवाई को अवैध नहीं माना जाना चाहिए।

मामला पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा था। वर्ष 2024 में हाईकोर्ट ने पुलिस की ओर से शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने माना था कि PCPNDT Act एक विशेष कानून है और इसमें जांच, तलाशी, जब्ती तथा शिकायत से संबंधित अलग प्रक्रिया निर्धारित है। अदालत के अनुसार इस प्रक्रिया को कानून के तहत नियुक्त उपयुक्त प्राधिकारी द्वारा आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मूल निष्कर्ष को बरकरार रखा है कि PCPNDT Act के अपराधों में पुलिस प्राथमिक जांच एजेंसी नहीं है। शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आवश्यकता पड़ने पर उपयुक्त प्राधिकारी पुलिस की सहायता ले सकता है, लेकिन इससे पुलिस को कानून के तहत मुख्य जांचकर्ता की भूमिका नहीं मिल जाती।

फैसले का महत्व इसलिए भी है क्योंकि PCPNDT Act का उद्देश्य भ्रूण के लिंग की जांच और लिंग चयन जैसी गतिविधियों को रोकना है। देश में कन्या भ्रूण हत्या और लिंग आधारित भेदभाव की समस्या को देखते हुए इस कानून को विशेष महत्व दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कानून में निर्धारित संस्थागत प्रक्रिया का पालन करने पर जोर दिया है।

अदालत ने साथ ही मामले के कुछ अन्य पहलुओं पर नए सिरे से विचार करने के लिए इसे हाईकोर्ट वापस भेज दिया है। इसका अर्थ है कि संबंधित विवाद के सभी पहलुओं पर आगे की न्यायिक प्रक्रिया जारी रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह बात स्पष्ट हो गई है कि PCPNDT Act के मामलों में कार्रवाई करते समय कानून में निर्धारित विशेष प्रक्रिया का पालन जरूरी होगा। पुलिस की भूमिका पूरी तरह समाप्त नहीं की गई है, लेकिन उसे मुख्य जांच एजेंसी के बजाय संबंधित उपयुक्त प्राधिकारी की जरूरत के अनुसार सहयोगी भूमिका में रखा गया है।

 

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