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2 साल ट्रायल, 22 साल अपील में लगे, कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

नई दिल्ली: करीब 45 साल पुराने दोहरे हत्याकांड के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया में हुई असाधारण देरी पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि इस मामले की सुनवाई में हुई देरी न्यायिक व्यवस्था की विफलता को दर्शाती है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले […]

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Supreme Court
Gauravshali Bharat News
  • August 25, 2026 11:25 am IST, Published 2 hours ago

नई दिल्ली: करीब 45 साल पुराने दोहरे हत्याकांड के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया में हुई असाधारण देरी पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि इस मामले की सुनवाई में हुई देरी न्यायिक व्यवस्था की विफलता को दर्शाती है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले में दोषी ठहराए गए 70 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति की सजा पर रोक लगाते हुए उसे जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।

मामला वर्ष 1981 में हुए दोहरे हत्याकांड से जुड़ा है। घटना के बाद शुरू हुई कानूनी प्रक्रिया इतनी लंबी चली कि ट्रायल कोर्ट को मामले का फैसला सुनाने में करीब 22 साल लग गए। इसके बाद दोषसिद्धि के खिलाफ दायर अपील पर झारखंड हाई कोर्ट ने भी लगभग 22 वर्षों तक फैसला नहीं सुनाया। इस दौरान मामले के छह आरोपियों में से पांच की मौत हो चुकी है। वहीं, एकमात्र जीवित दोषी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा है और जेल में रहते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपनी कानूनी लड़ाई लड़ रहा था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोहरे हत्याकांड जैसा गंभीर अपराध होने के बावजूद आरोपी द्वारा दशकों तक झेली गई परेशानी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पीठ ने खास तौर पर उसकी उम्र और खराब चिकित्सकीय स्थिति को ध्यान में रखा। राज्य की ओर से दाखिल हलफनामे में भी बताया गया था कि आरोपी हिरासत में रहते हुए अस्पताल में भर्ती है।

1981 की घटना, 2002 में ट्रायल कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में इस बात पर हैरानी जताई कि 1981 में हुई घटना में ट्रायल कोर्ट ने 2002 में फैसला सुनाया। अदालत ने सवाल उठाया कि मुकदमे की सुनवाई पूरी करने में 22 साल क्यों लगे। इसके बाद दोषी की अपील पर हाई कोर्ट को भी करीब 22 वर्ष लग गए।

अदालत ने देरी के कारणों की जानकारी मांगी। हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से बताया गया कि आरोपियों के करीब छह साल तक फरार रहने के कारण कार्यवाही प्रभावित हुई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि साल  1991 में आरोप तय किए जाने के बाद भी ट्रायल पूरा करने में लगभग 12 साल लग गए। इस अवधि की देरी को लेकर कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया।

पीठ ने कहा कि किसी आपराधिक मामले में न्याय मिलने में इतनी लंबी देरी गंभीर चिंता का विषय है। अदालत ने यह भी कहा कि एक ओर अपराध के लिए दोषसिद्धि और सजा की प्रक्रिया लंबे समय तक चली, वहीं दूसरी ओर आरोपी को भी दशकों तक मुकदमे की अनिश्चितता झेलनी पड़ी।

सजा पर रोक, तत्काल रिहाई का आदेश

दोषी की ओर से पेश वकील फैजिया शकील ने अदालत से जमानत देने का आग्रह किया। उन्होंने दलील दी कि यदि याचिकाकर्ता को राहत नहीं दी गई तो उसे ऐसी अपूरणीय क्षति हो सकती है जिसकी बाद में भरपाई मुश्किल होगी। उनका कहना था कि यदि भविष्य में सुप्रीम कोर्ट दोषी को बरी करता है, तो इतने लंबे समय तक जेल में बिताए समय की उचित भरपाई संभव नहीं होगी।

इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोषी की सजा पर रोक लगा दी और उसे तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि रिहाई जमानत की शर्तों के अधीन होगी। आरोपी को व्यक्तिगत जमानत देनी होगी और जमानत की अवधि में किसी नए अपराध में शामिल नहीं होना होगा।सुप्रीम कोर्ट ने मामले में न्यायिक देरी की व्यापक स्थिति पर भी ध्यान दिया है।

हाई कोर्ट की ओर से लंबित आपराधिक अपीलों को लेकर दाखिल रिपोर्ट पर अदालत ने चिंता जताई। पीठ ने उचित समझा कि केंद्र सरकार को भी मामले में पक्षकार बनाया जाए। अदालत ने निर्देश दिया कि हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा दाखिल अनुपालन हलफनामे की प्रति अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय को उपलब्ध कराई जाए। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने न केवल उम्रदराज और बीमार दोषी को अंतरिम राहत दी, बल्कि न्यायिक मामलों के निपटारे में होने वाली असाधारण देरी पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

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