लखनऊ: उत्तर प्रदेश में मकान मालिक और किरायेदारों के बीच किराए और संपत्ति से जुड़े विवादों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने उत्तर प्रदेश रेगुलेशन ऑफ अर्बन प्रीमाइसेज टेनेंसी एक्ट, 2021 की कुछ धाराओं को उनकी कानूनी सीमा के संबंध में अमान्य कर दिया है। इस फैसले के बाद किराएदारी से जुड़े कई मामलों में वर्ष 1972 के पुराने कानून की व्यवस्था फिर महत्वपूर्ण हो गई है।
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 16 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए 2021 के किराएदारी कानून की धारा 8, 9 और 10 से संबंधित प्रावधानों पर विचार किया। अदालत ने पाया कि इन प्रावधानों का कुछ हिस्सा संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 में मौजूद व्यवस्थाओं से टकराता है। इसके अलावा धारा 38 और 42 को भी उस सीमा तक प्रभावहीन माना गया, जहां उनके कारण पहले से निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया और संबंधित कानूनों के प्रावधान प्रभावित हो रहे थे।
अदालत के फैसले का असर मकान मालिकों और किरायेदारों के बीच होने वाले विवादों पर पड़ सकता है। खासकर किराए में बदलाव, किरायेदारी की शर्तों, मकान खाली कराने और विवादों के निपटारे से जुड़े मामलों में अब लागू कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखना होगा। हालांकि, यह स्पष्ट है कि हाईकोर्ट ने वर्ष 2021 के पूरे किराएदारी कानून को समाप्त नहीं किया है। केवल उन विशेष प्रावधानों पर फैसला दिया गया है, जिनको लेकर कानूनी टकराव का सवाल सामने आया था।
उत्तर प्रदेश में वर्ष 2021 में नया किराएदारी कानून लागू करने का उद्देश्य मकान मालिकों और किरायेदारों के बीच संबंधों को अधिक व्यवस्थित बनाना था। इसमें किरायेदारी को लिखित समझौते के जरिए दर्ज करने, किराए से जुड़े विवादों के लिए विशेष व्यवस्था बनाने और कुछ मामलों में रेंट अथॉरिटी तथा रेंट ट्रिब्यूनल के जरिए समाधान का प्रावधान किया गया था। नए कानून के जरिए किराएदारी व्यवस्था में स्पष्ट नियम बनाने का प्रयास किया गया था।
अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद पुराने कानून की प्रासंगिकता फिर चर्चा में आ गई है। उत्तर प्रदेश शहरी भवन किराया और बेदखली नियंत्रण अधिनियम, 1972 लंबे समय तक राज्य में मकान मालिक और किरायेदार के अधिकारों को नियंत्रित करता रहा है। इसलिए जिन मामलों पर पुराने कानून की व्यवस्था लागू होती है, वहां उसके प्रावधानों को ध्यान में रखकर आगे की कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
किराए में बढ़ोतरी को लेकर भी इस फैसले को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि मकान मालिक किराया बढ़ा ही नहीं सकते। किराया बढ़ाने की स्थिति संबंधित किरायानामे, पहले से तय किराए, लागू कानूनी प्रावधान और दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते पर निर्भर करेगी। इसलिए किसी भी मकान मालिक या किरायेदार के लिए अपने मामले की परिस्थितियों के अनुसार कानूनी स्थिति समझना जरूरी होगा।
इस फैसले के बाद यह भी महत्वपूर्ण हो गया है कि किरायेदार अपने किरायानामे, किराए के भुगतान की रसीद और अन्य जरूरी दस्तावेज सुरक्षित रखें। वहीं मकान मालिकों को किराया बढ़ाने, किरायेदारी समाप्त करने या किसी अन्य कार्रवाई से पहले लागू कानून और निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा। नियमों की अनदेखी करने पर विवाद अदालत तक पहुंच सकता है।
पुराने और नए कानून के बीच संक्रमण से जुड़े मामलों में भी स्थिति महत्वपूर्ण रहेगी। पहले से लंबित मामलों के संबंध में कानून में अलग व्यवस्था की गई थी, इसलिए प्रत्येक मामले में यह देखना जरूरी होगा कि वह किस समय शुरू हुआ और उस समय कौन-सा कानूनी प्रावधान लागू था।
कुल मिलाकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला उत्तर प्रदेश की किराएदारी व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे मकान मालिकों और किरायेदारों के अधिकारों, किराए में बदलाव और विवादों के निपटारे से जुड़े मामलों में कानूनी स्थिति पर असर पड़ सकता है। आने वाले समय में इस फैसले के आधार पर अदालतों में लंबित मामलों की सुनवाई और किराएदारी विवादों के समाधान की दिशा भी अधिक स्पष्ट हो सकती है।