लखनऊ: शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय में किचन और कैंटीन के टेंडर को लेकर सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि टेंडर प्रक्रिया में कई ऐसी स्थितियां सामने आईं, जिनके कारण बड़ी और अनुभवी कंपनियों के बजाय हर्ष इंटरप्राइजेज को काम सौंपे जाने पर सवाल खड़े हो रहे हैं। विश्वविद्यालय से जुड़े लोगों का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराकर पूरी प्रक्रिया और पात्रता के मानकों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि किसी भी तरह की अनियमितता की आशंका दूर हो सके।
बताया जा रहा है कि विश्वविद्यालय के किचन-कैंटीन संचालन के लिए टेंडर प्रक्रिया आयोजित की गई थी। इसमें हर्ष इंटरप्राइजेज के साथ करीब 10 फर्मों के एल-1 स्तर पर क्वालिफाइड होने की बात सामने आई है। इसके बावजूद अंतिम रूप से हर्ष इंटरप्राइजेज को टेंडर दिए जाने को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। खासतौर पर यह पूछा जा रहा है कि जिन कंपनियों के पास बड़े स्तर पर किचन या कैंटीन संचालन का अनुभव था, उन्हें किन आधारों पर पीछे किया गया।
मामले में विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार रोहित सिंह की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप लगाने वालों का कहना है कि टेंडर से जुड़ी प्रक्रिया में निर्णय लेने के दौरान सभी पहलुओं को स्पष्ट रूप से सामने रखा जाना चाहिए था। टेंडर प्रक्रिया में एल-1 यानी सबसे कम दर वाली बोली महत्वपूर्ण मानी जाती है, लेकिन केवल कम दर ही किसी कंपनी के चयन का एकमात्र आधार नहीं होती। सरकारी और संस्थागत खरीद प्रक्रियाओं में तकनीकी योग्यता, अनुभव, संसाधन, गुणवत्ता मानक और निविदा की अन्य शर्तों का पालन भी महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में इस मामले में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि सभी क्वालिफाइड फर्मों के मूल्यांकन के लिए कौन-कौन से मानक अपनाए गए और अंतिम चयन किस आधार पर किया गया।
विश्वविद्यालय के दिव्यांग छात्र भी कैंटीन में मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठा रहे हैं। छात्रों की शिकायतों में खाने की गुणवत्ता, स्वच्छता और भोजन की नियमितता जैसे मुद्दे शामिल बताए जा रहे हैं। विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए भोजन की व्यवस्था केवल सामान्य कैंटीन सुविधा नहीं है, बल्कि उनकी दैनिक जरूरतों से भी जुड़ी हुई है। ऐसे में छात्रों का कहना है कि भोजन की गुणवत्ता से किसी भी स्तर पर समझौता नहीं होना चाहिए।
छात्रों से जुड़े लोगों का कहना है कि कैंटीन संचालन के लिए जिस कंपनी को जिम्मेदारी दी जाती है, उसके पास पर्याप्त स्टाफ, खाद्य सुरक्षा मानकों की जानकारी, साफ-सफाई की व्यवस्था और बड़े संस्थान में भोजन उपलब्ध कराने की क्षमता होनी चाहिए। यदि किसी कंपनी के चयन को लेकर सवाल उठते हैं, तो विश्वविद्यालय प्रशासन को सभी दस्तावेजों और निर्णय प्रक्रिया की जानकारी सामने रखनी चाहिए।
इस पूरे मामले में यह भी महत्वपूर्ण है कि टेंडर की मूल शर्तें क्या थीं और क्या चयनित फर्म ने निर्धारित सभी मानकों को पूरा किया। यदि हर्ष इंटरप्राइजेज ने तकनीकी और वित्तीय दोनों स्तरों पर आवश्यक पात्रता हासिल की है, तो विश्वविद्यालय को इसका स्पष्ट आधार सार्वजनिक करना चाहिए। वहीं, यदि किसी अनुभवी कंपनी को नियमों के बावजूद बाहर किया गया है, तो उसके कारण भी स्पष्ट किए जाने चाहिए।
टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना किसी भी शैक्षणिक संस्थान के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। खासकर विश्वविद्यालय में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों के भोजन से जुड़ी व्यवस्था होने के कारण गुणवत्ता और जवाबदेही दोनों पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। छात्रों की शिकायतों का समयबद्ध तरीके से निस्तारण और भोजन की नियमित गुणवत्ता जांच भी आवश्यक है।
फिलहाल किचन टेंडर को लेकर लगाए जा रहे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से टेंडर प्रक्रिया, चयन समिति के निर्णय और खाद्य गुणवत्ता से जुड़ी शिकायतों पर आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट होगी। यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जांच के बाद जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए, जबकि प्रक्रिया नियमों के अनुरूप पाए जाने पर उठ रहे सवालों का तथ्यात्मक जवाब सार्वजनिक किया जाना चाहिए।