पटना/बेतिया। बिहार में नवजात बच्चों की कथित खरीद-फरोख्त को लेकर सामने आई एक खोजी रिपोर्ट ने मानव तस्करी, अवैध गोद लेने और सामाजिक भेदभाव से जुड़े कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, एक निजी मीडिया संस्थान ने करीब 90 दिनों तक अंडरकवर पड़ताल करते हुए ऐसे एजेंटों और कथित नेटवर्क से संपर्क किया, जो अविवाहित गर्भवती महिलाओं के बच्चों को जन्म से पहले या जन्म के बाद दूसरे परिवारों तक पहुंचाने की बात करते थे। सबसे चिंताजनक दावा यह है कि कुछ एजेंटों ने बच्चों की मांग और कथित कीमत को मां की जाति, धर्म तथा बच्चे के लिंग से जोड़कर बताया।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि महिला पत्रकार ने आठ महीने की गर्भवती महिला का रूप लेकर कुछ एजेंटों से संपर्क किया। बातचीत के दौरान कथित तौर पर सबसे पहले महिला की जाति के बारे में सवाल किया गया। इसके बाद गर्भ में पल रहे बच्चे के लिंग से संबंधित जानकारी मांगी गई। आगे की बातचीत में कथित रूप से बच्चे को किसी इच्छुक परिवार तक पहुंचाने और इसके बदले रकम लेने की चर्चा हुई।
जाति पूछकर बच्चे की मांग का दावा
अंडरकवर जांच के दौरान एजेंटों की कथित बातचीत में यह सामने आया कि कुछ परिवार अपनी ही जाति या समुदाय से संबंधित बच्चा लेने की इच्छा जताते हैं। रिपोर्ट में ऐसे दावे भी सामने आए कि अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए उनकी पसंद के मुताबिक नवजात तलाशने की कोशिश की जाती थी।
यह दावा विशेष रूप से गंभीर है, क्योंकि किसी बच्चे को उसकी जन्मजात पहचान के आधार पर खरीदने-बेचने की व्यवस्था न केवल मानवीय गरिमा पर सवाल उठाती है, बल्कि बच्चों की सुरक्षा और कानूनी गोद लेने की पूरी व्यवस्था के सामने भी चुनौती खड़ी करती है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि अंडरकवर बातचीत में सामने आए एजेंटों के दावों को पूरे देश या पूरे राज्य में लागू होने वाली वास्तविकता मानने से पहले आधिकारिक जांच और स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
जन्म से पहले ही कथित तौर पर तय होता था सौदा
जांच में सामने आए विवरण के मुताबिक, कुछ एजेंट गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित ठिकाना उपलब्ध कराने, अस्पताल में डिलीवरी कराने और बच्चे को जन्म के बाद दूसरे परिवार को सौंपने की बात करते थे। रिपोर्ट में फर्जी पहचान के इस्तेमाल और अस्पतालों से जुड़े संभावित संपर्कों के भी आरोप लगाए गए हैं।
ऐसी व्यवस्था में सबसे अधिक जोखिम उन महिलाओं और किशोरियों का होता है, जो सामाजिक दबाव, आर्थिक मजबूरी या परिवार से छिपाकर गर्भावस्था का सामना कर रही हों। यदि कोई संगठित समूह ऐसी परिस्थितियों का फायदा उठाकर उन्हें अपने नियंत्रण में लेता है, तो मामला केवल अवैध गोद लेने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मानव तस्करी और बच्चों के अधिकारों से जुड़े गंभीर कानूनी प्रश्न भी पैदा हो सकते हैं।
कई राज्यों तक नेटवर्क होने का दावा
अंडरकवर रिपोर्ट के अनुसार, कथित नेटवर्क की गतिविधियां बिहार तक सीमित नहीं होने का दावा किया गया है। जांच में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, झारखंड और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों का उल्लेख किया गया है। कुछ बातचीत में नेपाल तक संपर्क होने की बात भी सामने आने का दावा किया गया।
हालांकि किसी नेटवर्क का वास्तव में कितना बड़ा विस्तार है, उसमें कितने लोग शामिल हैं और किन स्थानों पर उसकी गतिविधियां चल रही थीं, इसका निर्धारण केवल मीडिया जांच के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए पुलिस, बाल संरक्षण एजेंसियों और अन्य सक्षम सरकारी संस्थाओं की जांच महत्वपूर्ण होगी।
बिहार में पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
नवजातों की कथित खरीद-फरोख्त का मुद्दा केवल अंडरकवर जांच तक सीमित नहीं है। अगस्त 2026 में पूर्वी चंपारण के मोतिहारी में पुलिस ने एक नवजात की कथित बिक्री के मामले में बच्चे को बरामद करने और आरोपियों की गिरफ्तारी की कार्रवाई की थी। रिपोर्टों के अनुसार, इस मामले में बच्चे के माता-पिता, कथित खरीदार और एक आशा कार्यकर्ता समेत कई लोगों की भूमिका की जांच हुई। पुलिस के मुताबिक कथित सौदे की रकम को लेकर विवाद के बाद मामला सामने आया।
एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में कुल कथित सौदे की रकम और माता-पिता को दी गई रकम में अंतर की बात सामने आई थी। पुलिस ने मामले में नकदी बरामद करने और बच्चे को सुरक्षित संरक्षण में लेने की कार्रवाई की थी।
असली चुनौती है वैध गोद लेने की प्रक्रिया की सुरक्षा
भारत में बच्चे को गोद लेने की प्रक्रिया निर्धारित कानूनी व्यवस्था के तहत होती है। ऐसे में किसी बिचौलिए के माध्यम से सीधे पैसे देकर बच्चे को लेना या देना गंभीर कानूनी जोखिम पैदा कर सकता है। खासतौर पर नवजात बच्चे के मामले में उसकी पहचान, जन्म रिकॉर्ड, जैविक माता-पिता और अभिभावकत्व से संबंधित दस्तावेजों की सत्यता बेहद महत्वपूर्ण होती है।
इस पूरे मामले ने यह सवाल भी उठाया है कि सरकारी और निजी स्वास्थ्य संस्थानों में गर्भवती महिलाओं तथा नवजात बच्चों से जुड़े रिकॉर्ड की निगरानी कितनी प्रभावी है। यदि किसी अस्पताल या स्वास्थ्यकर्मी की मिलीभगत जांच में साबित होती है, तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है।
सामाजिक भेदभाव का भी गंभीर पहलू
इस प्रकरण का एक दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष जाति और धर्म के आधार पर बच्चे की मांग का कथित चलन है। किसी नवजात की कीमत या मांग को उसकी जातीय पहचान से जोड़ना सामाजिक भेदभाव के बेहद गंभीर रूप की ओर संकेत करता है। बच्चे की पहचान को बाजार की मांग से जोड़ने की ऐसी कथित व्यवस्था में सबसे बड़ा नुकसान स्वयं बच्चे और उसकी जैविक मां को होता है।
फिलहाल अंडरकवर जांच में सामने आए आरोपों और दावों को लेकर स्वतंत्र सरकारी जांच के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे। यदि जांच एजेंसियां ऐसे नेटवर्क की पुष्टि करती हैं, तो केवल एजेंटों ही नहीं बल्कि संभावित खरीदारों, बिचौलियों और सहयोग करने वाले अन्य लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है।
यह मामला एक व्यापक सवाल भी सामने रखता है—क्या आर्थिक और सामाजिक मजबूरियों से जूझ रही गर्भवती महिलाओं को पर्याप्त कानूनी, चिकित्सकीय और सामाजिक सहायता मिल रही है? क्योंकि ऐसी सहायता मजबूत होने पर ही महिलाओं और नवजातों को अवैध नेटवर्क के संभावित शोषण से बचाने की संभावना बढ़ती है।