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बंगाल SIR पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, लंबित अपीलों का मांगा पूरा आंकड़ा

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान लंबित अपीलों और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर गंभीर चर्चा हुई। अदालत ने चुनाव आयोग से लंबित मामलों का विस्तृत आंकड़ा मांगा और इस बात पर चिंता जताई कि अपीलों के निपटारे में […]

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Supreme Court
Gauravshali Bharat News
  • August 25, 2026 4:20 pm IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान लंबित अपीलों और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर गंभीर चर्चा हुई। अदालत ने चुनाव आयोग से लंबित मामलों का विस्तृत आंकड़ा मांगा और इस बात पर चिंता जताई कि अपीलों के निपटारे में देरी के कारण किसी नागरिक को मतदान के अधिकार से वंचित नहीं होना चाहिए। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही है।

सुनवाई के दौरान  TMC सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल के कई विधानसभा क्षेत्रों में जितने मतों के अंतर से उम्मीदवार चुनाव जीते या हारे, उससे अधिक संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया के दौरान एक विशेष वर्ग को प्रभावित करने की कोशिश की गई। हालांकि, ये आरोप राजनीतिक पक्ष की ओर से रखे गए दावे हैं और इन पर अंतिम निष्कर्ष अदालत की प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।

कल्याण बनर्जी ने अदालत के सामने यह भी कहा कि SIR से जुड़ा पर्याप्त डेटा सार्वजनिक मंच पर उपलब्ध नहीं है। उनके मुताबिक, राजनीतिक दलों और आम लोगों को पुनरीक्षण प्रक्रिया से संबंधित आंकड़े आसानी से उपलब्ध नहीं हो रहे हैं और कई जानकारियां अदालत में दाखिल रिपोर्टों के माध्यम से सामने आ रही हैं। सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल में लंबित अपीलों की संख्या का मुद्दा प्रमुखता से उठा। अदालत को बताया गया कि करीब 38 लाख से अधिक अपीलें लंबित होने की जानकारी सामने आई है।

उन्होंने यह भी बताया कि लंबित अपीलों में कुछ मामले ऐसे लोगों के हैं जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, जबकि बड़ी संख्या में अपीलें नाम जोड़ने या अन्य आपत्तियों से संबंधित हैं। इसी आधार पर उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हट चुके हैं, उनकी अपीलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, क्योंकि मामला लंबित रहने के दौरान वे मतदान के अधिकार से प्रभावित हो सकते हैं।

जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भी लंबित मामलों की प्रकृति को अलग-अलग करके देखने की जरूरत बताई। अदालत का जोर इस बात पर रहा कि यह स्पष्ट किया जाए कि कितने मामले वास्तव में उन नागरिकों से जुड़े हैं जिनके नाम मतदाता सूची से बाहर किए गए हैं। अदालत ने माना कि किसी व्यक्ति का नाम सूची से हट जाना उसके राजनीतिक अधिकार पर सीधा असर डाल सकता है।सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल में प्रस्तावित पंचायत और नगरपालिका चुनावों का भी उल्लेख हुआ।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि चुनावी प्रक्रिया शुरू होने से पहले पात्र मतदाताओं से जुड़े विवादों का निपटारा समय पर होना चाहिए।चुनाव आयोग की ओर से अदालत को बताया गया कि पिछली सुनवाई के बाद आयोग के अधिकारियों ने संबंधित न्यायाधिकरणों के साथ बैठकें की हैं और लंबित मामलों को तेजी से निपटाने के लिए काम किया जा रहा है। आयोग को अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार अलग-अलग श्रेणियों में लंबित अपीलों की जानकारी उपलब्ध करानी होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से यह बताने को कहा है कि ट्रिब्यूनलों के सामने कुल कितनी अपीलें लंबित हैं, इनमें कितने मामले मतदाता सूची से नाम हटाए जाने से संबंधित हैं और कितने नाम शामिल करने से जुड़े हैं। अदालत ने क्रॉस-अपीलों तथा अतिरिक्त ट्रिब्यूनलों की आवश्यकता से जुड़ी जानकारी भी मांगी है। इससे अदालत को लंबित मामलों की वास्तविक स्थिति समझने में मदद मिलेगी।

अदालत के सामने अब सबसे अहम सवाल यह है कि लंबित अपीलों का निपटारा किस गति से किया जाए और ऐसे लोगों के अधिकारों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित हो जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मांगे गए विस्तृत आंकड़ों के बाद मामले की तस्वीर और स्पष्ट होने की उम्मीद है।

 

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