नई दिल्ली: ईरान पर अमेरिका की ओर से लगाए जा रहे नए और कड़े प्रतिबंधों ने वैश्विक तेल बाजार की चिंताओं को बढ़ा दिया है। मौजूदा समय में कच्चे तेल की कीमतें कुछ नरम जरूर दिखाई दे रही हैं, लेकिन आपूर्ति में किसी बड़े व्यवधान की स्थिति में कीमतों में फिर तेज उछाल आने की आशंका जताई जा रही है। इसका सीधा असर भारत समेत तेल आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल करीब 86 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखाई दिया। यह हाल के करीब दो सप्ताह के निचले स्तरों के आसपास है। हालांकि, बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा कीमतों को देखकर यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि तेल बाजार का जोखिम पूरी तरह खत्म हो गया है। अमेरिका द्वारा ईरान पर प्रतिबंधों को और सख्त करने की घोषणा के बाद सबसे बड़ा सवाल वैश्विक आपूर्ति को लेकर उठ रहा है। ईरान पश्चिम एशिया का एक महत्वपूर्ण तेल उत्पादक देश है। उसके तेल निर्यात पर प्रतिबंध बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध कच्चे तेल की मात्रा प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा पश्चिम एशिया में किसी भी व्यापक तनाव से उत्पादन और परिवहन व्यवस्था पर असर पड़ने का खतरा बना रहता है।
वैश्विक ब्रोकरेज फर्म मॉर्गन स्टेनली ने तेल की कीमतों को लेकर अपना अनुमान बढ़ाया है। ब्रोकरेज के मुताबिक, वैश्विक तेल बाजार में उपलब्ध स्टॉक तेजी से कम हो रहा है। पश्चिम एशिया से तेल की सामान्य आपूर्ति बहाल होने में लंबा समय लग सकता है। इसी वजह से 2026 की चौथी तिमाही के लिए ब्रेंट क्रूड का अनुमान पहले के 75 डॉलर प्रति बैरल से बढ़ाकर 100 डॉलर प्रति बैरल कर दिया गया है। यह बदलाव बताता है कि बाजार में आपूर्ति संबंधी जोखिम को लेकर चिंता बढ़ी है। यदि उत्पादन, निर्यात या समुद्री परिवहन में लंबे समय तक व्यवधान रहता है तो खरीदारों के बीच उपलब्ध तेल के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बनना स्वाभाविक है।
मॉर्गन स्टेनली के आकलन के अनुसार, 13 जुलाई के बाद से समुद्र में मौजूद जहाजों पर रखे तेल के भंडार में करीब 17 करोड़ बैरल की कमी आई है। यह आंकड़ा वैश्विक तेल आपूर्ति की स्थिति में आए बदलाव की ओर संकेत करता है। ब्रोकरेज के अनुसार, इस अवधि में उपलब्धता में लगभग 47 लाख बैरल प्रतिदिन के स्तर की गिरावट देखी गई है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का असर देश की अर्थव्यवस्था पर कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है। महंगे कच्चे तेल से पेट्रोलियम उत्पादों की लागत बढ़ सकती है और आयात बिल पर भी दबाव पड़ सकता है। तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से रुपये और व्यापार घाटे पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है। परिवहन लागत बढ़ने के कारण इसका प्रभाव वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। विमानन, परिवहन, लॉजिस्टिक्स और पेट्रोकेमिकल जैसे क्षेत्रों पर महंगे ईंधन का सीधा असर पड़ सकता है।
हालांकि, घरेलू ईंधन कीमतों पर अंतिम प्रभाव कई अन्य कारकों पर भी निर्भर करता है। इनमें अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमत, रुपये की विनिमय दर, सरकार की कर नीति और तेल विपणन कंपनियों की कीमत निर्धारण रणनीति शामिल हैं। तेल बाजार में कीमत केवल मांग और उत्पादन से तय नहीं होती, बल्कि भविष्य की आपूर्ति को लेकर बाजार की धारणा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि व्यापारियों और निवेशकों को लगता है कि आने वाले महीनों में तेल की उपलब्धता कम हो सकती है, तो कीमतों में पहले ही तेजी शुरू हो सकती है।
पश्चिम एशिया में लंबे समय तक सामान्य आपूर्ति बहाल नहीं होने की आशंका इसी वजह से बाजार के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। यदि स्थिति 2027 तक सामान्य नहीं होती है, तो वैश्विक तेल भंडार पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। फिलहाल कच्चे तेल का भाव 86 डॉलर के आसपास बना हुआ है, लेकिन मॉर्गन स्टेनली का 100 डॉलर प्रति बैरल का अनुमान आने वाले महीनों में संभावित जोखिम की ओर इशारा करता है।
बाजार में आगे की दिशा ईरान पर प्रतिबंधों, पश्चिम एशिया की स्थिति, तेल उत्पादक देशों के उत्पादन और वैश्विक मांग जैसे कई कारकों से तय होगी। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह किसी भी संभावित आपूर्ति संकट के बीच ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखे और महंगे तेल से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दबाव को सीमित करे। आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और तेल बाजार की प्रतिक्रिया पर निवेशकों के साथ-साथ सरकार और उद्योग जगत की भी नजर रहेगी।