निजी स्कूलों में आरटीई प्रवेश का पांच साल का ब्योरा तलब

प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE ), 2009 के तहत बच्चों को मिलने वाले शिक्षा के अधिकार को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि CBSE और CISCE जैसे अन्य शिक्षा बोर्डों से संबद्ध निजी स्कूल केवल अलग बोर्ड से मान्यता प्राप्त होने के आधार […]

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  • August 27, 2026 10:36 am IST, Published 57 minutes ago

प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE ), 2009 के तहत बच्चों को मिलने वाले शिक्षा के अधिकार को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि CBSE और CISCE जैसे अन्य शिक्षा बोर्डों से संबद्ध निजी स्कूल केवल अलग बोर्ड से मान्यता प्राप्त होने के आधार पर आरटीई की जिम्मेदारियों से बाहर नहीं हो सकते। ऐसे स्कूलों को भी कानून के तहत निर्धारित दायित्वों का पालन करना होगा।

यह मामला भदोही जिले के बफनौटी स्थित सेंट जॉन्स स्कूल की याचिका से जुड़ा है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने की। याचिकाकर्ता स्कूल की ओर से यह तर्क रखा गया कि RTE कानून के कुछ प्रावधान अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू नहीं होते। इस दलील के बीच अदालत ने राज्य सरकार से RTE के क्रियान्वयन और निजी स्कूलों में इसके प्रभाव से संबंधित विस्तृत जानकारी मांगी है।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को प्रदेश के निजी स्कूलों में पिछले पांच शैक्षणिक सत्रों के दौरान RTE के तहत हुए प्रवेश का स्कूलवार विवरण उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। अदालत यह जानना चाहती है कि कानून के तहत निर्धारित प्रावधानों का जमीन पर किस तरह पालन किया जा रहा है और आर्थिक रूप से कमजोर तथा वंचित वर्ग के बच्चों को निजी स्कूलों में प्रवेश का वास्तविक लाभ कितना मिल रहा है।अदालत ने सरकार से आरटीई कानून की उपयोगिता और EWS तथा वंचित समूहों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने की नीति पर भी विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा है।

विशेष रूप से निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में कक्षा एक में कमजोर वर्ग और वंचित समूह के बच्चों के प्रवेश की स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए गए हैं।हाईकोर्ट ने यह भी जानकारी मांगी है कि ऐसे बच्चों को प्राथमिक शिक्षा पूरी होने तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए क्या व्यवस्था लागू है। इसमें दिव्यांग बच्चों को भी शामिल किया गया है। अदालत का जोर केवल प्रवेश की संख्या जानने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पता लगाने पर भी है कि RTE के तहत दाखिला लेने वाले बच्चों को कानून के अनुरूप शिक्षा और सुविधाएं मिल रही हैं या नहीं।

राज्य सरकार को प्रदेश के सभी निजी प्राथमिक विद्यालयों की जिलेवार सूची भी उपलब्ध करानी होगी। इसके अलावा जूनियर बेसिक से इंटरमीडिएट स्तर तक स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या का विवरण देना होगा। पिछले पांच शैक्षणिक सत्रों में RTE के तहत निर्धारित सीटों की संख्या, वास्तविक दाखिलों की संख्या और जिन बच्चों को प्रवेश नहीं मिल पाया, उनका विवरण भी अदालत के सामने रखना होगा।अदालत ने प्रवेश से वंचित बच्चों के मामलों में कारण बताने को भी कहा है। इसके साथ ही RTE की निर्धारित नीति के विपरीत शुल्क वसूले जाने की शिकायतों की जानकारी और उन शिकायतों पर की गई कार्रवाई का ब्योरा भी मांगा गया है।

हाईकोर्ट ने CBSE, CISCE और अन्य बोर्डों से संबद्ध स्कूलों को भी प्रशासनिक अधिकारियों को जरूरी जानकारी उपलब्ध कराने में सहयोग करने का निर्देश दिया है। स्कूलों को बेसिक शिक्षा अधिकारी और जिला विद्यालय निरीक्षक के स्तर पर मांगी गई सूचनाएं उपलब्ध कराने को कहा गया है। अदालत के निर्देश के बाद अब राज्य सरकार को व्यापक आंकड़े जुटाकर अपना पक्ष रखना होगा। इन आंकड़ों से प्रदेश में RTE के तहत निजी स्कूलों में प्रवेश की वास्तविक स्थिति सामने आने की उम्मीद है। साथ ही यह भी स्पष्ट हो सकता है कि किन क्षेत्रों में निर्धारित सीटों के बावजूद बच्चों को प्रवेश नहीं मिल सका और इसके पीछे क्या कारण रहे।

मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को प्रस्तावित है। उस दौरान सरकार की ओर से दाखिल किए जाने वाले हलफनामे और उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के आधार पर अदालत आगे की दिशा तय कर सकती है। हाईकोर्ट की यह कार्यवाही निजी स्कूलों में RTE के प्रभावी क्रियान्वयन, पारदर्शिता और वंचित वर्ग के बच्चों को शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करने के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

 

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