राही मासूम रजा जयंती विशेष: “मैं समय हूं” —— यह संवाद प्रौढ़ और बुजुर्गों के ज़ेहन में चस्पा है, लेकिन “जेन जी” भी इससे अनजान नहीं है। लोकप्रिय धारावाहिक “महाभारत” की स्क्रिप्ट और संवाद के कालजयी रचनाकार डॉ राही मासूम रजा किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। हिंदुस्तानी की परंपरा के ध्वजवाहक राही मासूम रजा ने अगर समाज के लिए कोई चुनौती बनकर आया तो उसके खिलाफ आवाज उठाने से नहीं चूके।
वह क्रांति की परिभाषा दूसरों पर थोपने वाले नहीं थे, बल्कि अपने घर से इसकी शुरुआत कर उन्होंने एक मिसाल कायम की थी।
राही मासूम रजा ने 1952 के आम चुनावों के बाद उत्तर प्रदेश में हुए निकाय चुनावों में अपने पिता का विरोध करते हुए अंतिम पायदान पर खड़े एक “सर्वहारा” के लिए अपनी लड़ाई लड़ी और जीते।
राही मासूम के पिता एडवोकेट बशीर हसन अपने जमाने के मशहूर वकील होने के साथ साथ सामाजिक मुद्दों पर भी सक्रिय रहते थे। कांग्रेस ने बशीर साहब को गाजीपुर नगर पालिका के अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाया। कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने कार्यकर्ता पब्बर राम को चुनाव लड़ाने की घोषणा कर दी। राही मासूम रजा और उनके भाई मुनीश रजा उन दिनों “सर्वहारा” की हिमायत में सक्रिय थे और घर की सामंती व्यवस्था उन्हें चुभती थी।
दोनों भाइयों ने पहले पिता से अनुरोध किया कि वह चुनाव न लड़ें। दलील दी, इससे एक ग़रीब आदमी (पब्बर राम) की किस्मत बदल जाएगी। पर, सामंती सोच के बशीर साहब ने इसे अपनी प्रतिष्ठा बना लिया और बहुत धूमधाम से चुनाव मैदान में उतर गए। राही मासूम और मुनीश रजा ने अपना घर छोड़ दिया और पब्बर राम के समर्थन में अपने पिता के ख़िलाफ़ विद्रोह का बिगुल बजा दिया। यह पहल ग़ाज़ीपुर के राजनीतिक इतिहास की सबसे अहम घटना बन गई। चुनाव परिणाम ने लोगों को चौंका दिया। बैरिस्टर बशीर साहब चुनाव हार गए। चुनाव पब्बर राम जीते। मासूम और मुनीश की प्रतिबद्धता जीती। गाजीपुर का स्वाभिमान जीता।
आज “आधा गांव” और “नीम का पेड़” जैसी कृतियों के प्रणेता डॉ राही मासूम रजा की जयंती है। सादर नमन!
लेखक वरिष्ठ पत्रकार आनंद राय