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CEC गिरफ्तारी की मांग के बीच जानिए क्या कहता है 2023 का नया कानून

चुनाव आयुक्त की गिरफ्तारी या आपराधिक कार्रवाई के सवाल को केवल किसी राजनीतिक आरोप या आंतरिक असहमति के आधार पर नहीं देखा जा सकता। यह भी देखना होगा कि कथित कार्रवाई वास्तव में आधिकारिक कर्तव्य के दायरे में आती है या नहीं और धारा 16 की संवैधानिक वैधता तथा सीमा के बारे में अदालत क्या फैसला करती है

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Gauravshali Bharat News
  • September 24, 2026 10:46 am IST, Published 1 hour ago

नयी दिल्ली: 23 सितंबर 2026 को सामने आई एक जांच रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग के कामकाज और उसके भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सार्वजनिक चर्चा शुरू हुई। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार आयोग के स्तर पर लिए गए कुछ फैसलों और जारी किए गए निर्देशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की। ये आपत्तियां मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR, नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने या बहाल करने, Form-6 में किए गए बदलाव और मतदाता डेटाबेस के संचालन जैसे विषयों से संबंधित थीं।

कानूनी स्थिति को समझने के लिए 2023 के चुनाव आयुक्त कानून की धारा 18 महत्वपूर्ण है। इस प्रावधान के अनुसार आयोग को जहां तक संभव हो, अपने कामकाज का संचालन सर्वसम्मति से करना चाहिए। लेकिन यदि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त किसी विषय पर अलग-अलग राय रखते हैं, तो उस मामले का फैसला बहुमत की राय के आधार पर किया जाना है। आयोग अपने कामकाज की प्रक्रिया और कार्य-विभाजन को सर्वसम्मति से तय कर सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में SIR से संबंधित एक नया विवरण जोड़ा गया था। इसमें आवेदक से यह जानकारी मांगी गई कि उसका या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR वाली मतदाता सूची में था या नहीं। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बदलाव की वैधानिक प्रक्रिया और इसे लागू करने के तरीके पर सवाल उठाए थे।

एक अन्य मुद्दा मतदाता डेटाबेस के डिजिटल प्रबंधन से जुड़ा था। रिपोर्ट में कहा गया कि दोनों आयुक्तों ने इस बात पर चिंता जताई कि क्या राज्य स्तर के वैधानिक अधिकारियों को मतदाता सूची में बदलाव करने के लिए पर्याप्त और वैधानिक पहुंच मिल रही है।

विवाद का दूसरा पहलू चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून का है। इस कानून ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक नई चयन समिति निर्धारित की। इसमें प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक सदस्य और लोकसभा में विपक्ष के नेता को शामिल किया गया है।

इससे पहले 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने एक अंतरिम व्यवस्था के तौर पर प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा में विपक्ष के नेता वाली समिति की व्यवस्था की थी। संसद द्वारा नया कानून बनाए जाने के बाद नियुक्ति की वैधानिक प्रक्रिया बदल गई।इसी व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।

23 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने मामले को बड़ी पीठ के सामने भेजे जाने की प्रक्रिया शुरू की। दोनों न्यायाधीश इस बात पर एकमत नहीं थे कि संविधान पीठ को संदर्भित करना आवश्यक है या नहीं, लेकिन मामले को आगे विचार के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजने पर सहमति बनी। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दत्ता ने मौजूदा नियुक्ति व्यवस्था की संस्थागत स्वतंत्रता पर प्रारंभिक सवाल भी उठाए। यह अभी न्यायिक विचार का विषय है; सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर 2023 के कानून को असंवैधानिक घोषित नहीं किया है।

चुनाव आयुक्तों को मिली कानूनी सुरक्षा क्या है?

2023 के कानून की धारा 16 भी मौजूदा विवाद में महत्वपूर्ण है। इसके तहत किसी वर्तमान या पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त अथवा चुनाव आयुक्त के खिलाफ उस कार्य, बात या निर्णय को लेकर दीवानी या आपराधिक कार्यवाही अदालत में शुरू या जारी नहीं की जा सकती, यदि वह कार्य उनके आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन के दौरान किया गया हो या उस रूप में किया गया हो।

इस प्रावधान का मतलब यह है कि आधिकारिक कार्य से संबंधित मामलों में कानून एक विशेष सुरक्षा प्रदान करता है। इसलिए किसी चुनाव आयुक्त की गिरफ्तारी या आपराधिक कार्रवाई के सवाल को केवल किसी राजनीतिक आरोप या आंतरिक असहमति के आधार पर नहीं देखा जा सकता। यह भी देखना होगा कि कथित कार्रवाई वास्तव में आधिकारिक कर्तव्य के दायरे में आती है या नहीं और धारा 16 की संवैधानिक वैधता तथा सीमा के बारे में अदालत क्या फैसला करती है।

धारा 16 को चुनौती देने वाली याचिकाएं भी अदालत में पहुंच चुकी हैं। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र और चुनाव आयोग से जवाब मांगा था, हालांकि उस समय प्रावधान पर रोक नहीं लगाई गई थी।

पहला, चुनाव आयोग के भीतर निर्णय किस प्रक्रिया से लिए गए और क्या धारा 18 में निर्धारित सर्वसम्मति या बहुमत की व्यवस्था का पालन हुआ। दूसरा, 2023 के नियुक्ति कानून की संवैधानिकता और चुनाव आयुक्तों को दी गई सुरक्षा की सीमा क्या है। इन दोनों सवालों का अंतिम उत्तर अदालतों के फैसलों और उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड से ही तय होगा। किसी आयुक्त की असहमति को सीधे किसी निर्णय के अवैध होने का प्रमाण मानना सही नहीं होगा। उसी तरह, किसी अधिकारी के खिलाफ गिरफ्तारी या आपराधिक कार्रवाई की मांग को कानूनी रूप से संभव मानने से पहले धारा 16 और उससे संबंधित न्यायिक कार्यवाही को ध्यान में रखना जरूरी है।

इस विवाद का वास्तविक कानूनी महत्व इसलिए केवल इस बात में नहीं है कि आयोग के भीतर मतभेद हुए या नहीं, बल्कि इस बात में है कि संवैधानिक संस्था के निर्णय किस प्रक्रिया से लिए गए, उन निर्णयों का रिकॉर्ड क्या कहता है और 2023 के कानून की संवैधानिक सीमाएं अदालत किस तरह तय करती है।

 

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