नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि हत्या जैसे गंभीर अपराध में दोषी ठहराते समय सेशंस कोर्ट यह निर्देश नहीं दे सकता कि दोषी अपनी बाकी पूरी जिंदगी जेल में ही रहेगा। अदालत ने कहा कि उम्रकैद की सजा के संबंध में विशेष शर्तें तय करने का अधिकार केवल संवैधानिक अदालतों यानी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पास है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला पंजाब के लुधियाना में दिसंबर 2009 में एक महिला और उसकी दो नाबालिग बेटियों की हत्या के मामले में सुनाया। मामले की सुनवाई जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने की।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आरोपियों की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन उनकी सजा में बदलाव करते हुए 25 साल की कैद कर दी। मामला नवल किशोर और एक अन्य दोषी की अपील से जुड़ा था।
दोनों पर लुधियाना में पिंकी, उनकी 8 वर्षीय बेटी दिव्या और 5 वर्षीय बेटी पूजा की हत्या का आरोप था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उम्रकैद का मतलब सामान्य तौर पर दोषी की पूरी जिंदगी तक जेल में रहना हो सकता है, लेकिन कानून में मौजूद माफी और सजा कम करने की शक्तियों को निचली अदालत खत्म या सीमित नहीं कर सकती।
पीठ ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि बिना माफी वाली उम्रकैद जैसी विशेष श्रेणी की सजा देने का अधिकार संवैधानिक अदालतों के पास है। सेशंस कोर्ट को ऐसा आदेश देने का अधिकार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत माफी देने और सजा कम करने की जो वैधानिक शक्तियां हैं, उन्हें सेशंस कोर्ट अपने आदेश के जरिए खत्म नहीं कर सकता।
अदालत के मुताबिक, ट्रायल कोर्ट की ओर से दोषी को उसकी पूरी बाकी जिंदगी जेल में रखने का निर्देश देना वैधानिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।
इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के संबंधित आदेशों में बदलाव करते हुए दोनों दोषियों की सजा 25 वर्ष के कारावास में बदल दी।