नई दिल्ली/देहरादून, : भारतीय वन सेवा (IFS) के चर्चित अधिकारी संजीव चतुर्वेदी से जुड़े कानूनी मामलों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2013 से सितंबर 2026 के बीच उनके अलग-अलग मामलों की सुनवाई से कुल 17 न्यायाधीश और न्यायिक अधिकारी स्वयं को अलग कर चुके हैं। इनमें सर्वोच्च न्यायालय, उत्तराखंड उच्च न्यायालय, केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण और जिला न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारी शामिल बताए गए हैं। ताजा घटनाक्रम सितंबर 2026 का है, जब केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) की दिल्ली पीठ के न्यायिक सदस्य राजवीर सिंह वर्मा ने चतुर्वेदी की एक याचिका की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया। यह मामला उत्तराखंड सरकार द्वारा भारतीय वन सेवा के अधिकारियों की वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट से संबंधित व्यवस्था को लेकर जारी आदेश से जुड़ा है।
17 न्यायिक अधिकारियों के अलग होने का दावा
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, संजीव चतुर्वेदी के विभिन्न मामलों में अब तक सर्वोच्च न्यायालय के दो, उत्तराखंड उच्च न्यायालय के चार, केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के नौ और जिला न्यायपालिका के दो न्यायिक अधिकारी सुनवाई से अलग हुए हैं। हालांकि, सभी मामलों में न्यायाधीशों के अलग होने के कारण समान नहीं हैं। कई आदेशों में इसके विशिष्ट कारण दर्ज नहीं हैं। ऐसे में सभी घटनाओं को किसी एक कारण से जोड़ना उचित नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट से शुरू हुआ था सिलसिला
रिपोर्टों के अनुसार, नवंबर 2013 में तत्कालीन सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश रंजन गोगोई ने चतुर्वेदी से संबंधित एक याचिका की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया था। यह मामला हरियाणा में चतुर्वेदी के कार्यकाल के दौरान कथित भ्रष्टाचार और उत्पीड़न के आरोपों की सीबीआई जांच की मांग से जुड़ा था। इसके बाद अगस्त 2016 में तत्कालीन न्यायाधीश यूयू ललित भी संबंधित मामले की सुनवाई से अलग हो गए थे।
उत्तराखंड हाईकोर्ट में भी बदली सुनवाई की पीठ
संजीव चतुर्वेदी से जुड़े अलग-अलग मामलों में उत्तराखंड उच्च न्यायालय के चार न्यायाधीश भी सुनवाई से अलग हो चुके हैं। मई 2023 में न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने एम्स में चतुर्वेदी के मुख्य सतर्कता अधिकारी के कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार संबंधी जांच के दस्तावेजों से जुड़े मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग किया था। फरवरी 2024 में न्यायमूर्ति मनोज तिवारी ने केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से संबंधित दस्तावेजों के मामले में सुनवाई से अलग होने का निर्णय लिया। सितंबर और अक्टूबर 2025 में न्यायमूर्ति आलोक वर्मा और न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी भी चतुर्वेदी की एक अवमानना याचिका की सुनवाई से अलग हुए थे।
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण में भी कई घटनाएं
चतुर्वेदी के सेवागत मामलों की सुनवाई के दौरान केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण में भी कई न्यायिक सदस्यों के अलग होने की घटनाएं सामने आई हैं। वर्ष 2019 में तत्कालीन अध्यक्ष न्यायमूर्ति एल. नरसिम्हन रेड्डी और वर्ष 2021 में न्यायमूर्ति आरएन सिंह सुनवाई से अलग हुए थे।नवंबर 2023 में मनीष गर्ग और छबिलेंद्र राउल की पीठ ने भी एक मामले से स्वयं को अलग कर लिया था। फरवरी 2025 में हरविंदर ओबेरॉय और बी. आनंद की पीठ चतुर्वेदी की मूल्यांकन रिपोर्ट की रेटिंग घटाए जाने से संबंधित विवाद की सुनवाई से अलग हुई थी। सितंबर 2026 में न्यायिक सदस्य राजवीर सिंह वर्मा के सुनवाई से अलग होने के बाद यह विषय फिर चर्चा में आ गया।
आखिर क्या है वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट का विवाद?
ताजा मामला उत्तराखंड सरकार के नवंबर 2021 के एक आदेश से संबंधित है। इस आदेश में भारतीय वन सेवा के अधिकारियों की वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार करने और उसका निस्तारण करने वाले अधिकारियों की व्यवस्था निर्धारित की गई थी। सरकारी सेवाओं में वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट का महत्वपूर्ण स्थान होता है। अधिकारियों के कामकाज के आकलन के साथ पदोन्नति और अन्य सेवागत निर्णयों में भी संबंधित नियमों के अनुसार इन रिपोर्टों की भूमिका हो सकती है। चतुर्वेदी ने इस प्रशासनिक व्यवस्था को चुनौती दी है। उनकी याचिका में मई 2025 के सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले का भी संदर्भ दिया गया है।
न्यायाधीश किसी मामले से खुद को अलग क्यों करते हैं?
भारतीय न्यायिक व्यवस्था में किसी न्यायाधीश का मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग करना एक स्थापित प्रक्रिया है। इसे न्यायिक रिक्यूजल कहा जाता है। हितों के संभावित टकराव, किसी पक्ष से पूर्व संबंध अथवा निष्पक्षता को लेकर संभावित सवालों सहित विभिन्न परिस्थितियों में न्यायाधीश ऐसा निर्णय ले सकते हैं। हालांकि, चतुर्वेदी के मामलों में सभी न्यायिक अधिकारियों के अलग होने का कोई एक साझा कारण स्थापित नहीं हुआ है। किसी न्यायाधीश के सुनवाई से अलग होने का अर्थ यह भी नहीं है कि संबंधित मामले में किसी पक्ष के दावे सही या गलत साबित हो गए हैं।
अब आगे क्या
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने चतुर्वेदी की ताजा याचिका को दूसरी उपयुक्त पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है।अगली सुनवाई में याचिका की प्रक्रियागत स्थिति और संबंधित प्रशासनिक आदेश को चुनौती देने वाले प्रश्नों पर विचार किया जा सकता है। संजीव चतुर्वेदी के अलग-अलग मामलों में न्यायिक अधिकारियों के सुनवाई से अलग होने का यह सिलसिला प्रशासनिक जवाबदेही, न्यायिक प्रक्रिया और सरकारी अधिकारियों की सेवागत शिकायतों के निस्तारण को लेकर चर्चा का विषय बना हुआ है।