नई दिल्ली। भारत में वर्ष 2000 से 2020 के बीच तेज आर्थिक विकास के साथ बिजली की मांग में करीब चार गुना बढ़ोतरी हुई। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक नए अध्ययन के अनुसार, इस बढ़ी हुई बिजली की मांग का तीन-चौथाई से अधिक हिस्सा कोयले के इस्तेमाल से पूरा किया गया। इसके कारण वायु प्रदूषण, खासकर पीएम2.5 के स्तर में बढ़ोतरी हुई और शहरी क्षेत्रों में प्रदूषण से जुड़ी मौतों की संख्या भी बढ़ी।
यह अध्ययन शोध पत्रिका ‘नेचर सिटीज’ में प्रकाशित हुआ है। शोध के मुताबिक, भारत के ऊर्जा और आर्थिक बदलाव का सार्वजनिक स्वास्थ्य पर मिश्रित असर पड़ा। एक ओर घरेलू स्तर पर प्रदूषण का खतरा कम हुआ, वहीं दूसरी ओर बाहरी हवा में प्रदूषण बढ़ने से लोगों के स्वास्थ्य पर जोखिम बढ़ गया।
अध्ययन के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2000 से 2020 के बीच भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी करीब 600-700 डॉलर से बढ़कर 2,000 डॉलर से अधिक हो गई।
इसी अवधि में बिजली की मांग करीब 450 टेरावाट-घंटे से बढ़कर लगभग 2,000 टेरावाट-घंटे तक पहुंच गई। अध्ययन में पाया गया कि प्रति व्यक्ति जीडीपी में 1 प्रतिशत की बढ़ोतरी बिजली की मांग में करीब 1.14 प्रतिशत की वृद्धि से जुड़ी थी।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के भौतिकी विभाग के अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता वासुदेव स्वाइन के अनुसार, चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि आर्थिक विकास के लिए इस्तेमाल होने वाले ऊर्जा स्रोतों का उत्पादन अधिक स्वच्छ तरीके से किया जाए।
बढ़ती बिजली की मांग को पूरा करने के लिए देश में कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों की संख्या में भी काफी वृद्धि हुई। अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2000 से पहले देश में 71 कोयला आधारित बिजली संयंत्र चालू किए गए थे। वहीं, 2001 से 2024 के बीच 182 नए संयंत्र स्थापित किए गए।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, कोयला आधारित बिजली उत्पादन में विस्तार का असर वायु गुणवत्ता पर पड़ा और पीएम2.5 प्रदूषण के संपर्क में आने वाले लोगों की संख्या बढ़ी।
अध्ययन में बताया गया कि कोयला आधारित बिजली उत्पादन के विस्तार का सबसे ज्यादा असर उत्तर और पूर्वी भारत तथा गंगा के मैदानी क्षेत्रों में देखने को मिला। इन इलाकों में घनी आबादी के साथ बड़े बिजली संयंत्र और उनसे जुड़ा बुनियादी ढांचा मौजूद है।
अध्ययन के अनुमान के अनुसार, वर्ष 2000 में पीएम2.5 प्रदूषण के संपर्क से शहरी क्षेत्रों में करीब 6.70 लाख मौतें हुई थीं। वर्ष 2020 तक यह संख्या बढ़कर करीब 8.70 लाख हो गई। यानी इस अवधि में करीब 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
वहीं, केवल बिजली क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन से जुड़ी शहरी मौतों का अनुमान वर्ष 2000 में करीब 15 हजार था, जो 2020 तक बढ़कर लगभग 3 लाख हो गया।
अध्ययन ने आर्थिक विकास के साथ ऊर्जा की बढ़ती जरूरत और पर्यावरणीय स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को रेखांकित किया है।