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रोज प्रार्थना सभा में संविधान की प्रस्तावना पढ़ाने की मांग खारिज

याचिका में CBSE के मई 2025 के सर्कुलर का भी जिक्र किया गया था। इसमें स्कूलों की सुबह की सभाओं के दौरान रोजाना सकारात्मक प्रतिज्ञाओं को प्रोत्साहित करने की बात कही गई थी। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि संविधान की प्रस्तावना को नियमित रूप से पढ़ना विद्यार्थियों के बीच नागरिक चेतना और संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देने वाला प्रभावी सकारात्मक...

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  • October 6, 2026 1:08 pm IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली: स्कूलों में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान रोजाना संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक पाठ कराने की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया है। मंगलवार को जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने इस मांग से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार करते हुए उसे खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि संविधान की प्रस्तावना पहले से ही स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा है और छात्रों को कक्षा 6 से इसके बारे में पढ़ाया जाता है।

यह जनहित याचिका दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज में सहायक प्रोफेसर धीरज कुमार की ओर से दायर की गई थी। याचिका में केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) को निर्देश देने की मांग की गई थी कि देशभर के स्कूलों में संवैधानिक साक्षरता बढ़ाने के लिए एक समान व्यवस्था बनाई जाए। याचिकाकर्ता का तर्क था कि बच्चों को संविधान के मूल विचारों और लोकतांत्रिक मूल्यों से कम उम्र में ही परिचित कराया जाना चाहिए।

याचिका में कहा गया था कि जिस तरह स्कूलों की प्रार्थना सभाओं में राष्ट्रगान का सामूहिक रूप से पाठ किया जाता है, उसी तरह संविधान की प्रस्तावना का भी नियमित सामूहिक पाठ कराया जा सकता है। याचिकाकर्ता के मुताबिक, इससे विद्यार्थियों के बीच न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता जैसे संवैधानिक मूल्यों की समझ मजबूत होगी। इसके जरिए बच्चों में नागरिक जिम्मेदारियों और संविधान के प्रति जागरूकता विकसित करने का भी प्रयास किया जा सकता है।

याचिका में इस मांग के समर्थन में संविधान के अनुच्छेद 21A और अनुच्छेद 51A(a) का हवाला दिया गया था। अनुच्छेद 21A शिक्षा के मौलिक अधिकार से जुड़ा है, जबकि अनुच्छेद 51A(a) नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों में संविधान, उसके आदर्शों और संस्थाओं के प्रति सम्मान की बात करता है। याचिकाकर्ता ने इन संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर छात्रों में संवैधानिक चेतना विकसित करने के लिए प्रस्तावना के नियमित पाठ को उपयोगी कदम बताया था।

याचिका में राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक में जारी किए गए कुछ सरकारी निर्देशों का भी उल्लेख किया गया था। इन राज्यों में सरकारी और संबंधित स्कूलों में सुबह की सभा के दौरान विद्यार्थियों से संविधान की प्रस्तावना का पाठ कराने की व्यवस्था का हवाला दिया गया। याचिकाकर्ता का कहना था कि अलग-अलग राज्यों में इस तरह की व्यवस्था होने के बावजूद पूरे देश के स्कूलों के लिए एक समान नीति की जरूरत है।

इसके अलावा याचिका में CBSE के मई 2025 के सर्कुलर का भी जिक्र किया गया था। इसमें स्कूलों की सुबह की सभाओं के दौरान रोजाना सकारात्मक प्रतिज्ञाओं को प्रोत्साहित करने की बात कही गई थी। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि संविधान की प्रस्तावना को नियमित रूप से पढ़ना विद्यार्थियों के बीच नागरिक चेतना और संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देने वाला प्रभावी सकारात्मक संकल्प हो सकता है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग पर कोई व्यापक दिशा-निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया। सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रस्तावना पहले से ही स्कूली शिक्षा का हिस्सा है और कक्षा 6 से विद्यार्थियों को इसे पढ़ाया जाता है। इसी आधार पर अदालत ने याचिका को आगे सुनने से इनकार कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद स्कूलों में संविधान की प्रस्तावना के सामूहिक पाठ को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर अनिवार्यता लागू करने की मांग फिलहाल आगे नहीं बढ़ सकी है। हालांकि, याचिका ने स्कूल शिक्षा में संवैधानिक मूल्यों, नागरिक जागरूकता और विद्यार्थियों को संविधान की मूल भावना से जोड़ने की भूमिका को लेकर बहस जरूर सामने ला दी है।

 

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