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अनुच्छेद-32 का दायरा बताया, पैगंबर टिप्पणी मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

नयी दिल्ली:  पैगंबर मोहम्मद पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी से जुड़े मामले में दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने सोशल मीडिया पर कथित आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार को रोकने और नए दिशा-निर्देश जारी करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। साथ ही स्पष्ट […]

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Supreme Court
Gauravshali Bharat News
  • July 15, 2026 4:43 pm IST, Published 45 minutes ago

नयी दिल्ली:  पैगंबर मोहम्मद पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी से जुड़े मामले में दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने सोशल मीडिया पर कथित आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार को रोकने और नए दिशा-निर्देश जारी करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि इस प्रकार के मामलों में सीधे संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना उचित नहीं है, क्योंकि कानून में पहले से उपलब्ध वैधानिक उपाय मौजूद हैं।

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस तरह की याचिकाएं कई बार वास्तविक संवैधानिक मुद्दों की बजाय विवाद को अधिक सनसनीखेज बनाने का माध्यम बन जाती हैं। अदालत ने संकेत दिया कि न्यायिक प्रक्रिया का उपयोग तभी होना चाहिए, जब उपलब्ध कानूनी विकल्प पर्याप्त न हों।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि एक पॉडकास्ट में पैगंबर मोहम्मद और उनके परिवार के संबंध में कथित आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं, जिससे एक धार्मिक समुदाय की भावनाएं आहत हुईं। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि सोशल मीडिया पर इस तरह की सामग्री को नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट और प्रभावी दिशानिर्देशों की आवश्यकता है तथा अदालत को इस संबंध में हस्तक्षेप करना चाहिए।

इस पर पीठ ने कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी कानून और उससे जुड़े नियम पहले से लागू हैं। जस्टिस आलोक अराधे ने विशेष रूप से सूचना प्रौद्योगिकी (प्रक्रिया एवं सुरक्षा उपाय) नियम, 2009 का उल्लेख करते हुए पूछा कि क्या याचिकाकर्ता उपलब्ध कानूनी व्यवस्था से अवगत नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी सामग्री से कानून का उल्लंघन होता है तो उसके लिए संबंधित एजेंसियों और वैधानिक प्रक्रियाओं का सहारा लिया जा सकता है।

यह मामला जून में सामने आया था, जब एक पॉडकास्ट के दौरान की गई कथित टिप्पणियों के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए। इसके बाद देश के विभिन्न राज्यों में संबंधित इंफ्लूएंसर के खिलाफ कई एफआईआर दर्ज की गईं। याचिका में केंद्र सरकार, गृह मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, यूट्यूब, फेसबुक, एक्स (X) और संबंधित सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर को पक्षकार बनाया गया था।

याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि धार्मिक महापुरुषों और पूजनीय व्यक्तित्वों के खिलाफ कथित अपमानजनक सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश बनाए जाएं तथा संबंधित वीडियो और पोस्ट हटाने के निर्देश जारी किए जाएं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ऐसे मामलों में पहले से उपलब्ध कानूनी तंत्र और आपराधिक प्रक्रिया का उपयोग किया जाना चाहिए।

इससे पहले भी शीर्ष अदालत इस मामले में तत्काल सुनवाई की मांग ठुकरा चुकी थी और कहा था कि याचिकाकर्ता पहले उपलब्ध वैधानिक उपायों का इस्तेमाल करे। ताजा आदेश के साथ सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि हर विवाद सीधे सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता और कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन प्राथमिकता होनी चाहिए।

 

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