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भारत-ब्रिटेन समुद्री साझेदारी मजबूत,कोंकण में रॉयल नेवी के साथ संयुक्त युद्धाभ्यास

भारत और ब्रिटेन के बीच कोंकण अभ्यास की शुरुआत से ही इसे द्विपक्षीय रक्षा सहयोग के महत्वपूर्ण मंच के रूप में देखा जाता रहा है। समय के साथ इसके स्वरूप और जटिलता में विस्तार हुआ है। इस दौरान दोनों नौसेनाओं को अपनी तकनीकी क्षमताओं, परिचालन अनुभव और रणनीतिक प्राथमिकताओं को साझा करने का अवसर मिलता है। संयुक्त प्रशिक्षण से दोनों देशों के सैन्य कर्मियों के बीच पेशेवर संबंध मजबूत होते हैं और...

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  • October 12, 2026 10:59 am IST, Published 2 hours ago

भारतीय नौसेना का आधुनिक मिसाइल स्टील्थ फ्रिगेट आईएनएस त्रिशूल भारत और ब्रिटेन के बीच होने वाले संयुक्त समुद्री अभ्यास कोंकण-2026 में हिस्सा लेने के लिए ब्रिटेन के प्लायमाउथ पहुंच गया है। इस अभ्यास में भारतीय नौसेना और ब्रिटेन की रॉयल नेवी के जवान समुद्र में विभिन्न परिचालन गतिविधियों के जरिए अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करेंगे। इसका उद्देश्य दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाना, समुद्री अभियानों में सहयोग मजबूत करना और बदलती सुरक्षा चुनौतियों से निपटने की तैयारी को बेहतर बनाना है। यह वार्षिक अभ्यास भारत और ब्रिटेन के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा सहयोग और रणनीतिक संबंधों का अहम हिस्सा है।

कोंकण-2026 का आयोजन 8 से 15 अक्टूबर तक प्लायमाउथ के निकट दो चरणों में किया जा रहा है। अभ्यास का पहला हिस्सा बंदरगाह पर आयोजित होगा, जबकि दूसरे चरण में समुद्र के भीतर विभिन्न सैन्य गतिविधियों को अंजाम दिया जाएगा। बंदरगाह चरण के दौरान दोनों देशों के नौसैनिक अधिकारियों और कर्मियों को एक-दूसरे की कार्यप्रणाली समझने तथा अनुभव साझा करने का अवसर मिलेगा। इसके तहत पेशेवर बातचीत, युद्धपोतों का निरीक्षण, खेल प्रतियोगिताएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इसके अलावा, आमंत्रित लोगों को युद्धपोतों को करीब से देखने का अवसर भी मिलेगा।

अभ्यास का समुद्री चरण विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस दौरान भारतीय और ब्रिटिश नौसेनाएं हवा, समुद्र की सतह और पानी के नीचे संचालित होने वाले अभियानों में संयुक्त रूप से भाग लेंगी। इन गतिविधियों के जरिए दोनों देशों की सेनाएं अलग-अलग परिस्थितियों में एक-दूसरे के साथ बेहतर तालमेल बनाकर काम करने का अभ्यास करेंगी। आधुनिक समुद्री सुरक्षा में जहाजों, विमानों और पनडुब्बियों से जुड़ी गतिविधियों के बीच समन्वय बेहद अहम होता है। ऐसे में संयुक्त अभ्यास परिचालन क्षमता और आपसी समझ को मजबूत करने में मददगार साबित हो सकता है।

कोंकण-2026 के दौरान कई चुनौतीपूर्ण सैन्य गतिविधियों को शामिल किया गया है। इनमें एक-दूसरे के युद्धपोतों पर विमान उतारने का अभ्यास, फायरिंग अभ्यास, हवाई सुरक्षा से जुड़ी गतिविधियां और जटिल नौचालन प्रक्रियाएं शामिल हैं। इसके साथ ही पनडुब्बी-रोधी युद्धाभ्यास भी किया जाएगा। इन अभ्यासों के जरिए दोनों नौसेनाएं समुद्र में संभावित खतरों की पहचान, प्रतिक्रिया और संयुक्त अभियान संचालित करने की अपनी तैयारियों को परखेंगी। अलग-अलग परिस्थितियों में प्रशिक्षण मिलने से दोनों देशों के कर्मियों को वास्तविक समुद्री अभियानों के दौरान बेहतर समन्वय स्थापित करने में सहायता मिल सकती है।

भारत और ब्रिटेन के बीच कोंकण अभ्यास की शुरुआत से ही इसे द्विपक्षीय रक्षा सहयोग के महत्वपूर्ण मंच के रूप में देखा जाता रहा है। समय के साथ इसके स्वरूप और जटिलता में विस्तार हुआ है। इस दौरान दोनों नौसेनाओं को अपनी तकनीकी क्षमताओं, परिचालन अनुभव और रणनीतिक प्राथमिकताओं को साझा करने का अवसर मिलता है। संयुक्त प्रशिक्षण से दोनों देशों के सैन्य कर्मियों के बीच पेशेवर संबंध मजबूत होते हैं और एक-दूसरे की प्रक्रियाओं को समझने में मदद मिलती है।

यह अभ्यास ऐसे समय में हो रहा है, जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र सहित दुनिया के विभिन्न समुद्री क्षेत्रों में सुरक्षा और स्थिरता को लेकर सहयोग का महत्व बढ़ रहा है। समुद्री मार्गों की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार की निर्बाध आवाजाही और समुद्र में नियम-आधारित व्यवस्था बनाए रखना अनेक देशों की साझा प्राथमिकताओं में शामिल है। भारत और ब्रिटेन की नौसेनाओं के बीच इस तरह का प्रशिक्षण इन उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में योगदान दे सकता है।

कोंकण-2026 भारत और ब्रिटेन के व्यापक रणनीतिक संबंधों को भी दर्शाता है। दोनों देश ‘भारत-ब्रिटेन दृष्टिकोण 2035’ के तहत अपने सहयोग को आगे बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं। रक्षा और समुद्री सुरक्षा इस साझेदारी के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। संयुक्त अभ्यास के माध्यम से दोनों नौसेनाओं को नई कार्यप्रणालियां सीखने, अनुभवों का आदान-प्रदान करने और जटिल परिस्थितियों में साथ काम करने की क्षमता बढ़ाने का अवसर मिलेगा। आईएनएस त्रिशूल की भागीदारी इस सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह अभ्यास समुद्री शांति, सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए भारत और ब्रिटेन की साझा प्रतिबद्धता को भी रेखांकित करता है।

 

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