भारत का लोकतंत्र अपनी जड़ों में जितना राजनीतिक है, उतना ही संस्थागत भी है। यहां सत्ता का खेल केवल चुनावी जीत-हार से तय नहीं होता, बल्कि संविधान की ठोस रूपरेखा से संचालित होता है। ममता बनर्जी का यह कहना कि वे इस्तीफा नहीं देंगी और कहा कि, “मैं इस्तीफ़ा नहीं दूँगी, मैं हारी नहीं, मैं राजभवन नहीं जाऊँगी, हम चुनाव नहीं हारे, जबरन हराया गया” पहली नजर में परंपरा के विरुद्ध लग सकता है, लेकिन यह स्थिति उतनी असामान्य भी नहीं है जितनी दिखाई जा रही है।
“सत्ता नहीं, संविधान तय करता है कुर्सी: हार के बाद भी क्यों नहीं रुकता लोकतंत्र का पहिया”
भारतीय राजनीति के इतिहास में कई ऐसे मौके आए हैं, चुनावी हार के बावजूद संवैधानिक प्रक्रिया के अंत तक पद नहीं छोड़ा। कारण साफ है… मुख्यमंत्री का पद सीधे जनता द्वारा नहीं, बल्कि विधानसभा में बहुमत से तय होता है। जब तक नई विधानसभा औपचारिक रूप से अस्तित्व में नहीं आ जाती, तब तक वर्तमान सरकार “caretaker” की भूमिका में बनी रह सकती है।
इसी संदर्भ में एम के स्टालिन या पिनाराई विजयन जैसे उदाहरण अलग राजनीतिक संस्कृतियों को दर्शाते हैं, न कि कोई अनिवार्य संवैधानिक बाध्यता। किसी का तुरंत इस्तीफा देना राजनीतिक शिष्टाचार हो सकता है, लेकिन न देना संवैधानिक उल्लंघन नहीं है।
अब आगे क्या होगा?
विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होते ही चुनाव आयोग निर्वाचित विधायकों की सूची राज्यपाल को सौंपेगा। गजट अधिसूचना के बाद नई विधानसभा अस्तित्व में आ जाएगी। इसके बाद राज्यपाल बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे। बहुमत साबित होते ही नया मुख्यमंत्री शपथ लेगा और सत्ता का हस्तांतरण अपने आप हो जाएगा । बिना किसी टकराव के। यही भारत की असली ताकत है।
यहां सत्ता व्यक्तियों की जिद से नहीं, संस्थाओं की मजबूती से चलती है। चाहे राजनीतिक बयान कितने भी तीखे हों, अंततः संविधान ही अंतिम निर्णायक होता है। और यही कारण है कि भारत में आज तक सत्ता परिवर्तन का कोई भी क्षण संवैधानिक संकट में नहीं बदला। राजनीति में शोर हो सकता है, लेकिन व्यवस्था हमेशा शांत रहती है।