मध्य प्रदेश के धार में विवादित भोजशाला मामले में मुस्लिम पक्ष के लिए कोर्ट ने कहा है कि अगर वो चाहे तो सरकार को रिप्रेजेंटेशन दे सकते हैं और अलटरनेट लैंड देने के लिए प्रत्यावेदन दे सकते हैं। सरकार चाहे तो इस पर विचार कर सकती है। अलटरनेट लैंड के लिए वह चाहे खुद या वक्फ बोर्ड की तरफ से, चाहे मौलाना कमालुद्दीन की तरफ से अपना प्रत्यावेदन दे सकते हैं और फिर उसको सरकार चाहे तो कंसिडर कर सकता है।
अयोध्या फैसले में मस्जिद के लिए क्या कहा गया था?
दरअसल, अयोध्या के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि रामललाविराजमान को देने का फैसला सुनाया था। साथ ही मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के लिए अयोध्या में ही किसी प्रमुख स्थान पर 5 एकड़ वैकल्पिक जमीन देने का निर्देश केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को दिया गया था।कोर्ट ने कहा था कि यह जमीन सुन्नी वक्फ बोर्ड को दी जाए ताकि वहां मस्जिद निर्माण हो सके। अब भोजशाला मामले में भी कोर्ट की टिप्पणी को उसी संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि, यहां हाईकोर्ट ने सीधे जमीन देने का आदेश नहीं दिया है, बल्कि कहा है कि यदि मुस्लिम पक्ष आवेदन करता है तो सरकार उस पर विचार कर सकती है।
न्याय का संतुलन :-
किसी अपराधी द्वारा जबरन कब्जा की गई सरकारी या निजी संपत्ति (अतिक्रमण) के मामले में न्यायालय आमतौर पर वैकल्पिक भूमि देने के बजाय दंडात्मक कार्रवाई और बेदखली को प्राथमिकता देता है। वैकल्पिक भूमि का लाभ ज्यादातर उन्हीं को मिलता है जिनके पास मूल भूमि का वैध स्वामित्व होता है।
राम जन्मभूमि और भोजशाला नामक दोनों मामलों में माननीय न्यायालय ने दोषी अतिक्रमण किए हुए पक्ष को वैकल्पिक भूमि देने के लिए सरकार को निर्देश दिया है। सामान्यतः ऐसा होता नहीं है। इस सुविधा का लाभ पाकर ऐसे तत्व और भी अधिक मनमानी हरकत करेंगे और जबरन धार्मिक स्थलों को विखंडन और उसे पर अपना अस्तित्व जमाने का प्रयास करते रहेंगे। अमूमन चाहिए तो यह की इन्हें किसी भी प्रकार की अनुकंपा ना दिया जाए और इन्हें अपने करतूत को भुगतने के लिए दंडित किया जाए। इन पर फाइन लगाया जाए और ऐसा ना करें इसकी चेतावनी दिया जाए। इसका परिणाम आगे चलकर सामान्य कानून व्यवस्था को लागू करवाने में सहायक हो सकता है। काशी और मथुरा में भी इस प्रकार के जबरन हस्तगत किए हुए पक्ष यह सुखाधिकार मांग सकते हैं।
यदि बिना न्यायालय के हस्तक्षेप से और आपसी समझौते से कोई विवाद हल हो तो वहां दोनों पक्ष को संतुष्ट करने के लिए अल्टरनेट लैंड एलाट करने का औचित्य समझ में आता है, लेकिन एक-एक बिंदु को बार-बार न्यायालय में घसीटना,उन पर बाधा पहुंचाना और विवाद को समाप्त ना करना,उसको दीर्घ समय तक लटकाए रखना, यह अल्टरनेट लैंड एलॉटमेंट की सुविधा के योग्य कभी नहीं हो सकते हैं । इन्हें यह सुविधा नहीं दी जानी चाहिए।
डा. राधेश्याम द्विवेदी